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कश्मीर पर ट्रंप की कपटचाल

Updated at : 24 Jul 2019 7:36 AM (IST)
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कश्मीर पर ट्रंप की कपटचाल

पुष्पेश पंत अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार pushpeshpant@gmail.com अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने उबड़-खाबड़, ताबड़तोड, बड़बोले-बेतुके बयानों को लिए काफी बदनाम हैं. पर इससे उन्हें रत्तीभर फर्क नहीं पड़ता और वह बदस्तूर अपनी रफ्तार से राजनयिक गाड़ी को पटरी पर दौड़ाते रहते हैं, जिसका अचानक दुर्घटनाग्रस्त होना कभी भी संभव है. इस बार उन्होंने पेशकश की […]

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पुष्पेश पंत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
pushpeshpant@gmail.com
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने उबड़-खाबड़, ताबड़तोड, बड़बोले-बेतुके बयानों को लिए काफी बदनाम हैं. पर इससे उन्हें रत्तीभर फर्क नहीं पड़ता और वह बदस्तूर अपनी रफ्तार से राजनयिक गाड़ी को पटरी पर दौड़ाते रहते हैं, जिसका अचानक दुर्घटनाग्रस्त होना कभी भी संभव है. इस बार उन्होंने पेशकश की है कि कश्मीर विवाद को निबटाने के लिए वह भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने के लिए तत्पर हैं.
यह बात उन्होंने उस वक्त कही, जब वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के अमेरिकी दौरे के वक्त वह उनकी मेजबानी कर रहे थे. यह बात पाकिस्तान के पुराने दोस्त अमेरिका के अनेक पूर्व राष्ट्रपति भी सुझा चुके हैं और भारत ने हमेशा ऐसे हर प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया है, क्योंकि हमारी सरकार का यह मानना है कि कश्मीर का विवाद उभयपक्षीय है और इसका समाधान भारत और पाकिस्तान खुद ही बिना किसी तीसरी ताकत और हस्तक्षेप के ढूंढने में सक्षम हैं.
यह बात ताशकंद और शिमला समझौते के वक्त भी रेखांकित की जा चुकी थी. इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि जब-जब पाकिस्तान की गर्दन किसी शिकंजे में फंसी होती है, तब वह मध्यस्थता की बात भूल जाता है और भारत को यही आश्वासन देता है कि वह इस तरीके से विवाद के निबटारे के लिए राजी है, पर जरा-सी राहत मिलते ही उसके तेवर टेढ़े होने लगते हैं और वह कश्मीर समस्या के अंतरराष्ट्रीयकरण की मांग जोर-शोर से उठाने लगता है.
जहां तक ट्रंप का सवाल है, उन्हें यह मुगालता है कि वह दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति ही नहीं, सौदे पटाने में माहिर सफल व्यापारी भी हैं. उनकी नजर में हर अंतरराष्ट्रीय विवाद को एक कारोबारी सौदे की तरह पटाया जा सकता है.
जो बात इस वक्त उनके सुझाव को बेतुका बना रही है, वह यह है कि पाकिस्तान चारों तरफ से घिरा है और बुरी तरह कंगाल है. पाकिस्तान नहीं चाहता कि अमेरिका उसके ऊपर अपनी सहायता की एवज में और अधिक दबाव बढ़ाए. यदि किसी प्रकार इमरान खान कश्मीर विवाद के निबटारे के बहाने भारत पर भी ‘ट्रंप का कुछ दबाव’ जगजाहिर कर सके, तो वह अपने देशवासियों से यह कहने की हालत में होंगे कि उन्होंने अमेरिका के सामने घुटने नहीं टेके हैं.
जहां तक भारत का सवाल है, उसे इस कपटचाल में नहीं फंसना चाहिए. पाकिस्तान के किसी भी आतंकवादी हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भारत सीमा पार जा कर सर्जिकल स्ट्राइक करने का जोखिम उठा सकता है. कश्मीर की घाटी में सक्रिय हुर्रियत के अलगावादियों की तथा बुरहान वानी को पोस्टरबॉय बना कर महिमा मंडित करनेवाले नौजवान दहशतगर्दों की भी कमर टूट चुकी है. कश्मीरी अवाम का समर्थन निरंतर घटता जा रहा है, क्योंकि उन्होंने अपने अनेक कश्मीरी भाइयों को भी निशाना बना कर अपने खूंखार मौकापरस्त चेहरों को बेनकाब कर दिया है.
भारत को यह बात अच्छी तरह समझ आ चुकी है कि पाकिस्तान हो या स्थानीय अलगाववादी, दोनों खस्ताहाल हैं और हमें बिना शर्त अपनी इच्छानुसार, जिससे चाहे उससे संवाद करने का मौका मिल रहा है.
इसी संदर्भ में चीन का जिक्र जरूरी है. पाकिस्तान ने कई दशक पहले जम्मू-कश्मीर के जिस हिस्से पर नाजायज कब्जा किया था, उसका एक बड़ा हिस्सा चीन को सौंप दिया. तब चीन के लिए इसकी उपयोगिता तिब्बत के लॉपनोर क्षेत्र में अपने परमाण्विक कार्यक्रम के संदर्भ में और तिब्बती विद्रोह को कुचलने के लिए थी.
आज इसका और भी अधिक संवेदनशील सामरिक महत्व है, क्योंकि इसी गिलगिट बालटिस्तान वाले इलाके से होकर वह ऐतिहासिक रेशम राजमार्ग गुजरता है, जो चीन को कराची के निकट ग्वादर के बंदरगाह से जोड़ता है. भारत ने चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना का निरंतर विरोध इसलिए किया है कि चीन ने उस भूमि से होकर गुजरनेवाले राजमार्ग के लिए पाकिस्तान की ‘अनुमति’ यथेष्ठ समझा है, जबकि इस भूमि पर भारत अपनी संप्रभुता की दावेदारी मुखर कर चुका है.
पाकिस्तान की ही तरह चीन भी इस समय घिरा हुआ है. अमेरिका के साथ वाणिज्य युद्ध के कारण उसकी आर्थिक विकास दर में जबर्दस्त गिरावट आयी है.
चीनी राष्ट्रपति भारत को यह संकेत दे चुके हैं कि उनका देश भारत-चीन सीमा विवाद के स्थायी समाधान के लिए उत्सुक है. पाकिस्तान का प्रयास यह रहा है कि चंूकि अक्साई चिन वाला इलाका जम्मू-कश्मीर राज्य के लद्दाख प्रदेश में स्थित है, अतः यह दलील दी जा सके कि कश्मीर विवाद के आज दो नहीं तीन पक्ष हैं.
भारत इस बात को कतई स्वीकार नहीं कर सकता, क्याेंंकि भारत चीन के साथ सीमा विवाद के निबटान में जो कुछ लेन-देन जब भी करेगा, उसमें पूर्वी सरहद का सिक्किम और अरुणाचल वाला बहुत बड़ा हिस्सा शामिल होगा, जिसका पाकिस्तान से कोई लेना-देना नहीं है. भारत-चीन सीमा विवाद भी उभयपक्षीय है, जिसमें किसी ‘ईमानदार पंच’ या मध्यस्थ की कोई गुुंजाइश नहीं है.
ट्रंप के बयान की पृष्ठभूमि के कुछ और जटिल आयाम हैं, जिन्हेें अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. ट्रंप का दावा है कि हाफिज सईद को गिरफ्तार करवाने में और अजहर मसूद को आतंकवादी घोषित करवाने में उनकी अहम भूमिका रही है, जिसके लिए भारत को उनका आभार मानना चाहिए.
इसकी एवज में यदि वह अब अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए कश्मीर विवाद में मध्यस्थता की भूमिका चाहते हैं, तो इस गलतफहमी से उन्हें जल्द-से-जल्द छुटकारा दिलाना चाहिए. भारत और अमेरिका के बीच भले ही अभी अमेरिका के साथ वाणिज्य युद्ध जैसे हालात पैदा नहीं हुए है, पर ट्रंप अमेरिकी दोस्ती की अच्छी-खासी कीमत वसूल कर चुके हैं. मसलन उन्हें खुश करने के लिए भारत ने ईरान से तेल के आयात में कटौती की है और चाबहार बंदरगाह की परियोजना को लगभग ठंडे बस्ते में डाल दिया है.
इसकी एवज में ट्रंप ने भारत को कोई रियायत आर्थिक क्षेत्र में नहीं दी है. भारतीय उत्पादों पर शुल्क बढ़ाये जा चुके हैं और एच-1 बी वीजा मामले में भी भारत के साथ सख्ती बरती जा रही है. विश्व व्यापार संगठन को अंगूठा दिखाते ट्रंप भारत जैसे विकासशील देशों से उत्पादों और सेवा के आयात पर शुल्केतर प्रतिबंध भी बढ़ाते जा रहे हैं.
इस सब को ध्यान में रखते हुए भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद में उनकी मध्यस्थता का प्रस्ताव पुराने मुहावरे में कबाब में हड्डी ही कहा जा सकता है, जो कभी भी हमारे गले की जानलेवा फांस बन सकती है.
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