दीवाली की संस्कृति
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 24 Oct 2019 7:43 AM
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कविता विकास लेखिका kavitavikas28@gmail.com अब जब लंका फतह करने के बाद राम के लौटने का वक्त हो रहा है, माहौल में उत्सव की ऊष्मा दिखने लगी है. बाजार सजने लगे हैं. बम-पटाखे, झालर, दीया-बाती आदि खरीदने की चहल-पहल बढ़ गयी है. जिस राम से जिंदगी में आस्था है, दुखों से उबरने की पहल है, उस […]
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कविता विकास
लेखिका
kavitavikas28@gmail.com
अब जब लंका फतह करने के बाद राम के लौटने का वक्त हो रहा है, माहौल में उत्सव की ऊष्मा दिखने लगी है. बाजार सजने लगे हैं. बम-पटाखे, झालर, दीया-बाती आदि खरीदने की चहल-पहल बढ़ गयी है.
जिस राम से जिंदगी में आस्था है, दुखों से उबरने की पहल है, उस राम के लिए दीवाली का उमंग कैसे कम हो सकता है. हमारे समाज में लक्ष्मी के आगमन को भी दीवाली से जोड़कर देखा जाता है. गणेश पूजन के बाद देश में पर्वों का मौसम शुरू हो जाता है. जीवन के उत्सव से जुड़ा है पर्वों का मर्म.
हमारे देश की आत्मा गांव है और ग्राम्य जीवन के उत्पाद पूरे देश का पेट पालते हैं. ऋतुओं से जुड़े पर्वों को मनाने के ढंग भले ही आधुनिकता की भेंट चढ़ रहे हों, पर ग्राम्य संस्कृति अब भी बहुत कुछ सहेजे हुए है.
दीया, मूर्तियां, झाड़ू, धान का लावा आदि जो इस पर्व में चढ़ाये जाते हैं, सीधे-सीधे ग्रामीण संस्कृति की याद दिलाते हैं. धनतेरस की खरीदारी, यम दीया निकालना, जुआ आदि आज भी प्रचलित हैं. इन परंपराओं के निर्वहन में कमी आती नहीं दिखती, जिसका मतलब है कि हम ईश्वर के अस्तित्व में हम अगाध आस्था रखते हैं.
कुछ ज्यादा करना हो, तो अपनी संस्कृति को बरकरार रखकर मिट्टी के दीये खरीदें और करोड़ों गरीबों के निवाले की रक्षा करें. चकाचौंध बिजली-बत्तियां इनका अधिकार छीनती हैं. एक समय था, जब पर्व के साथ अपार खुशियां जुड़ी होती थीं.
वस्तुतः आज भी छोटे बच्चे ही पर्वों का मर्म समझते हैं, जो नये कपड़े पहनकर, मिठाइयां खाकर, मेले में झूला झूलकर और ठेले के गोलगप्पे का आनंद लेकर खुश हो लेते हैं. पहले घर के बच्चे दादी-नानी या बड़ों के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेते थे और कुछ पैसे भी सौगात के तौर पर पाते थे. पर यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है. जैसे-जैसे समाज आधुनिकता के रंग में रंगता जा रहा है, वैसे-वैसे आपसी सौहार्द्र, संस्कृति और आंतरिक खुशी से भी वह दूर होता जा रहा है. इस दूरी को कम करना है.
संस्कृति, इतिहास और भूमि यानी प्रकृति, इन तीनों संपदाओं के समूह को राष्ट्र कहते हैं. देश के महापुरुषों द्वारा निर्मित तथा परिमार्जित जीवन-विधि में संस्कृति है.
संस्कृति और उत्सव मिलकर राष्ट्र-निर्माण करते हैं. पर्वों के मूल में भी यही है कि ये खुशी के प्रतीक स्वरूप ही मनाये जाते हैं. कहीं फसल पकने की खुशी है, तो कहीं बुराई पर अच्छाई के विजय-प्रतीक की खुशी. कहीं जन्मोत्सव की खुशी है, तो कहीं रिश्तों के संरक्षण की खुशी. घर, समाज और देश का धन-धान्य से परिपूर्ण होना पर्व की उत्पत्ति का कारण है.
पर्व हैं, तो संस्कृति है. संस्कृति से ही मानव-मूल्यों का संवर्धन होता है, जिनसे हमारी सभ्यता का पुनर्निर्माण संभव है. अतः जीवन में त्योहारों का आनंद लें. इस बार पुराने रिश्तों को जोड़ लें, कुछ कड़वी बातें भूल जायें, कुछ मीठी बातें बसा लें. इस दीवाली पर पर्यावरण बचाने का संकल्प लेकर शोर और धुएं से देश को बचाने की भी कोशिश होनी चाहिए.
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