राष्ट्रगान के वक्त खड़े क्यों नहीं होते हम?

Published at :09 Sep 2014 11:46 PM (IST)
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राष्ट्रगान के वक्त खड़े क्यों नहीं होते हम?

रविवार था, इसलिए कुछ दोस्तों के साथ फिल्म मैरी कॉम देखने का मूड बना लिया. अद्भुत फिल्म. हर सीन पर दर्शक वाह-वाह कहते. मेरा भी फिल्म देख कर दिल खुश हो गया, लेकिन जैसे ही मैरी कॉम को फिल्म के अंत में जीत का मेडल पहनाया गया, कुछ युवा सीट छोड़ कर हॉल से बाहर […]

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रविवार था, इसलिए कुछ दोस्तों के साथ फिल्म मैरी कॉम देखने का मूड बना लिया. अद्भुत फिल्म. हर सीन पर दर्शक वाह-वाह कहते. मेरा भी फिल्म देख कर दिल खुश हो गया, लेकिन जैसे ही मैरी कॉम को फिल्म के अंत में जीत का मेडल पहनाया गया, कुछ युवा सीट छोड़ कर हॉल से बाहर जल्दी-जल्दी निकलने लगे.

उन्हीं में से एक ने कहा, ‘यार फिल्म खत्म तो होने दो. रुको तो सही.’ दूसरे दोस्त ने जवाब दिया, ‘अबे जल्दी चल. जन गण मन.. शुरू होनेवाला है. फिर खड़े रहना पड़ेगा.’ उनके जाते ही फिल्म में राष्ट्रगान वाला दृश्य आया. हॉल के 10 प्रतिशत लोग लोग तुरंत उठ गये और साथ-साथ गाने भी लगे. 90 प्रतिशत लोग अभी भी अपनी सीट पर बैठे थे और पॉप कॉर्न खा रहे थे. आधा राष्ट्रगान होने के बाद कुछ लोगों को इधर-उधर खड़े लोगों को देख थोड़ी शर्म आयी, तो वे भी उठ गये.

ऐसे उठे, जैसे खड़े हो कर किसी पर कोई अहसान कर रहे हो. हालांकि कुछ लोग अभी भी बैठे ही थे. पूरा राष्ट्रगान उन्होंने बैठे-बैठे ही सुना, मानो कोई आम गीत बज रहा हो. लोगों की इस हरकत पर मुङो तो बड़ी शर्म आयी. शर्म इस बात की कि अपने देश के राष्ट्रगान के बजते ही खड़े होना या नहीं, वे एक-दूसरे को देख कर तय कर रहे थे. दूसरी तरफ फिल्म के दृश्य में मैरी कॉम व भारत के राष्ट्रगान के सम्मान में सभी देशों से आये लोगों को खड़ा होते दिखाया गया. मुङो समझ नहीं आया कि हॉल में बैठे लोगों को अपनी अंतरआत्मा से देश के प्रति सम्मान दिखाने की भावना क्यों जागृत नहीं हुई? क्या यह गीत सुन कर उनके अंदर गर्व का भाव पैदा नहीं होता? आज यही वजह है कि अपने आसपास के छोटे बच्चों से जब मैं पूछती हूं कि हमारा राष्ट्रगान क्या है? वे बता नहीं पाते. दरअसल उनके स्कूल में भी अब यह प्रार्थना के समय नहीं गाया जाता. उन्हें तो सिर्फ ‘चार बोतल वोदका..’ गाना ही जल्दी याद होता है.

भला हो भी क्यों न, जब माता-पिता ही इस तरह अपने राष्ट्रगान का अपमान करेंगे, तो बच्चों से क्या उम्मीद की जा सकती है. वे अपने बड़ों को ही तो देख कर सीखते हैं. आज यह एक गंभीर समस्या है. युवा, जो देश का भविष्य है, वे राष्ट्रगान शुरू होने के पहले ही भाग जा रहे हैं. इससे बड़ी शर्मनाक घटना क्या हो सकती है. ऐसा नहीं है कि मैं पटना में हूं, तो मैं यहां के लोगों की बुराई कर रही हूं. यह समस्या हर जगह है. इसके पहले मैं इंदौर में थी. वहां एक मल्टीप्लेक्स है मंगल सिटी. इसकी खासियत थी कि यहां हर फिल्म के पहले राष्ट्रगान वाला एक वीडियो दिखाया जाता था. इसमें एक मूक-बधिर बच्ची दौड़ती हुई स्कूल पहुंचती है और प्रार्थना में सब बच्चों के सामने खड़े हो कर सभी को साइन लैग्वेज में राष्ट्रगान गाना सिखाती है. इस वीडियो को देखना न पड़े, खड़ा रहना न पड़े, इसलिए कई लोग हॉल के अंदर ही नहीं आते थे. वे कहते थे कि राष्ट्रगान निकल जाने दो, फिर अंदर घुसेंगे.

दक्षा वैदकर

प्रभात खबर, पटना

daksha.vaidkar@prabhatkhabar.co.in

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