नाम में ही बहुत कुछ रखा है दोस्त!

सत्यप्रकाश पाठक प्रभात खबर, रांची अंगरेजी के पुरोधा नाटककार विलियम शेक्सपीयर की एक उक्ति है- ह्वाट्स इन ए नेम.. इसे आम बोलचाल की भाषा में हम कहते हैं- भई, नाम में क्या रखा है. क्या बात कह गये हैं शेक्सपीयर जी! सचमुच नाम में रखा ही क्या है. अगर तुलसीदास का नाम तुलसीदास न होता, […]
सत्यप्रकाश पाठक
प्रभात खबर, रांची
अंगरेजी के पुरोधा नाटककार विलियम शेक्सपीयर की एक उक्ति है- ह्वाट्स इन ए नेम.. इसे आम बोलचाल की भाषा में हम कहते हैं- भई, नाम में क्या रखा है. क्या बात कह गये हैं शेक्सपीयर जी! सचमुच नाम में रखा ही क्या है. अगर तुलसीदास का नाम तुलसीदास न होता, तो क्या वह रामचरित मानस नहीं लिखते और ऐसा भी नहीं कि मोतीलाल नेहरू इसलिए रईस थे कि उनके नाम में ही मोती शब्द था. नाम का कुछ असर होता, तब तो कुबेर नाम के लोग जरूर धनाढय़ होते और नाम अगर मुरलीधर होता, तो फिर कहना ही क्या.
लेकिन ऐसा भी नहीं है दोस्त कि नाम से कुछ नहीं होता, जरा उनसे पूछिए, जिनका नाम ऊटपटांग है, कई तो बेचारे अपने नाम की वजह मजाक का पात्र बने रहते हैं और कई नाम छुपाने के लिए तरह के तरह के हथकंडे अपनाये रहते हैं. हमारे एक गुरुजी थे, चौबे सर. कॉपी जांच कर हस्ताक्षर करते बी चौबे. दसवीं क्लास में पता चला कि उनका नाम भिखारी चौबे था. ऐसे ही एक बड़े अधिकारी का नाम लेना विभाग में वजिर्त था. अपना नाम ही उन्हें गाली लगती थी. क्या करते बेचारे..
दारोगा, वकील, बैरिस्टर जैसे नाम तो गफलत में डाल देते हैं. गांव के हज्जाम का बेटा था तहसीलदार. कन्फ्यूज्ड मत होइए, अरे भई पद या काम का नहीं, सिर्फ नाम का था वह तहसीलदार. लेकिन इस नाम की महिमा ही थी कि दूसरे गांव की सबसे सुशील और पढ़ी-लिखी कन्या के पिता ने नाक रगड़ कर उसे अपना दामाद बना लिया. बाद में इस कालिदास का क्या हुआ भगवान जाने.. पर नाम की महिमा तो स्थापित हो ही जाती है दोस्त. वैसे भी हमारा अटल विश्वास है कि राम से बड़ा राम का नाम.. सब राम नाम की महिमा. कम से कम हम आम भारतीय तो यही मानते हैं. लेकिन ताज्जुब है कि ग्लोबल प्रोफेशनल वर्ल्ड भी यही मानता है.
नाम है, तो दाम है.. नहीं तो ब्रांड का कॉन्सेप्ट कहां से आता और इमेज बिल्डिंग और इमेज प्रमोशन की कवायदों पर भारी-भरकम रकम क्यों खर्च की जाती है. नाम की ही महिमा है कि शीला हो या फरजाना, ब्रांडेड सामान पर ही हाथ रखती हैं. यह स्टेटस सिंबल भी है. शहर के पढ़े-लिखों की जमात में ऐसा एक बड़ा वर्ग है, जिनके लिए ब्रांड ही सबकुछ है.
अजीब दीवानगी है, जिसका बड़ा ‘फेस वैल्यू’ हो, वही चाहिए, ‘वर्थ वैल्यू’ टटोलता कौन है यार.. अब ये जुमले आउटडेटेड हो गये हैं कि ऊंची दुकान के फीके पकवान. पकवान फीका भी है, तो चलेगा, पर किसी नामचीन ब्रांड का होना चाहए. कई स्वनामधन्य लोग तो खुद को ही एक बड़ा ब्रांड मान कर चलते हैं. अमिताभ बच्चन खुद में एक बड़ा ब्रांड नेम हैं. शहर-मुहल्ले में भी ब्रांड नेम की धूम है.. फलां लेखक, फलां दुकान या फलां डॉन.. सबका है अपना नाम यानी ब्रांड. अब काम से ज्यादा नाम का जमाना है.
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