चढ़ावा देख कर जलते क्यों हो ?

Updated at : 27 Jun 2014 3:45 AM (IST)
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चढ़ावा देख कर जलते क्यों हो ?

।।सत्य प्रकाश चौधरी।। (प्रभात खबर, रांची) कहते हैं कि इस कलियुग में भगवान का मिलना आसान है, पर असली घी का मिलना नामुमकिन. मैं जानता हूं, आप इस ‘नामुमकिन’ पर सवाल उठाये बिना मानेंगे नहीं, इसलिए पहले ही जवाब दे दूं- भई आजकल हवा, पानी, धूप, घास सबमें मिलावट है, रासायनिक खाद से लेकर कीटनाशक […]

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।।सत्य प्रकाश चौधरी।।

(प्रभात खबर, रांची)

कहते हैं कि इस कलियुग में भगवान का मिलना आसान है, पर असली घी का मिलना नामुमकिन. मैं जानता हूं, आप इस ‘नामुमकिन’ पर सवाल उठाये बिना मानेंगे नहीं, इसलिए पहले ही जवाब दे दूं- भई आजकल हवा, पानी, धूप, घास सबमें मिलावट है, रासायनिक खाद से लेकर कीटनाशक तक की. ऐसे में गाय-भैंस शुद्ध दूध कहां से दें और कहां से असली घी तैयार हो? तो साहब ऐसे संगीन वक्त में, जब लोगों को असली घी की चिंता करनी चाहिए, कुछ लोग ‘असली भगवान’ की चिंता में घुले जा रहे हैं.

ये वो लोग हैं जिनकी पांचों उंगलियां बरहो महीने लगभग असली (धरती पर उपलब्ध अधिकतम शुद्ध) घी में डूबी रहती हैं और जिनके पेट से लेकर चेहरे तक पर घी की चिकनाई नजर आती है. ये अलग बात है कि इन्हें चिकना (कृपा करके कोई भाई इसमें ‘घड़ा’ नहीं जोड़ देना, वरना बिना गिने पड़ेंगे) बनाने में उन भक्तों का भी पूरा योगदान होता है जिनके घर में दाल छौंकने भर का भी घी नहीं होता.

ऐसे ही एक चिकने महानुभाव ने अभी फरमाया कि अपना भगवान भगवान है और दूसरे का भगवान दुकान. हे महानुभाव! आप हिंदू धर्माचार्यो के बीच सबसे ऊंची कुरसी पर बैठे हैं, विद्वान हैं, पर बात नादानों जैसी कर रहे हैं. आपके आदि-गुरु ने माया को अविद्या कहा था और आप माया देख कर चौंधिया रहे हैं. आप को अखर रहा है कि एक फकीर के मंदिर में तिरुपति बालाजी के टक्कर में क्यों धन बरस रहा है? वह भी एक ऐसे फकीर के जिसके हिंदू होने पर संदेह है या यूं कहें कि वह मुसलमान भी हो सकता है! आप चढ़ावा देख कर जल रहे हैं और मैं यह सोच कर परेशान रहता हूं कि जमीन पर सोनेवाले उस बेचारे फकीर की आत्मा कितनी तड़पती होगी जब वह अपनी मूर्ति को सोने के सिंहासन पर विराजमान देखता होगा.

आपको इस दुनिया से जा चुके फकीर से हिंदू धर्म को खतरा महसूस हो रहा है, पर आसाराम बापुओं और निर्मल बाबाओं से यह खतरा कितना ज्यादा है, आप कभी महसूस नहीं कर पाये. टीवी पर रोज सुबह ऐसे बाबाओं ने कब्जा कर रखा है, जो बताते हैं कि शनिवार को काले नाग को काली गाय का सफेद दूध चढ़ायें, सोमवार को सफेद धोती पहन कर सफेद पानी में सफेद तिल बहायें, मनोकामना पूर्ण होगी. इनके खिलाफ तो आप कभी कुछ नहीं बोले! गांधी जी ने कहा था कि हिंदू होने का अर्थ सत्य की निरंतर तलाश है. लेकिन यहां तो झूठ का बाजार सजा है. गोलगप्पा खाओ और ‘किरपा’ पाओ. मन्नत पूरी होने की आस दिखे, तो लोग कीचड़ में कूदने को तैयार बैठे हैं. तो हे महानुभाव! आप धर्मगुरुओं को चिंता इस बात की होनी चाहिए कि हिंदू धर्म में सच की तलाश करनेवाले कहां गुम होते जा रहे हैं? हो सकता है कि दूसरे धर्मो का हाल और बुरा हो, पर आपको तो अपना घर देखना है न! और हां, चढ़ावा देख कर जलो नहीं, पीछा करो..

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