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समाज में बुजुर्गों की अनदेखी

Updated at : 17 Jun 2019 5:57 AM (IST)
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समाज में बुजुर्गों की अनदेखी

आशुतोष चतुर्वेदी प्रधान संपादक, प्रभात खबर ashutosh.chaturvedi @prabhatkhabar.in देश की बड़ी आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है. बेहतर खान पान और स्वास्थ्य सेवाओं ने लोगों की उम्र बढ़ा दी है, लेकिन हालात बदल रहे हैं और पुराना सामाजिक तानाबाना टूटता जा रहा है. संयुक्त परिवारों का दौर चला गया. एकल परिवारों में मां-बाप के […]

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आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi
@prabhatkhabar.in
देश की बड़ी आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है. बेहतर खान पान और स्वास्थ्य सेवाओं ने लोगों की उम्र बढ़ा दी है, लेकिन हालात बदल रहे हैं और पुराना सामाजिक तानाबाना टूटता जा रहा है. संयुक्त परिवारों का दौर चला गया. एकल परिवारों में मां-बाप के लिए स्थान नहीं है.
बुजुर्गों की देखभाल एक व्यापक समस्या के रूप में सामने आ रही है. सबसे चिंताजनक पहलू है कि समाज ने बुजुर्गों का सम्मान करना बंद कर दिया है. उनके अनुभव का लाभ उठाने की बजाय उन्हें बोझ समझा जाने लगा है. यह नयी सामाजिक व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है.
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सामाजिक सुधार के मामले में अव्वल हैं. राज्य में शराबबंदी, दहेज प्रथा और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने की पहल के बाद उन्होंने बुजुर्गों को सम्मान की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाया है.
बेटे-बेटियों से प्रताड़ित होनेवाले माता-पिता को यह अधिकार दिया गया है कि अब वे डीएम के पास अपील कर सकेंगे. उन्हें शिकायत के लिए अब परिवार न्यायालय में जाने की जरूरत नहीं होगी़ ऐसे मामलों की अपील की सुनवाई करने का अधिकार अब डीएम को सौंपा गया है. बिहार कैबिनेट ने माता-पिता के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित अपील अधिकरण के अध्यक्ष डीएम को बनाने की मंजूरी दे दी है.
इसके पहले यह प्रक्रिया जटिल थी. माता-पिता भरण पोषण की जिम्मेदारी किसी संतान द्वारा न निभाने पर अनुमंडल स्तर पर एसडीओ की अध्यक्षता में गठित ट्रिब्यूनल में हस्तक्षेप का निवेदन कर सकते थे. ट्रिब्यूनल के फैसले का पालन नहीं होने पर उन्हें जिले के परिवार न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के कोर्ट में अपील के लिए जाना पड़ता था. उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार यह कानून 2007 में बना, लेकिन जटिल प्रक्रिया के कारण अब तक कोई भी वरिष्ठ नागरिक परिवार अपील में नहीं गया है. बुजुर्गों के पास या तो साधन नहीं थे या वे अदालत जाने का साहस नहीं जुटा पाये. इसे देखते हुए नीतीश सरकार ने इसमें परिवर्तन किया. इससे यह सुविधा होगी कि समाज कल्याण विभाग समय-समय पर माता-पिता व वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं की मॉनीटरिंग भी कर सकेगा.
इसके पहले सुनवाई का अधिकार परिवार न्यायालय में होने के कारण विभाग उसकी समीक्षा नहीं कर सकता था. माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 25 (2) में सजा का प्रावधान है. इस प्रकार का अपराध संज्ञेय और जमानतीय है. इस कानून के तहत ट्रिब्यूनल बेटे-बेटी को पैतृक संपत्ति से बेदखल भी कर सकता है.
दरअसल, नयी अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी के साथ भारत भी ग्लोबल हो रहा है. हम पश्चिम का मॉडल तो अपना रहे हैं, लेकिन उससे उत्पन्न हो रही समस्याओं पर हमारा ध्यान नहीं गया है. जब भारत में वैश्वीकरण का दौर शुरू हुआ था, तो इसके असर के बारे में गंभीर विमर्श नहीं हुआ. अगर वैश्वीकरण के फायदे हैं, तो अनेक नुकसान भी हैं.
यह संभव नहीं है कि आप विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति दें और आपकी संस्कृति में कोई बदलाव न आए. कुछ समय पहले तक भारत में संयुक्त परिवार की व्यवस्था थी, जिसमें बुजुर्ग परिवार के अभिन्न हिस्सा थे. यह खंडित हो गयी. नयी व्यवस्था में परिवार एकल हो गये- पति, पत्नी और बच्चे. यह पश्चिमी देशों का मॉडल है.
इसमें माता-पिता का कोई स्थान नहीं हैं. जब भी मौका मिलता है, मैं अपने इस अनुभव को साझा करता हूं. बीबीसी में नौकरी के दौरान मुझे लंदन में रहने का अवसर मिला. बीबीसी बेहद प्रतिष्ठित और उदार मीडिया संस्थान है. उस दौरान पूरे परिवार को लंदन जाने के लिए आश्रित वीजा और हवाई यात्रा का टिकट मिला, तो मैंने कहा कि कि मेरी मां मुझ पर निर्भर है और मैं अकेला बेटा हूं, उन्हें भी आश्रित वीजा और यात्रा का टिकट चाहिए. बीबीसी ने बताया कि पश्चिम के सभी देशों में परिवार की परिभाषा है- पति, पत्नी और 18 साल से कम उम्र के बच्चे.
बूढ़े मां-बाप और 18 साल से अधिक उम्र के बच्चे परिवार का हिस्सा नहीं माने जाते हैं. अगर आप गौर करें, तो पायेंगे कि भारत में भी अनेक संस्थान और विदेशी पूंजी निवेश वाली हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां परिवार की इसी परिभाषा पर काम करने लगी हैं. सामाजिक व्यवस्था में आये इस बदलाव को हमने नोटिस नहीं किया है.
जीवन के दो पड़ाव है बचपन और बुढ़ापा, जब हर शख्स को सहारे की जरूरत पड़ती है. कुछ समय पहले विश्व फोटोग्राफी दिवस पर बीबीसी की वेबसाइट ने वृद्धाश्रम में रोती दादी-पोती की तस्वीर को सबसे प्रभावशाली तस्वीरों में से एक माना था.
स्कूली बच्चों को अहमदाबाद के एक वृद्धाश्रम ले जाया गया था. वहां मौजूद फोटोग्राफर ने अनुरोध किया कि अगर बच्चे और वृद्धाश्रम की महिलाएं एक साथ बैठेंगे, तो तस्वीर अच्छी आयेगी, लेकिन इस दौरान एक बच्ची एक वृद्धा से मिल कर जोर-जोर से रोने लगी. पता चला कि वे तो दादी-पोती हैं और बच्ची को पता ही नहीं था कि दादी वृद्धाश्रम में रह रही है.
माता-पिता ने उसे झूठ बोला था कि दादी उन्हें छोड़ कर गांव चली गयी है. यह तस्वीर देश में वृद्धजनों को लेकर समाज की सोच में आये बदलाव को दर्शाती है. ऐसा अनुमान है कि भारत में अभी छह फीसदी आबादी 60 साल या उससे अधिक की है, लेकिन 2050 तक बुजुर्गों की इस संख्या के बढ़ कर 20 फीसदी तक होने का अनुमान है.
पश्चिमी देशों में वृद्धजनों के सामने चुनौती है, लेेकिन अलग किस्म की है. उनके लिए पर्याप्त पेंशन की व्यवस्था है. उनके सामने मुख्य समस्या एकाकीपन की है.
वयस्क होने पर बच्चे अलग रहने लगते हैं और केवल विशेष अवसरों पर ही उनसे मिलने आते हैं. पश्चिमी देशों में बुजुर्गों की देखभाल के लिए ओल्ड एज होम जैसी व्यवस्था है, लेकिन भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. पश्चिमी देशों की आबादी भी कम है, छोटे देश हैं, वहां व्यवस्था करना आसान है. भारत जैसे बड़ी आबादी और बड़े भू-भाग वाले देश में कोई भी व्यवस्था करना बेहद कठिन काम है.
बुजुर्ग यदि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हुए, तो समस्या और जटिल हो जाती है. उम्र के इस पड़ाव पर स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ जाता है. संगठित क्षेत्र में काम करने वालों को तो पेंशन या रिटायरमेंट के बाद की अन्य वित्तीय सुविधाएं मिल जाती हैं. असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है.
उन्हें ऐसी कोई सुविधा हासिल नहीं होती. केंद्र और राज्य सरकारें वृद्धावस्था पेंशन देती हैं, पर उसकी राशि नाकाफी है. आगामी कुछ वर्षों में यह समस्या और व्यापक और गंभीर होती जायेगी. इसके समाधान में सरकार और सामाजिक संस्थाओं को जुटना होगा, तभी कोई रास्ता निकल पायेगा.
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