भारत-अमेरिका के खट्टे-मीठे रिश्ते

Published at :09 Sep 2014 11:48 PM (IST)
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भारत-अमेरिका के खट्टे-मीठे रिश्ते

अंतरराष्ट्रीय राजनीति तेजी से बदल रही है. ऐसे में जब चीन से जापान सहित सभी एशियाइ देश भयभीत हैं और वे अमेरिका का संरक्षण प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें भी अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाकर अमेरिका का साथ लेना चाहिए. जबसे नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, अमेरिका का रुख पूरी तरह बदल […]

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अंतरराष्ट्रीय राजनीति तेजी से बदल रही है. ऐसे में जब चीन से जापान सहित सभी एशियाइ देश भयभीत हैं और वे अमेरिका का संरक्षण प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें भी अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाकर अमेरिका का साथ लेना चाहिए.

जबसे नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, अमेरिका का रुख पूरी तरह बदल गया है. यही वह अमेरिका था, जिसने वर्षो तक नरेंद्र मोदी को ‘वीजा’ नहीं दिया था और आज अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा पलक-पांवड़े बिछा कर मोदी के इस माह के आखिर में होनेवाले अमेरिका दौरे का इंतजार कर रहे हैं. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी देशों का नेतृत्व ब्रिटेन के हाथ से अमेरिका के हाथ में चला गया और भारतीय उपमहाद्वीप के देशों में अमेरिका ने वही किया, जो ब्रिटेन उसे समझाता रहा. अमेरिका को ब्रिटेन ने इस बात के लिए राजी कर लिया कि पाकिस्तान ही अमेरिका और ब्रिटेन का दोस्त हो सकता है, भारत नहीं. 1954 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति आईजन हॉवर ने पाकिस्तान को भारी सैनिक सहायता देने की घोषणा की. पंडित नेहरू ने भारत की संसद में कहा कि यह सैनिक सहायता देर-सबेर भारत के खिलाफ इस्तेमाल होगी. हालांकि अमेरिका ने भारत से वादा किया कि पाकिस्तान सैनिक सहायता का इस्तेमाल चीन और रूस के खिलाफ करेगा. लेकिन पंडित नेहरू की भविष्यवाणी सच निकली.

1965 में जब भारत-पाक युद्ध हुआ, तब पाकिस्तान ने सारे हथियार और लड़ाकू विमान भारत के विरुद्ध इस्तेमाल किये. लड़ाई तो थम गयी. दुर्भाग्यवश ताशकंद में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया. पाकिस्तान ने ताशकंद समझौते में वादा किया था कि अब वह कभी भारत के विरुद्ध हथियार नहीं उठायेगा, परंतु कुछ दिनों के बाद ही उसने अपना रवैया बदल दिया. दुर्भाग्यवश, अमेरिका ने सच्चाई को कभी नहीं समझा और उसने बिना सोचे-समङो ही पाकिस्तान को अरबों डॉलर की आर्थिक और सामरिक मदद जारी रखी.

भारत के प्रति अमेरिकी रवैये में आमूल परिवर्तन तब आया, जब 90 के दशक के शुरू में सोवियत संघ का विघटन हो गया. उसी समय भारत में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ था. अमेरिका ने भारत के प्रति दोस्ताना रवैया अपनाना शुरू कर दिया, लेकिन उसने पाकिस्तान को मदद करना नहीं छोड़ा. आज अमेरिका भारत के प्रति दोस्ताना रवैया इसलिए अपना रहा है, क्योंकि भारत में चीन के बाद दुनिया की सबसे बड़ी आबादी है. भारत में किसी भी निवेशक को न्याय मिल सकता है. अमेरिका में उद्योगपतियों की लॉबी बहुत मजबूत है. उनका दबाव ओबामा सरकार पर है कि भारत के साथ जल्द ऐसे समझौते किये जायें, जिनमें उन्हें लाभ हो. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीमा क्षेत्र में 49 प्रतिशत विदेशी निवेश की जो घोषणा की, उसके कारण अमेरिकी निवेशकों के मुंह से लार टपकने लगी. ऐसे में जब मोदी अमेरिका जायेंगे, तब उन्हें अमेरिकी सरकार के आला मंत्रियों को यह कहना होगा कि भारत रक्षा उपकरण अमेरिका से खरीदेगा जरूरी, लेकिन शर्त यही है कि इन उपकरणों के कारखाने भारत में खोले जायें और उसकी तकनीक भारत को दी जाये. मंदी के कारण आज अमेरिका की अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गयी है. इसलिए अमेरिका लाचार होकर भारत की शर्तो को मानेगा ही.

‘डब्ल्यूटीओ’ में भारत ने जो अपना पक्ष दृढ़तापूर्वक रखा, वह अमेरिका को रास नहीं आया. पश्चिमी देशों का कहना था कि खाद्य सब्सिडी के मामले में कुल कृषि उत्पादन के बाजार मूल्य का 10 प्रतिशत धनराशि ही सरकार किसानों को सब्सिडी में दे. भारत सरकार को भारत के किसानों के हित की चिंता है. अत: इस मामले में अमेरिका के सामने वह झुक नहीं सकता था. अमेरिका के साथ हुए परमाणु समझौते में एक शर्त यह भी है कि यदि भविष्य में कोई परमाणु दुर्घटना होगी, तो उसकी जवाबदेही उस कंपनी की होगी, जिसने वह संयंत्र भारत को बेचा होगा और उसे भारत को पूरा मुआवजा देना होगा. अमेरिका इस शर्त को अपने उद्योगपतियों के दबाव में हटाना चाहता है. परंतु भारत को इसके लिए डटा रहना चाहिए, क्योंकि भोपाल की दुर्घटना अभी भी लोगों के जेहन में ताजा है. इस तरह की दुखद घटना की पुनरावृत्ति को टालने के लिए अमेरिका के साथ परमाणु करार में यह प्रावधान रहना जरूरी है.

वर्षो से अमेरिका कह रहा है कि वह भारत को ‘सुरक्षा परिषद्’ में स्थान दिलायेगा. परंतु बार-बार चीन के अड़ंगा लगाने के कारण अमेरिका चुप हो जाता है. यदि अमेरिका भारत का निकटतम मित्र बनना चाहता है, तो उसे सुरक्षा परिषद् में भारत की सदस्यता के लिए मदद करनी चाहिए. अंतरराष्ट्रीय राजनीति तेजी से बदल रही है. ऐसे में जब चीन से जापान सहित सभी एशियाइ देश भयभीत हैं और वे अमेरिका का संरक्षण पाना चाहते हैं, तो हमें भी अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाकर अमेरिका का साथ लेना चाहिए. क्योंकि चीन से खतरा कोई मामूली खतरा नहीं है. मोदी की अमेरिका-यात्र पर दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं. आशा करनी चाहिए कि ओबामा से जब उनकी मुलाकात होगी, तो भारत-अमेरिकी संबंधों में और अधिक मिठास आयेगी.

डॉ गौरीशंकर राजहंस

पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत

delhi@prabhatkhabar.in

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