नवरात्र : स्रोत की ओर एक यात्रा

Published at :25 Sep 2014 6:28 AM (IST)
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नवरात्र : स्रोत की ओर एक यात्रा

श्री श्री रविशंकर आध्यात्मिक गुरु नवरात्र के दौरान उपवास, प्रार्थना, मौन और ध्यान के माध्यम से जिज्ञासु अपने सच्चे स्नेत की ओर यात्रा करता है. उपवास के द्वारा शरीर विषाक्त पदार्थ से मुक्त हो जाता है. मौन के द्वारा वचनों में शुद्धता आती है और ध्यान के द्वारा हमें आत्मसाक्षात्कार मिलता है. नवरात्र का त्योहार […]

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श्री श्री रविशंकर

आध्यात्मिक गुरु

नवरात्र के दौरान उपवास, प्रार्थना, मौन और ध्यान के माध्यम से जिज्ञासु अपने सच्चे स्नेत की ओर यात्रा करता है. उपवास के द्वारा शरीर विषाक्त पदार्थ से मुक्त हो जाता है. मौन के द्वारा वचनों में शुद्धता आती है और ध्यान के द्वारा हमें आत्मसाक्षात्कार मिलता है.

नवरात्र का त्योहार आश्विन (शरद) की शुरुआत में और चैत्र (वसंत) की शुरुआत में प्रार्थना और उल्लास के साथ मनाया जाता है. यह काल आत्मनिरीक्षण और अपने स्नेत की ओर वापस जाने का समय है.

परिवर्तन के इस काल के दौरान, प्रकृति भी पुराने को झड़ कर नवीन हो जाती है, जानवर सीतनिद्रा में चले जाते हैं और वसंत के मौसम में जीवन वापस नये सिरे से खिल उठता है.

वैदिक विज्ञान के अनुसार, पदार्थ अपने मूल रूप में वापस आकर फिर से बार-बार अपनी रचना करता है. यह सृष्टि सीधी रेखा में नहीं चल रही है, बल्कि चक्रीय है, प्रकृति के द्वारा सभी कुछ का पुनर्नवीनीकरण हो रहा है- कायाकल्प की यह एक सतत प्रक्रिया है. तथापि सृष्टि के इस नियमित चक्र से मनुष्य का मन पीछे छूटा हुआ है. नवरात्रि का त्योहार अपने मन को वापस अपने स्नेत की ओर ले जाने के लिए है.

नवरात्र के दौरान उपवास, प्रार्थना, मौन और ध्यान के माध्यम से जिज्ञासु अपने सच्चे स्नेत की ओर यात्रा करता है. रात का नाम रात्रि इसलिए है, क्योंकि यह नवीनता और ताजगी लाती है. यह हमारे अस्तित्व के तीन स्तरों पर राहत देती है- स्थूल शरीर को, सूक्ष्म शरीर को और कारण शरीर को. उपवास के द्वारा शरीर विषाक्त पदार्थ से मुक्त हो जाता है. मौन के द्वारा हमारे वचनों में शुद्धता आती है और बातूनी मन शांत होता है और ध्यान के द्वारा अपने अस्तित्व की गहराइयों में डूब कर हमें आत्मसाक्षात्कार मिलता है.

यह आंतरिक यात्रा हमारे बुरे कर्मो को समाप्त करती है. नवरात्र आत्मा अथवा प्राण का उत्सव है, जिसके द्वारा महिषासुर (अर्थात् जड़ता), शुम्भ-निशुम्भ (गर्व और शर्म) और मधु-कैटभ (अत्यधिक राग-द्वेष) को नष्ट किया जा सकता है. ये एक-दूसरे से पूर्णत: विपरीत हैं, फिर भी एक-दूसरे के पूरक हैं. जड़ता, गहरी नकारात्मकता और मनोग्रस्तियां (रक्तबीजासुर), बेमतलब का वितर्क (चंड-मुंड) और धुंधली दृष्टि (धूम्रलोचन) को केवल प्राण और जीवनशक्ति ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठा कर ही दूर किया जा सकता है.

नवरात्र के नौ दिन तीन मौलिक गुणों से बने इस ब्रहांड में आनंदित रहने का भी एक अवसर है. यद्यपि हमारा जीवन इन तीन मौलिक गुणों के द्वारा ही संचालित है, फिर भी हम उन्हें कम ही पहचान पाते हैं या उनके बारे में शायद ही विचार कर पाते हैं. नवरात्र के पहले तीन दिन तमोगुण के हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुण के और आखिरी तीन दिन सत्व के लिए हैं. हमारी चेतना इन तमोगुण और रजोगुण के बीच बहती हुई सतोगुण के आखिरी तीन दिनों में खिल उठती है.

जब भी जीवन में सत्व बढ़ता है, तब हमें विजय मिलती है. इस ज्ञान का सारतत्व जश्न के रूप में दसवें दिन विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है. ये तीन मौलिक गुण हमारे भव्य ब्रहांड की स्त्री शक्ति माने गये हैं. नवरात्र के दौरान देवी मां की पूजा करके हम त्रिगुणों में सामंजस्य लाते हैं और वातावरण में सत्व के स्तर को बढ़ाते हैं.

हालांकि नवरात्र बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनायी जाती है, परंतु वास्तविकता में यह लड़ाई अच्छे और बुरे के बीच में नहीं है. वेदांत की दृष्टि से यह द्वैत पर अद्वैत की जीत है. वेदांतिक दृष्टिकोण से यह प्रत्यक्ष अनेकता पर संपूर्ण एकात्मक सत्य की विजय है.

अष्टावक्र ने कहा था, बेचारी लहर अपनी पहचान को समुद्र से अलग रखने की लाख कोशिश करती है, लेकिन कोई लाभ नहीं होता. हालांकि, इस स्थूल संसार के भीतर ही सूक्ष्म संसार समाया हुआ है, लेकिन उनके बीच अलगाव की भावना ही द्वंद्व का कारण है. एक ज्ञानी के लिए पूरी सृष्टि जीवंत है. जिस तरह से अबोध बच्चों को सब चीजों में जीवन दिखता है, ठीक उसी प्रकार ज्ञानी को भी सब में जीवन दिखता है.

देवी मां या शुद्ध चेतना ही सब नाम और रूप में व्याप्त हैं. हर नाम और हर रूप में एक ही देवत्व को जानना ही नवरात्र का उत्सव है. अत: नवरात्रि के आखिर के तीन दिनों के दौरान विशेष पूजाओं के द्वारा जीवन और प्रकृति के सभी पहलुओं का सम्मान किया जाता है. काली मां प्रकृति की सबसे भयानक अभिव्यक्ति हैं. प्रकृति सौंदर्य का प्रतीक है, फिर भी उसका एक भयानक रूप भी है. इस द्वैत यथार्थ को मान कर मन में एक स्वीकृति आ जाती है और मन को आराम मिलता है.

मातृ-शक्ति की पहचान केवल प्रकाशमयी बुद्धि नहीं है. देवी मां को सिर्फ बुद्धि के रूप में ही नहीं, बल्कि भ्रांति के रूप में भी जाना जाता है; वह न सिर्फ लक्ष्मी (समृद्धि) हैं, बल्कि वह भूख (क्षुधा) भी हैं और प्यास (तृष्णा) भी हैं. संपूर्ण सृष्टि में देवी मां के इस दोहरे पहलू को पहचान कर एक गहरी समाधि लग जाती है. ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म के द्वारा अद्वैत सिद्धि प्राप्त की जा सकती है यानी इस अद्वैत चेतना में पूर्णता की स्थिति प्राप्त की जा सकती है.

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