किन्नरों के प्रति असंवेदनशील रवैया

Published at :13 Sep 2014 7:20 AM (IST)
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किन्नरों के प्रति असंवेदनशील रवैया

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये किन्नर समुदाय के अधिकारों पर केंद्र सरकार ने कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है. इस वर्ष 30 अप्रैल को न्यायालय ने किन्नरों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल करते हुए सरकारों को निर्देश दिया था कि उन्हें तीसरा जेंडर माना जाये और अन्य जेंडरों की तरह शैक्षणिक संस्थाओं व नौकरियों […]

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सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये किन्नर समुदाय के अधिकारों पर केंद्र सरकार ने कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है. इस वर्ष 30 अप्रैल को न्यायालय ने किन्नरों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल करते हुए सरकारों को निर्देश दिया था कि उन्हें तीसरा जेंडर माना जाये और अन्य जेंडरों की तरह शैक्षणिक संस्थाओं व नौकरियों में जगह दी जाये.
सरकार की हालिया अपील को ध्यान से देखने से यही निष्कर्ष निकलता है कि वह न्यायालय के निर्णय को लागू करने के प्रति गंभीर नहीं है. सरकार का कहना है कि वह तीसरे जेंडर के सशक्तिकरण के लिए तैयार है, पर समलैंगिकों को नहीं. उसने न्यायालय से ‘ट्रांसजेंडर’ की परिभाषा स्पष्ट करने का भी अनुरोध किया है. सरकार के रवैये पर यहीं से संदेह होने लगता है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश में यह साफ कहा गया है कि ये अधिकार समलैंगिकों के लिए नहीं हैं.
न्यायालय ने ‘ट्रांसजेंडर’ श्रेणी को भी स्पष्ट कर दिया है. किन्नरों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किये जाने पर सरकार की आपत्ति तकनीकी आधार पर तो सही है, लेकिन वह इस मसले पर सोच-विचार के लिए अतिरिक्त समय मांग सकती थी. किन्नर समुदाय के प्रतिनिधियों व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार का इरादा टालमटोल का है और वह ‘ट्रांसजेंडर’लोगों के अधिकारों के प्रति उदासीन है. दिलचस्प है कि सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए न्यायालय के निर्देशों के स्थान पर उसकी अनुशंसाओं को लागू करने का इरादा व्यक्त किया है. सरकार को यह रिपोर्ट जनवरी में सौंपी गयी थी.
इस रिपोर्ट के नौ महीने और न्यायालय के निर्णय के पांच महीने बीत जाने के बाद भी सरकार द्वारा कोई कदम का न उठाया जाना उसकी असंवेदनशीलता का ही परिचायक है. न्यायालय ने सरकारों को छह महीने की समय-सीमा दी थी. इस अवधि में कुछ राज्य सरकारों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसी केंद्रीय संस्था ने ही निर्देशों पर सकारात्मक पहल किया है. न्यायालय का निर्देश ‘ट्रांसजेंडर’ लोगों की बहुप्रतीक्षित मांगों का प्रतिफल है और बुनियादी मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम है. सरकार को उसकी मूल भावना का सम्मान करते हुए नेकनीयती का परिचय देना चाहिए.
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