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मंदी नहीं कन्फ्यूजन है!

Updated at : 02 Sep 2019 6:46 AM (IST)
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मंदी नहीं कन्फ्यूजन है!

आलोक पुराणिक वरिष्ठ व्यंग्यकार puranika@gmail.com वह कंपनी बोली की पांच रुपये का बिस्कुट का पैकेट न बेच पा रहे हैं. वह शराब कंपनी बोली- हमें देख, हम तो कस्टमर की लाइन लगा देते हैं, कस्मटर बिचारा लू-धूप-पानी में लाइन में लगकर भी हमारा आइटम खरीद रहा है. कोई मंदी न है. कई हजार का फोन […]

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आलोक पुराणिक

वरिष्ठ व्यंग्यकार

puranika@gmail.com

वह कंपनी बोली की पांच रुपये का बिस्कुट का पैकेट न बेच पा रहे हैं. वह शराब कंपनी बोली- हमें देख, हम तो कस्टमर की लाइन लगा देते हैं, कस्मटर बिचारा लू-धूप-पानी में लाइन में लगकर भी हमारा आइटम खरीद रहा है. कोई मंदी न है. कई हजार का फोन लांच हुआ उस वेबसाइट पर, कुछ मिनटों में सारा बिक गया. कंपनी बोली- अब न बचे बेचने को. मंदी है कि नहीं, यह सवाल तेज हो गया है.

बाढ़ की समस्या से मुक्त हो गया है, क्योंकि मंदी आ गयी है. मंदी से मुक्त हो जायेंगे, जब कोई नया बवाल आ जायेगा. बाढ़ से मुक्ति मंदी ही दिलवा सकती है. दरअसल मुल्क नहीं है, यह कन्फ्यूजन है. क्या है, यही ताड़ने में बहुत वक्त निकल जाता है, तब तक हालात फिर बदल जाते हैं.

मायावती जी के बयान का आशय है कि विपक्ष के नेताओं को कश्मीर इस तरह से नहीं जाना चाहिए, हालात धीमे-धीमे सुधरेंगे. समझना मुश्किल है कि विपक्ष की नेता मायावती सरकार की मदद कर रही हैं या विपक्ष की.

एक बिस्कुट कारोबारी कह रहे हैं कि बिस्कुट न बेच पा रहे हैं. पर सोना दनादन बिक रहा है. सरकारी प्रवक्ता साबित कर सकता है कि मुल्क अब विश्वगुरु होकर सोने की चिड़िया बन जायेगा. लोग जुट गये हैं सोने की चिड़िया बनने में. कन्फ्यूजन फिर भी है कि विश्वगुरु बनेगा या सोने की चिड़िया.

सबसे बड़ी शराब कंपनी ने बताया- जून 2019 के तिमाही परिणामों में बताया कि मुनाफे में 143 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जून 2018 के मुकाबले. भारतीय बिस्कुट न खा रहे हैं दारु पीये जा रहे हैं दनादन. ठेका देशी बिस्कुट टाइप कुछ खोल दिया जाये, तो बिस्कुट भी शराब की स्पीड से बेचे जा सकते हैं.

छोटी कारों, सस्ती कारों के कारोबारी कह रहे हैं कि कार न बिक रही हैं. उधर करीब दस लाख रुपये की कार की सेल यह हालत हुई कि कंपनी ने हाथ खड़े कर दिये कि हम न सप्लाई कर पायेंगे अब. सरकारी प्रवक्ता साबित कर सकते हैं कि इकोनॉमी की रफ्तार ऐसी हो गयी है कि भारतवासी छोटी कार खरीद ही नहीं रहे हैं, सीधे बड़ी ही कार की तरफ कूद रहे हैं.

भारतवासी सीधे ही बड़ी कारों की तरफ जा रहे हैं, यानी विकास की रफ्तार तेज है. अलबत्ता रफ्तार रुक जाती है सड़कों पर, जिनके बनने की रफ्तार उतनी तेज नहीं है, जितनी तेजी से कारें बिक रही हैं.

एक कंपनी ने करीब अस्सी हजार का मोबाइल लांच किया, तो आंकड़ों से साफ हुआ कि इसके पहले इसी टाइप के पहले लांच हुए महंगे मोबाइल के लिए जितने संभावित ग्राहकों ने रजिस्ट्रेशन कराया था, उनके मुकाबले इस बार दोगुने ग्राहकों ने रजिस्ट्रेशन कराया. विपक्ष सरकार को यूं घेर सकता है कि अब लोग सारी रकम दारु और मोबाइल पर खर्च कर रहे हैं.

इस बात पर सरकार कह सकती है कि जब दारु और मोबाइल पर धुआंधार खर्च करने को पैसा है, तो फिर मंदी कहां है? आखिर में है क्या, इसे माना क्या जाए? मैंने पहले ही बता दिया है- मुल्क नहीं है, यह कन्फ्यूजन है.

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