बेहतरी के संकेत
Updated at : 13 Feb 2020 6:50 AM (IST)
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मांग और नकदी की कमी से जूझ रही हमारी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने तथा वृद्धि दर को गति देने की कोशिश में पिछले साल के बजट के बाद से ही कई स्तरों पर पहलकदमी हुई है. आगामी वित्त वर्ष के लिए प्रस्तावित बजट में भी अनेक सुधारों का प्रावधान है. यह संतोष की बात […]
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मांग और नकदी की कमी से जूझ रही हमारी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने तथा वृद्धि दर को गति देने की कोशिश में पिछले साल के बजट के बाद से ही कई स्तरों पर पहलकदमी हुई है. आगामी वित्त वर्ष के लिए प्रस्तावित बजट में भी अनेक सुधारों का प्रावधान है. यह संतोष की बात है कि आर्थिकी के आधारभूत तत्व मजबूत हैं. ऐसे में इस तरह के संकेत मिल रहे हैं कि अर्थव्यवस्था की सेहत में सुधार हो रहा है.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया है कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में बढ़ोतरी हो रही है. पिछले साल अप्रैल से नवंबर के बीच 24.4 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष निवेश हुआ था, जबकि 2018 में इसी अवधि में यह राशि 21.2 अरब डॉलर थी. इसी प्रकार इस अवधि में पोर्टफोलियो निवेश 8.7 अरब डॉलर की तुलना में 12.6 अरब डॉलर रहा था.
इस बढ़त से इंगित होता है कि गति धीमी होने के बावजूद भारत के विकास की संभावनाओं को लेकर निवेशकों का भरोसा बढ़ रहा है. औद्योगिक उत्पादन में हाल के दिनों में बढ़त दिख रही है और खरीदारी सूचकांक ऊपर की ओर अग्रसर है. जनवरी में उत्पादन आठ सालों के सबसे उच्चतम स्तर पर रहा है. पिछली कुछ तिमाहियों में मांग कम होने से उत्पादन में भी लगातार कमी आ रही थी.
इस वजह से अर्थव्यवस्था भी कमजोर हो रही थी और रोजगार पर भी नकारात्मक असर हो रहा था. विदेशी मुद्रा भंडार अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का अहम सूचक होता है. पिछले वित्त वर्ष के अंत में यह भंडार 413 अरब डॉलर था, जो इस साल 24 जनवरी को 466.69 अरब डॉलर हो गया. अर्थव्यवस्था में गिरावट का एक असर राजस्व में कमी के रूप में भी सामने आया है, जिसका दबाव बजट प्रस्तावों पर भी देखा जा सकता है. इस कारण सरकार के पास कल्याणकारी योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत अधिक खर्च कर पाने की गुजाइश कम रही है.
लेकिन यह एक सकारात्मक संकेत है कि अप्रैल से जनवरी के बीच वस्तु एवं सेवा कर का मासिक संग्रहण छह बार एक लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा है. पिछले वित्त वर्ष के अंत से अब तक शेयर बाजार सूचकांक में भी 5.6 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गयी है. वित्त मंत्री की इस बात को भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि तमाम चुनौतियों के बावजूद किसी भी मद में संसाधनों की कटौती भी नहीं की गयी है और घाटे को नियंत्रण में रखकर वित्तीय अनुशासन का भी पालन किया गया है.
आज जब अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर कई सालों में सबसे कम है, मुद्रास्फीति की दर भी बढ़ी है तथा बेरोजगारी एक बड़ी समस्या के रूप में हमारे सामने है, ऐसे सकारात्मक संकेत आगामी वित्त वर्ष के लिए उत्साहवर्द्धक हैं. यदि सुधारों व उपायों को समुचित ढंग से लागू करने की प्रक्रिया जारी रहती है, तो अगले दो-तीन सालों में अर्थव्यवस्था के अपेक्षित दर से गतिशील होने की पूरी संभावना है.
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