शक्ल से ‘गरीब’ नजर आऊं
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :11 Apr 2019 5:43 AM (IST)
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अंशुमाली रस्तोगी व्यंग्यकार anshurstg@gmail.com मैं ‘अमीर’ नहीं होना चाहता. ‘गरीब’ ही बना रहना चाहता हूं. मैं नहीं चाहता मेरे कने कार हो, बंगला हो, रुपया-पैसा हो, मकान-दुकान हो. मेरा मानना है कि यह सब अमीरों के चोचले हैं! मैं चाहता हूं, मेरे पास कबाड़ा साइकिल हो, मेरे मकान में न छत हो न खिड़की, मेरे […]
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अंशुमाली रस्तोगी
व्यंग्यकार
anshurstg@gmail.com
मैं ‘अमीर’ नहीं होना चाहता. ‘गरीब’ ही बना रहना चाहता हूं. मैं नहीं चाहता मेरे कने कार हो, बंगला हो, रुपया-पैसा हो, मकान-दुकान हो. मेरा मानना है कि यह सब अमीरों के चोचले हैं! मैं चाहता हूं, मेरे पास कबाड़ा साइकिल हो, मेरे मकान में न छत हो न खिड़की, मेरे कपड़ों में पड़े बेतरतीब छेद मेरी दयनीयता की कहानी खुद बयान करें. मेरी जिंदगी पूरी तरह से ‘उधार’ पर टिकी हो और मैं शक्ल से ही ‘गरीब’ नजर आऊं.
गरीब होना अभिशाप नहीं, बल्कि ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ है. गरीब और गरीबी की सबसे अधिक ‘पूछ’ राजनीति में ही होती है. मौका अगर चुनाव का हो तो क्या ही कहने. फिर तो हर पार्टी का छोटा-बड़ा नेता देश से गरीबी हटाने के वायदे कुछ यों करने लग जाता है जैसे- एक जमाने में कभी हम ‘पोलियो’ खत्म करने की बातें किया करते थे.
नेताओं के इतना प्रयास करने के बाद भी देश से गरीब और गरीबी दूर होने का नाम ही नहीं लेते. बल्कि ये सुरसा के मुंह की भांति फैलते ही जा रहे हैं. हकीकत यह है कि हर घर में कोई न कोई गरीब निकल ही आता है.
ऐसा नहीं है कि अमीर सिर्फ अमीर ही होते हैं, वे भी गरीब होते हैं, मगर वे कुछ अलग टाइप के गरीब होते हैं. अमीरों की गरीबी उनके चेहरे पर नहीं, व्यवहार में नजर आती है. मैं ऐसे तमाम अमीर किस्म के गरीबों को अच्छी तरह से जानता हूं, जिन्हें खुद को गरीब कहलवाना बेहद पसंद है.
खैर, इस वक्त हमारे देश का मौसम चुनावी है. ऐसे में गरीब की याद न आये, यह तो हो ही नहीं सकता. चारों तरफ बस गरीबों के ही चर्चे हैं. पार्टियों के घोषणापत्रों में गरीबों के लिए ऐसी-ऐसी क्रांतिकारी योजनाएं हैं कि पढ़कर मुंह में पानी आया जा रहा है.
गरीब के हित की बात अब बहत्तर हजार तक पहुंच गयी है. नित दिन कोई न कोई नेता गरीबों के लिए किसी न किसी लाभकारी योजना की घोषणा कर ही देता है. ऐसा समझ लीजिये कि गरीबों की दसों उंगलियां घी और सिर कड़ाही में है. बिन बरसे ही सोना चारों तरफ से उन पर बरस रहा है.
यही वजह है कि मैं गरीबी रेखा से ऊपर नहीं उठना चाहता. बीवी को भी सख्त निर्देश दे दिये हैं कि वह हर ओर से गरीब ही लगे, गरीब के अतिरिक्त कुछ नहीं.
फिर भी, देश में कुछ ऐसी ‘गरीब विरोधी ताकतें’ हैं, जो नेताओं की ‘गरीब कल्याण योजनाओं’ पर किस्म-किस्म के सवाल उठाती हैं. उन्हें ‘बोगस’ बताती हैं. लोग हैं, कहते ही रहते हैं. किंतु आप लोगों के कहे का जरा भी असर मत लीजिये.
जो नेता कह रहे हैं बस आंखें मूंदकर मान लीजिये. सरकार बन जाने के बाद वे देश के प्रत्येक गरीब को गरीबी रेखा से ऊपर उठकर अमीरी की सीमा में ले आयेंगे. उनके वायदों पर अपनी उम्मीद को बनाये रखिये बस. फिलहाल, मैं तो अपना उपनाम ही ‘गरीब’ रखने की सोच रहा हूं! आप भी ऐसा ही कुछ सोच रहे हैं क्या?
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