व्यस्तता का बहाना

Updated at : 14 May 2019 6:29 AM (IST)
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व्यस्तता का बहाना

कविता विकास लेखिका kavitavikas28@gmail.com बिखरे बाल, बेतरतीब पड़े कमरे, चेहरे पे शिकन भले ही खुद को अति व्यस्त साबित करने के लिए बने-बनाये लक्षण हों, पर ये ढर्रे आंतरिक बेचैनी, थकान, हताशा या संदेह को प्रकट करने में ज्यादा सक्षम हैं. जिम्मेदारियों और परिवार-समाज की अपेक्षाओं को वहन करने से कतरानेवाले लोग खुद को वर्तमान […]

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कविता विकास

लेखिका

kavitavikas28@gmail.com

बिखरे बाल, बेतरतीब पड़े कमरे, चेहरे पे शिकन भले ही खुद को अति व्यस्त साबित करने के लिए बने-बनाये लक्षण हों, पर ये ढर्रे आंतरिक बेचैनी, थकान, हताशा या संदेह को प्रकट करने में ज्यादा सक्षम हैं.

जिम्मेदारियों और परिवार-समाज की अपेक्षाओं को वहन करने से कतरानेवाले लोग खुद को वर्तमान में इतना व्यस्त बतलाते हैं कि भविष्य की योजनाओं पर ध्यान देने से दूर भागते हैं. गांधी जी ने कहा था- 24 घंटे का समय सोने-जागने से लेकर व्यक्तित्व से जुड़ी हर गतिविधि को करने में सक्षम है.

जिंदगी जीना भी एक मैनेजमेंट है. जो लोग खुद को व्यस्त कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने का काम करते हैं, उन्हें परिवार और समाज की उदासीनता झेलनी पड़ती है. धीरे-धीरे ऐसे लोगों से सभी कटने लगते हैं.

व्यस्तता एक उबाऊ शब्द है. यह आत्म-प्रशंसा का सूचक है, जिसमें घमंड और स्वार्थ का पुट ज्यादा है. ऐसे लोग स्वयं को इस तरह से प्रस्तुत करते हैं कि उनके पास इतने जरूरी काम हैं कि वे किसी और की तरफ देख-सुन भी नहीं सकते. यह उनकी आत्म-दयनीयता और आत्म-क्षोभ को भी दिखलाता है.

आपसी संवाद और मिलना-जुलना संबंधों को प्रगाढ़ बनाता है. आपसी संवाद से समस्याओं के निदान होते हैं. जीवन में अवसरों के रास्ते खुलते हैं.

मोटिवेशनल स्पीकर डेव उर्सिलो ने व्यस्त शब्द को एक समस्या माना है. यह भाव जीवन को संकुचित बनाता है. आत्म-प्रशंसा का एक खोखला दावा प्रस्तुत करनेवाला यह शब्द मानसिक बीमारी का लक्षण है. यह स्वार्थपन की उच्च पराकाष्ठा है. अपने जीवन में अधिक पूर्णता और संतुलन को विकसित करने की क्षमता को ऐसे लोग खो देते हैं.

हालांकि, इनमें अपवाद भी हैं, कुछ बड़े उद्योगपति, चिंतक या समाज सुधारक, जो वाकई व्यस्त हैं, उनके पास समयाभाव हो सकता है, पर ये अपनी व्यस्तता का रोना नहीं रोते. ये यथासंभव मेल-मिलाप के दरवाजे भी खुला रखते हैं. अनेक सफल लोग सुबह की शुरुआत ही पब्लिक मीटिंग से करते हैं.

व्यस्तता की आड़ में छुपनेवालों को इनसे सबक लेना चाहिए. जिस दिन मनुष्य यह सोच ले कि वह व्यस्त नहीं है, उस दिन से उसकी जीवन-दिशा बदल जायेगी. अपनी खूबियों को तराशने के साथ-साथ समाज से भी वह जुड़ने लगेगा. जिन बातों को वह महत्व नहीं देता है, उन पर भी महत्व देने लगेगा. उसके लिए हर आदमी खास हो जायेगा और सबके दुख-सुख से जुड़ाव महसूस करेगा.

रोजमर्रा की जिंदगी भी उम्मीद रखती है, मानसिक शांति मांगती है, आराम और हंसने-गाने के लिए वक्त मांगती है, जिन्हें वही मनुष्य दे सकता है, जो व्यस्त रहते हुए भी स्वयं को व्यस्त नहीं मानता.

बड़ी खुशियों का इंतजार ना करें, छोटी-छोटी खुशियों में जीवन की सार्थकता तलाशें. छोटी खुशियां तभी मिलेंगी, जब छोटे-छोटे आपस के पलों को मनुष्य बांटता है. व्यस्तता मन का एक विकार है, इसे हटाना अपने ही हाथ में है. बस थोड़ा आत्मबल, अनुशासन और आत्मसंयम हो.

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