पाकिस्तान-संकट से उभरती चिंताएं

Published at :01 Sep 2014 1:20 AM (IST)
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पाकिस्तान-संकट से उभरती चिंताएं

पाकिस्तान एक बार फिर हिंसक राजनीतिक अस्थिरता के कगार पर खड़ा है. पिछले एक पखवाड़े से राजधानी इस्लामाबाद के अतिविशिष्ट क्षेत्र में, जहां पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली, प्रधानमंत्री कार्यालय और आवास, मंत्रलय आदि हैं, पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी व पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के प्रमुख इमरान खान तथा मौलाना ताहिरुल कादरी के समर्थक डेरा डाले हुए हैं. […]

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पाकिस्तान एक बार फिर हिंसक राजनीतिक अस्थिरता के कगार पर खड़ा है. पिछले एक पखवाड़े से राजधानी इस्लामाबाद के अतिविशिष्ट क्षेत्र में, जहां पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली, प्रधानमंत्री कार्यालय और आवास, मंत्रलय आदि हैं, पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी व पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के प्रमुख इमरान खान तथा मौलाना ताहिरुल कादरी के समर्थक डेरा डाले हुए हैं.

उनकी मांग है कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपने पद से इस्तीफा दें और चुनाव सुधारों के बाद नये चुनाव हों. इमरान खान और मौलाना कादरी का आरोप है कि पिछले चुनाव में नवाज शरीफ ने व्यापक धांधली कर जीत हासिल की थी. इन दोनों के समर्थक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के आवास की ओर कूच करने की कोशिश कर रहे हैं. रिपोर्टो के मुताबिक, प्रदर्शकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हो रही हैं और कई प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं. तकरीबन 500 प्रदर्शनकारी और 80 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं. प्रधानमंत्री के आवास की ओर जाने के इमरान खान के निर्णय से पर्यवेक्षक हैरान हैं, क्योंकि शुक्रवार को ही पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल राहील शरीफ ने उनसे मुलाकात कर संकट का हल कराने की कोशिश की थी.

पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में सेना ने सिर्फ महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभायी है, बल्कि लंबे अरसे तक शासन भी किया है. जब वहां लोकतांत्रिक सरकारें बनीं, तो उन पर भी सेना हावी रही है और नीतियों का अपने हिसाब से निर्धारण किया है. 60 से अधिक वर्षो के इस इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि एक लोकतांत्रिक सरकार ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया और पिछले वर्ष के चुनाव के बाद निर्वाचित सरकार को सत्ता की कमान सौंप दी. इसके बाद यह माना जाने लगा था कि पाकिस्तान लोकतंत्र और राजनीतिक स्थिरता की राह पर अग्रसर है.

लेकिन मौजूदा स्थिति ने इन उम्मीदों को कड़ा झटका दिया है. यह सर्वविदित तथ्य है कि इमरान खान और मौलाना कादरी को पाकिस्तान के कट्टरपंथी ताकतों और तालिबान से संबद्ध आतंकवादी समूहों का परोक्ष समर्थन प्राप्त है. कुछ समय पूर्व सरकार के निर्देश पर पाकिस्तानी सेना ने वजीरिस्तान में बड़ी संख्या में आतंकवादी को मार गिराया था और नवाज शरीफ ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि सरकार आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगी. पाकिस्तानी सेना और कुख्यात गुप्तचर संस्था आइएसआइ के तालिबान व अन्य आतंकी समूहों से संबंध भी कोई रहस्य की बात नहीं हैं. विश्लेषकों का यह भी मानना है कि भारत से बेहतर संबंध बनाने की नवाज शरीफ की कोशिश भी पाकिस्तानी राजनीति के चरमपंथी तबके के गले नहीं उतर रही है. इन परिस्थितियों में ये ताकतें इमरान खान और मौलाना कादरी को आगे कर नवाज शरीफ की लोकतांत्रिक सरकार को अपदस्थ करने की जुगत लगा रही हैं. इस प्रकरण में पाकिस्तानी सेना और उसके शक्तिशाली प्रमुख जनरल राहील शरीफ की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. वे इस अफरातफरी के माहौल के समुचित समाधान की कोशिश के बजाय अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास करते हुए दिख रहे हैं. कई जानकार यह भी कह रहे हैं कि जनरल शरीफ संकट को ऐसे बिंदु पर जाने देना चाहते हैं, जब वे अपने हिसाब से दखल दे सकें. यह तो आनेवाले दिनों में ही साफ हो सकेगा कि हालात क्या रुख अख्तियार करते हैं, लेकिन सेना ने सत्ता पर अपने प्रभाव का विस्तार शुरू कर दिया है. इस संकट का एक त्रसद पहलू यह है कि पाकिस्तान का संकट महज उसका अंदरूनी मसला भर नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत और अफगानिस्तान पर पड़ना तय है.

जम्मू-कश्मीर में भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी की घटनाओं में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हो गयी है. दोनों देशों के बीच तनाव इस हद तक पहुंच चुका है कि पिछले सप्ताह होनेवाली विदेश सचिव स्तर की बातचीत भारत ने रद्द कर दी. उधर अफगानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम को लेकर विभिन्न पक्षों में सहमति न बन पाने से स्थिति के बिगड़ने के पूरे आसार हैं. अमेरिकी सेना की वापसी की घोषणा के बाद तालिबान लड़ाकों की सक्रियता भी बढ़ी है. ऐसे में पाकिस्तान में सेना के सत्तालोलुप हिस्से और चरमपंथियों के गंठजोड़ के हाथों सत्ता की कमान आ जाती है, तो पूरे क्षेत्र में शांति खतरे में पड़ सकती है. पिछले तीन महीने से दुनिया मध्य एशिया, विशेषकर इराक और सीरिया, में क्रूर कट्टरपंथी इस्लामिक स्टेट के खूनी खेल को देख रही है. पाकिस्तान में लोकतंत्र के क्षरण से दक्षिण एशिया में शांति, सहअस्तित्व व विकास की नरेंद्र मोदी की कोशिशों को धक्का लगना तय है.

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