अंगरेजी की हिंदी को अग्रिम बधाई

Published at :12 Sep 2014 2:00 AM (IST)
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अंगरेजी की हिंदी को अग्रिम बधाई

फोन उठाते ही दूसरी तरफ से आवाज आयी, ‘‘हैलो. हिंदी?’’ इधर से वह बोलीं, ‘‘हू आर यू?’’ फिर उधर से जवाब आया, ‘‘जी मैं अंग्रेजी बोल रही हूं, हिंदी की दोस्त. उसे जन्मदिन की बधाई देनी है.. आप कौन?’’ इधर से खुशी का इजहार करते हुए वह बोली, ‘‘हाउ आर यू इंग्लिश बेटा?.. मैं हिंदी […]

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फोन उठाते ही दूसरी तरफ से आवाज आयी, ‘‘हैलो. हिंदी?’’ इधर से वह बोलीं, ‘‘हू आर यू?’’ फिर उधर से जवाब आया, ‘‘जी मैं अंग्रेजी बोल रही हूं, हिंदी की दोस्त. उसे जन्मदिन की बधाई देनी है.. आप कौन?’’ इधर से खुशी का इजहार करते हुए वह बोली, ‘‘हाउ आर यू इंग्लिश बेटा?.. मैं हिंदी की मम्मी.’’ लगभग बीस मिनट तक हिंदी की मां ने फोन पर अंग्रेजी की तरीफ की. अंतत: अंग्रेजी ही बोली, ‘‘आंटी.. जरा हिंदी को बुला दीजिए न!’’ उन्होंने फोन मेज पर रखा और अपनी कर्कश आवाज में हिंदी को आवाज लगा दी. हिंदी तुरंत नीचे आयी और फोन का रिसीवर उठा कर बोली, ‘‘अंग्रेजी! कैसी हो तुम?’’ अंग्रेजी बोली, ‘‘मेरी छोड़, अपनी बता.. लेकिन पहले अपने दिवस की एडवांस बधाई तो ले लो.’’ हिंदी ने धन्यवाद दिया. फिर अंग्रेजी के अगले कुछ सवालों के जवाब में पहले तो खामोश रही, फिर सिर्फ ‘हूं-हूं’ करती रही. ‘हूं’, यानी हां और ना के बीच का जवाब.

हिंदी की खामोशी भांपते हुए अंग्रेजी बोली, ‘‘तबीयत तो ठीक है न तुम्हारी?’’ हिंदी ने उलाहना देने के अंदाज में जवाब दिया, ‘‘तबीयत पूछ कर मेरा मजाक उड़ा रही हो? तुम्हें तो पता ही है कि हिंदी की हालत कैसी है? बस ‘हिंदी दिवस’ पर लोगों को याद आती हूं. बाकि दिन तो मैं अपने ही घर में परायी हूं. खुद को मेरा शुभचिंतक दिखाने के लिए, 14 सितंबर को कुछ लोग फेसबुक -ट्वीटर पर फुसलाने वाली बातें लिखेंगे.

कहीं-कहीं कार्यक्रम भी होंगे, जिसमें मेरे भविष्य को लेकर बड़ी-बड़ी बातें होंगी. इसके बाद फिर वही घर की मुर्गी दाल बराबर. (थोड़ा हंसते हुए) खैर, ये सब छोड़ो, तुम्हें मेरे घर के लोग बहुत पसंद करते हैं. पता नहीं तुमने कौन-सा जादू चला रखा है?’’ यह सुन कर अंग्रेजी आश्चर्यचकित हो कर बोली, ‘‘क्या बात करती हो तुम! मुङो तो लगा था कि अब तक तुमलोग मुङो भूल गये होगे. तुम्हारे दादा-परदादा तो मुङो बिल्कुल पसंद नहीं करते थे.’’ हिंदी बोली, ‘‘अब ऐसा नहीं है. बल्कि मुझसे ज्यादा लोग तुम्हें पहचानते हैं.

अभी कल की ही बात है, मैंने रिक्शेवाले से पूछा- भइया, विश्वविद्यालय चलेंगे? उसने आश्चर्य से मुङो देखा और बोला- ये कहां है मैडम? फिर मैंने जब अंग्रेजी में कहा कि यूनिवर्सिटी चलोगे, तब वह बोलता है- अरे मैडम! हिंदी में कहिए न कि यूनिवर्सिटी चलना है, चलिए बैठिए. एक और घटना बताती हूं.

मेरी ट्रेन लेट थी, तो मैंने स्टेशन पर एक आदमी से पूछा कि भइया, पूछताछ कार्यालय कहां है? उसने कहा, सॉरी बहनजी, मैं शहर में नया हूं, बगल में इंक्वायरी काउंटर है, वहां से पूछ लो.. यह तो हाल है, इस देश में हिंदी का. सच कहूं, तो मैं अपने ही घर के लोगों के लिए गले की हड्डी बनी हुई हूं.’’ इतना कहते-कहते हिंदी का गला भर आया और उसने फोन काट दिया. फिर चेहरे पर नकली खुशी ओढ़ कर, अखबारों में अपने दिवस के आयोजन की तैयारियों की खबरें पढ़ने लगी.

पंकज कुमार पाठक

प्रभात खबर, रांची
pankaj.pathak@prabhatkhabar.in

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