उन्नीस वर्ष का जवान झारखंड
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :02 Dec 2019 5:42 AM (IST)
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रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार ravibhushan1408@gmail.com तीसरे विधानसभा चुनाव (2014) में झारखंड किशोरावस्था में था. अब चौथे विधानसभा चुनाव (30 नवंबर से 20 दिसंबर 2019) में वह युवावस्था में प्रवेश कर चुका है. चुनाव आयुक्त के अनुसार, झारखंड के 24 जिलों में से 19 जिले नक्सल प्रभावित और 13 जिले सर्वाधिक प्रभावित है. पांच चरणों के विधानसभा […]
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रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
ravibhushan1408@gmail.com
तीसरे विधानसभा चुनाव (2014) में झारखंड किशोरावस्था में था. अब चौथे विधानसभा चुनाव (30 नवंबर से 20 दिसंबर 2019) में वह युवावस्था में प्रवेश कर चुका है. चुनाव आयुक्त के अनुसार, झारखंड के 24 जिलों में से 19 जिले नक्सल प्रभावित और 13 जिले सर्वाधिक प्रभावित है. पांच चरणों के विधानसभा चुनाव में पहले चरण का चुनाव 30 नवंबर, शनिवार को संपन्न हो चुका है. पांचों चरणों में कुल 29,464 मतदान केंद्रों पर मतदाताओं को इस बार वोटिंग का अवसर मिला है. पिछले चुनाव में औसत 66 प्रतिशत वोट डाले गये थे. साल 2014 में 65 दलों के 261 और 363 निर्दलीय प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था. पुरुष मतदाताओं की तुलना में महिला मतदाताओं की संख्या अधिक थी.
हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद अब सबकी नजर झारखंड पर है. झारखंड खनिज संपदा बहुल राज्य है. आदिवासी यहां 26.3 प्रतिशत हैं, जिनमें 90 प्रतिशत से अधिक गांव में रहते हैं. इक्यासी सीटों में से विधानसभा की 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है, पर इनमें एकता का अभाव है. झारखंड का आदिवासी समुदाय विभक्त है. इनका न तो अपना कोई एक दल है और न अपनी एक सशक्त आवाज. सभी दलों में ये मौजूद हैं. इस राज्य की स्थापना जिन उद्देश्यों के तहत की गयी थी, घोषित रूप से वे उद्देश्य बिला चुके हैं.
तीन क्षेत्रों- संताल परगना, दक्षिण झारखंड और उत्तर झारखंड में विभाजित इस राज्य में कोई क्षेत्र खुशहाल नहीं है. तीन-तीन बार शिबू सोरेन और अर्जुन मुंडा यहां मुख्यमंत्री बने और तीन बार राष्ट्रपति शासन भी लगा. दलीय निष्ठा कम नेताओं में है. अन्नपूर्णा देवी राजद की राज्य अध्यक्ष थीं, पर अब भाजपा में हैं.
पिछले छह महीनों में कांग्रेस के चार पूर्व अध्यक्ष अजय कुमार, सुखदेव भगत, प्रदीप कुमार बलमुचू और सरफराज अहमद ने पार्टी छोड़ दी. एक दल से दूसरे दल में जाने के उदाहरण कम नहीं हैं. बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री थे.
केंद्रीय मंत्री भी रहे थे, पर भाजपा में दरकिनार किये जाने के कारण उन्हें भाजपा छोड़ कर 24 सितंबर, 2006 को एक नयी पार्टी ‘झारखंड विकास मोर्चा’ (प्रजातांत्रिक) की स्थापना करनी पड़ी. दूसरे विधानसभा चुनाव (2009) में उनके 11 विधायक थे और पिछले चुनाव में आठ, जिनमें से छह ने भाजपा को गले लगाया.
भ्रष्टाचार मुक्त सरकार का दावा करनेवाली भाजपा पर राज्य के केंद्रीय मंत्री सरयू राय ने बार-बार भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया, मोदी-शाह के सामने भी उठाया. उनके सवालों के जवाब न तो अधिकारियों ने दिये, न मुख्यमंत्री ने. भारतीय लोकतंत्र में प्रश्न करना अब राष्ट्रविरोधी, राष्ट्रदोही और ‘अर्बन नक्सल’ हो जाना है. सरयू राय टिकट से वंचित हुए और अब वह निर्दलीय प्रत्याशी की हैसियत से मुख्यमंत्री के विरोध में चुनाव लड़ रहे हैं.
राजनीति करने की नहीं, समझने की जरूरत है. झारखंड में लगभग 16 वर्ष तक भाजपा का शासन रहा है. क्या सचमुच यह गुड गवर्नेंस था? पिछले पांच वर्ष में इस राज्य में भूख से 22 मौतें हुई हैं. लगभग 20 लोग पीट-पीट कर मार डाले गये. अब हेमंत सोरेन झारखंड को ‘लिंचिंग पैड’ कह रहे हैं.
झारखंड के प्रश्न और मुद्दे बरकरार हैं. जल-जंगल-जमीन, लैंडबैंक, शिक्षा, स्वास्थ्य, कुपोषण, बेरोजगारी, अपराध, हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार सारे मुद्दे मौजूद हैं. झारखंड उच्च न्यायालय में राज्य सरकार के खिलाफ लगभग 20 पीआइएल दायर हैं. पहले चरण के चुनाव के एक दिन पहले एक छात्रा से रांची में सामूहिक बलात्कार हुआ. एक विश्वविद्यालय का एक वित्त पदाधिकारी करोड़ों रुपया हजम करके फरार है. उसे आज तक गिरफ्तार नहीं किया जा सका है.
साल 2000 के पहले झारखंड में नक्सली समस्या अधिक नहीं थी. आज छिटपुट ही सही, नक्सली घटनाएं जारी हैं. सिपाही और जवान मारे जा रहे हैं. एक साथ इतने राजनीतिक दलों का चुनाव लड़ना, संभव है, झारखंड की समस्याओं के निराकरण के लिए हो, पर इस बार गठबंधन केवल झामुमो, कांग्रेस और राजद का है. आजसू तो भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ रहा है. मुख्य दल भाजपा, कांग्रेस, झामुमो, आजसू और झाविमो हैं. संयुक्त वामदलों का मात्र चार प्रतिशत वोट है.
मुकाबला त्रिकोणीय, चतुष्कोणीय है. पहली बार ओवैसी की पार्टी इस राज्य में चुनाव लड़ रही है. क्या महाराष्ट्र की राजनीतिक घटनाओं का प्रभाव इस चुनाव पर पड़ेगा? किसी भी दल को शायद ही बहुमत प्राप्त हो. अधिक संभावना त्रिशंकु की है. यह मतदाताओं की सजगता और जागरूकता की परीक्षा की घड़ी है. बागी-विक्षुब्ध नेता कम नहीं हैं. अनेक पूर्व अधिकारी चुनाव लड़ रहे हैं. कुछ लेखक भी. सबसे बड़ा मुकाबला जमशेदपुर पूर्वी सीट पर है. सरयू राय भाजपा को ‘जेबी पार्टी’ बता रहे हैं और सुब्रमण्यम स्वामी उन्हें ‘ईमानदार और विशिष्ट’ कह रहे हैं.
झारखंड राज्य आज अपनी युवावस्था में है, ऊर्जावान और शक्ति संपन्न है. झारखंड विधानसभा का यह चुनाव सबके लिए महत्वपूर्ण है. क्या सचमुच अब झारखंड में बलात्कार नहीं होगा? लूट, छिनैती और अपराध नहीं होंगे?
बेरोजगारी मिटेगी? भ्रष्टाचार घटेगा? जल, जंगल, जमीन की रक्षा होगी? नागरिकों को अपनी सरकार से सवाल पूछने के अधिकार होंगे? आदिवासियों का विस्थापन समाप्त होगा? शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा सबको प्राप्त होगी? क्या यह चुनाव इन सब सवालों का उत्तर देना नहीं चाहेगा?
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