भारत-नेपाल दोस्‍ती का नया युग

Published at :06 Aug 2014 5:16 AM (IST)
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भारत-नेपाल दोस्‍ती का नया युग

।। रामेश्वर पाण्डेय ।। वरिष्ठ पत्रकार पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के आरोपों को मानें, तो कांग्रेस सरकार की विदेश नीति में पड़ोस उपेक्षित था. इस लिहाज से इस बार गंभीर और पारदर्शी पहल हुई है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आनेवाले वर्षो में इसके अच्छे नतीजे सामने आएंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेपाल दौरे […]

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।। रामेश्वर पाण्डेय ।।

वरिष्ठ पत्रकार

पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के आरोपों को मानें, तो कांग्रेस सरकार की विदेश नीति में पड़ोस उपेक्षित था. इस लिहाज से इस बार गंभीर और पारदर्शी पहल हुई है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आनेवाले वर्षो में इसके अच्छे नतीजे सामने आएंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेपाल दौरे ने दोनों देशों के बीच संबंधों की नयी पटकथा लिखी है. इस पटकथा में परस्पर सहयोग, सम्मान और साझा विकास का संकल्प है. रिश्तों में गतिरोध और अनेक उतार-चढ़ाव के बावजूद नेपाल पहले भी भारत का भरोसेमंद मित्र रहा है.

दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग के कई समझौते अतीत में भी हुए हैं, लेकिन मोदी के इस दौरे की ऐतिहासिकता यह है कि संबंधों को बराबरी के स्तर पर पुनर्परिभाषित करने की ईमानदार कोशिश हुई है.

भारत और नेपाल के बीच राजनयिक संबंधों में सबसे बड़ा गतिरोध का मुद्दा 1950 में हुई भारत-नेपाल मैत्री संधि के कुछ प्रावधान हैं. नेपाल के माओवादियों ने इस संधि का हवाला देते हुए हमेशा भारत की नीयत पर सवाल उठाया है. मोदी ने बहुत सहजता से इस संधि के प्रावधानों को संशोधित करने की मंजूरी देते हुए संदेश दिया कि नेपाल एक संप्रभु राष्ट्र है और भारत उसके आंतरिक मामलों में दखल नहीं चाहता.

इस यात्रा की सफलता का आकलन माओवादी नेता प्रचंड के इस बयान से किया जा सकता है कि ‘मोदी का भाषण दिल को छूनेवाला और उत्साहजनक था. मैं समझता हूं कि भारत-नेपाल रिश्ते में नये अध्याय की शुरुआत होने जा रही है.’ निस्संदेह यह नेपाल से दोस्ती का नया युग शुरू हुआ है.

नेपाल की संविधान सभा में दिया गया मोदी का ‘हिट’ फामरूला (हाइ-वे, इंफार्मेशन-वे और ट्रांस-वे) विकास का रोड मैप है, जिस पर चल कर न केवल नेपाल विकास की मंजिलें तय करेगा, वरन् भारत की प्रगति का भी सहयोगी बनेगा. नेपाल की बिजली भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगी.

मोदी ने यह कह कर कि भारत मुफ्त में बिजली नहीं लेगा, प्रस्तावित ऊर्जा समझौते को लेकर फैलायी जा रही आशंकाओं को भी दूर किया है. हालांकि, मोदी के इस दौरे में प्रस्तावित ऊर्जा समझौते की तिथि कुछ संशोधनों के लिए आगे बढ़ा दी गयी है, लेकिन महाकाली नदी पर 5600 मेगावॉट की पंचेश्वर परियोजना का काम तत्काल शुरू करने पर सहमति बन गयी है. मोदी ने नेपाल को एक अरब अमेरिकी डॉलर का रियायती ऋण देने के अतिरिक्त आयोडीनयुक्त नमक खरीदने के लिए साढ़े छह करोड़ की मदद दी है. दूरदर्शन और नेपाल टेलीविजन के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है.

इस यात्रा का सर्वाधिक रेखांकित करनेवाला पहलू नेपाल का उत्साह और भारतीय प्रधानमंत्री को प्रदान किया जानेवाला सम्मान है. नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने प्रोटोकॉल तोड़ कर एयरपोर्ट पर मोदी की आगवानी की. मोदी पहले विदेशी नेता हैं, जिन्हें नेपाली संसद को संबोधित करने का सम्मान मिला.

सांसदों ने उनके हर विचार के बाद मेज थपथपा कर आदर व्यक्त किया. मोदी पहले व्यक्ति हैं, जिन्हें पशुपतिनाथ मंदिर में राज परिवार की तरह राजकीय रूद्राभिषेक पूजा करायी गयी.

जिन लोगों ने पिछले तीन-चार दशकों में भारत की विदेश नीति के तौर-तरीकों को गौर से देखा है, वे इस बात का सहजता से आकलन कर सकते हैं कि भारत की विदेश नीति का समूचा परिदृश्य अब सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहा है. मोदी का वह निर्णय बड़ी कूटनीतिक पहल थी, जिसमें उनके शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रमुखों ने शिरकत की. यह पहला मौका था, जब भारत के किसी प्रधानमंत्री के शपथग्रहण में इतने राष्ट्राध्यक्ष आये हों.

ब्रिक्स देशों के सम्मलेन में मोदी प्रभावी रहे. खाड़ी देशों में फंसे अपने नागरिकों को जिस कौशल से देश लाया गया, उससे विपक्ष भी आलोचना का कोई प्रभावी तर्क नहीं तलाश पाया.

मोदी मानते हैं कि अगर पड़ोस से रिश्ते मधुर हैं, विवाद के बिंदु बातचीत से निपटा लिये गये, तो पूरे सार्क देशों में सुख आयेगा, समृद्धि आयेगी और इस नये माहौल का नेतृत्व निस्संदेह भारत करेगा. पहले पड़ोस, फिर विश्व. मोदी ने इस आकांक्षा को साकार करने की पृष्ठभूमि भूटान की यात्रा से तैयार की. अब पड़ोस से रिश्तों की प्रगाढ़ता बढ़ाने का पड़ाव नेपाल है.

नेपाल की सीमा तीन तरफ से भारत से मिलती है. 1,560 किमी की यह खुली सीमा है, जो दुनिया में शायद कहीं नहीं. हां, यह भी सच है कि दोनों देशों में समय-समय पर सत्ता समीकरणों के बदलाव और आंतरिक राजनीतिक आग्रहों के चलते संबंधों में उतार-चढ़ाव भी आये. नेपाल के सत्ता तंत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव और नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में पाक-प्रशिक्षित आतंकियों की शरणगाह चिंता के दो बड़े आयाम हैं. 17 वर्षो बाद भारत का कोई प्रधानमंत्री नेपाल गया.

आखिर 17 वर्षो तक यह सन्नाटा क्यों रहा? इसका जवाब हमारी तत्कालीन सरकारों की पड़ोसियों के प्रति रवैये और नीतियों में खोजा जा सकता है. पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के आरोपों को वजन दें, तो कहा जा सकता है कि कांग्रेस सरकार की विदेश नीति में पड़ोस उपेक्षित था. इस लिहाज से इस बार एक गंभीर और पारदर्शी पहल हुई है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आनेवाले वर्षो में इसके अच्छे नतीजे सामने आएंगे.

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