संयम और संवाद

Published at :25 Dec 2019 7:56 AM (IST)
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संयम और संवाद

कई दिनों से देश के विभिन्न हिस्सों में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. अनेक स्थानों पर विरोध उग्र और हिंसक भी हुआ है. अब तक 25 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है और कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं. कुछ जगहों पर पुलिस पर अनुचित बलप्रयोग करने के आरोप भी […]

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कई दिनों से देश के विभिन्न हिस्सों में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. अनेक स्थानों पर विरोध उग्र और हिंसक भी हुआ है.

अब तक 25 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है और कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं. कुछ जगहों पर पुलिस पर अनुचित बलप्रयोग करने के आरोप भी लगे हैं. सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया गया है. लोकतंत्र में विपक्षी दलों, जन संगठनों और नागरिकों को सरकारी नीतियों और निर्णयों के विरोध का अधिकार होता है, परंतु हिंसा या अराजकता से आंदोलनों को बचाने की पूरी कोशिश भी की जानी चाहिए.

सरकार का भी उत्तरदायित्व होता है कि वह विरोधों का समुचित संज्ञान ले और स्वस्थ संवाद से गतिरोध का समाधान निकाले. इस कानून को लेकर और राष्ट्रीय नागरिक पंजी के बारे में सरकार ने हर स्तर पर स्पष्टीकरण देकर विरोध के बिंदुओं का उत्तर देने का सराहनीय प्रयास किया है. सरकार की ओर से कानून में आवश्यक बदलाव के संकेत भी दिये गये हैं. इस प्रयास को विस्तार देते हुए सरकार को विरोधी दलों और संगठनों से बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहिए. प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी सरकारों की है, लेकिन ऐसा संदेश नहीं जाना चाहिए कि शांति बहाल रखने के उपायों की आड़ में विरोध के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन हो रहा है. लोग विरोध प्रकट कर सकें, इसे सुनिश्चित करना भी शासन-प्रशासन का ही काम है.

कानूनों, प्रावधानों और प्रशासनिक आदेशों को लागू करने में संयम बरतना जरूरी है. इसी तरह से यातायात या संचार सेवाओं को बहुत आवश्यक होने पर ही बाधित किया जाना चाहिए. हिंसा या तोड़फोड़ की स्थिति में प्रशासन का कड़ा रवैया अपनाना सही है, पर इससे सामान्य नागरिकों और प्रदर्शनकारियों को बेजा परेशानी नहीं होनी चाहिए. इससे लोगों में असंतोष ही पसरेगा और असामाजिक तत्व उन्हें भड़काने की कोशिश भी कर सकते हैं.

धारा 144 के बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार कहा है कि इसे तार्किक और सीमित आधार पर ही लागू किया जाना चाहिए. व्यापक विरोधों के हिंसक होने की आशंका रहती है, पर इसका आधार ठोस होना चाहिए. पूरे राज्य या शहर में इस धारा को लागू करने का कोई तुक नहीं है. हिरासत में जो प्रदर्शनकारी हैं, वे सभी उपद्रवी नहीं हो सकते हैं. उनके साथ सरकार को नरम व्यवहार करना चाहिए तथा उनकी रिहाई पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाना चाहिए.

इससे सरकार और विरोधियों के बीच एक सद्भावपूर्ण माहौल बनाने में मदद मिलेगी, जो कि एक-दूसरे की बात सुनने-समझने के लिए जरूरी है. उल्लेखनीय है कि कुछ जगहों पर कानून के पक्ष में भी प्रदर्शन हुए हैं और अनेक संगठन जनसंपर्क के माध्यम से कानून के बारे में लोगों को जानकारी देने का प्रयास कर रहे हैं. विचारों के आदान-प्रदान से ही रास्ता निकल सकता है. टकराव देश के हित में नहीं है. आशा है कि सरकार और विरोधी खेमे के बीच संवाद की प्रकिया जल्दी शुरू होगी.

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