झारखंड सरकार की बेतुकी नीति

करीब एक लाख संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों को हेमंत सरकार बिना स्थानीयता के स्थायी करने जा रही है. इसमें सभी बाहरी राज्यों से हैं. पारा शिक्षकों को स्थायी करने पर सरकार पैसे का रोना रोती है, अब देखना है कि इन कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए सरकार कहां से पैसा जुटायेगी. इसका […]
करीब एक लाख संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों को हेमंत सरकार बिना स्थानीयता के स्थायी करने जा रही है. इसमें सभी बाहरी राज्यों से हैं. पारा शिक्षकों को स्थायी करने पर सरकार पैसे का रोना रोती है, अब देखना है कि इन कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए सरकार कहां से पैसा जुटायेगी.
इसका विरोध आजसू, झाविमो या बीजेपी, कोई नहीं कर रहा है. इस संबंध मे कर्नाटक हाइकोर्ट के एक निर्णय का हवाला दिया जा रहा है. इस तरह से झारखंडी मूलवासी यूवाओं के भविष्य के लिए कब्र खोदी जा रही है. अगर सरकार झारखंडी मूलवासी को इसी प्रकार धोखे में रखेगी, तो अंतत: हमें कोई और विकल्प ढूंढ़ना होगा. राज्य में बेरोजगारी की वजह से ही युवागण नक्सली दस्ते में शामिल होते हैं. हम झारखंड सरकार से अपना हक मांग रहे हैं, न कि उनसे भीख.
महादेव महतो, चंदनकियारी, बोकारो
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