स्थानीयता पर सिर्फ बयानों का खेल

Published at :07 Aug 2014 5:52 AM (IST)
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स्थानीयता पर सिर्फ बयानों का खेल

प्रदेश की राजनीति के रिकार्ड की सूई जिस तरह स्थानीयता की नीति के इर्द-गिर्द अटक गयी है, उसे सरकार के कामकाज के साथ देखना दिलचस्प होगा. झारखंड सरकार इंदिरा आवास योजना मद में 256.42 करोड़ रुपये केंद्र से नहीं ले सकी. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 85 फीसदी तक दवाओं की कमी है. झारखंड की प्रधान […]

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प्रदेश की राजनीति के रिकार्ड की सूई जिस तरह स्थानीयता की नीति के इर्द-गिर्द अटक गयी है, उसे सरकार के कामकाज के साथ देखना दिलचस्प होगा. झारखंड सरकार इंदिरा आवास योजना मद में 256.42 करोड़ रुपये केंद्र से नहीं ले सकी.

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 85 फीसदी तक दवाओं की कमी है. झारखंड की प्रधान महालेखाकार (पीएसी) की रिपोर्ट से उजागर ये सच सरकार के कामकाज की एक झलक पेश करते हैं. राजनीति के इस पाठ को समझना तब और भी जरूरी हो जाता है, जब शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली के ही मसले किसी न किसी रूप में राज्य को आंदोलित किये हुए हैं.

स्थानीयता के मसले को जैसे और जितने मोड़ दिये जा रहे हैं, उसे देखते हुए यही लगता है कि इसके पीछे प्रदेश की सियासी धुरी बदलने की कोशिश छिपी हुई है. स्थानीयता के संदर्भ में मुख्यमंत्री कहते हैं कि वह जनता पर फैसला थोपनेवाले नहीं. यह सही बात है कि जनतंत्र में फैसले थोपा नहीं जाते, संवाद से सर्वसम्मति तक पहुंचा जाता है. लेकिन, इस सर्वसम्मति को अमल में लाने के लिए नेता को अपने काम पर, अपनी कार्रवाई पर भरोसा करना पड़ता है.

सीएम जब विधान सभा में सरे आम राज्य पुलिस के एक पूर्व आला अधिकारी पर उग्रवादी संगठनों के गठन का आरोप लगाते हैं, तो यह बात समझ में नहीं आती कि जो व्यक्ति राज्य के मुखिया के पद पर रहते हुए कार्रवाई के लिए स्वतंत्र व सक्षम है, वह ऐसी भाषा पर क्यों उतर जाता है? क्या यह जनता पर अपना मत थोपने या सोच को एक दिशा में ले जाने जैसा नहीं? आखिर ग्रामीण विद्युतीकरण में पिछड़ने से लेकर इंदिरा आवास मद में केंद्र की राशि नहीं ले पाने के पीछे क्या यही सोच काम करता है?

क्या सीएम इन कामों को भी जनता पर थोपना मानते हैं. विकास के मसले से कन्नी काटनेवाले नेता, जो अभी स्थानीयता के मसले को गा-बजा रहे हैं, उन्हें आदिवासियों से ज्यादा अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की फिक्र ज्यादा दिखती है.

स्थानीयता नीति पर जो भी फैसला लेना है, जल्दी लें, क्योंकि देरी से यहां के आदिवासियों व मूलवासियों का ही सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है. सालों से नौकरी की बाट जोह रहे ये लोग सरकार के अनिर्णय से नौकरी से वंचित हैं.

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