हिमालय नज्म रचता है
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 09 Jan 2019 5:34 AM
नाजमा खान टेलीविजन पत्रकार nazmakhan786@gmail.com सुना था एक शायर के लिए सबसे बड़ी दाद वह होती है, जब शेर सुननेवाला दाद देना ही भूल जाये. मेरी भी बिल्कुल ऐसी ही हालत थी. मैं उस शायर की नज्म को सुन रही थी, रूह तक महसूस कर रही थी. वह मुझे बेहद पसंद आयी थी. दिल्ली में […]
नाजमा खान
टेलीविजन पत्रकार
nazmakhan786@gmail.com
सुना था एक शायर के लिए सबसे बड़ी दाद वह होती है, जब शेर सुननेवाला दाद देना ही भूल जाये. मेरी भी बिल्कुल ऐसी ही हालत थी. मैं उस शायर की नज्म को सुन रही थी, रूह तक महसूस कर रही थी.
वह मुझे बेहद पसंद आयी थी. दिल्ली में रहते हुए जो कुछ अंदर फट रहा था, शायद उस पर उस शायर की सोहबत में कोई पैबंद लग जाता. वह शायर कोई और नहीं, बल्कि ‘कुदरत’ थी, जिसने पहाड़ों पर बर्फ के नीचे किसी ठंडे पड़ चुके रिश्ते की गर्म आहों को छुपा रखा था. मेरी आंखों के सामने सफेद दुशाला ओढ़े हिमालय खड़ा था. मैं उसकी खूबसूरती से बुनी हर नज्म पर दाद देना चाहती थी. वह बेहद विशाल, बाहें फैलाये खड़ा था, लगा कि किसी को उसमें समेटने की उसे तमन्ना हो.
मेरी ही तरह सैकड़ों-हजारों लोग उसे देखने आते हैं. कोई उसे फतह करना चाहता है, तो कोई अपनी सेल्फी में कैद कर लाइक और कमेंट बटोरना चाहता है. लेकिन, उसने रूई के फाहों को मेरे कानों के करीब लाकर अपना पैगाम भेजा और मेरे कानों में एक शे’र गुनगुना गया- बाजीचा-ए-अतफाल है दुनिया मेरे आगे, होता है शब-ओ-रोज तमाशा मेरे आगे. मेरी बेचैनी बढ़ने लगी. वह मेरी नजरों के करीब था, लेकिन मेरी पहुंच से दूर. यकीनन उससे खूब बातें करने की हसरत थी.
सफर लंबा था. रास्ते में भागीरथी (नदी) मिली हरी ओढ़नी लपेटे बलखाती, इतराती शायद कुछ कहना चाह रही थी, पर उसकी चुगली उन लहरों ने कर दी, जो खुद भी उस मुशायरे में शामिल थी, जिसमें एक शेर हिमालय ने चुहल करते हुए भागीरथी के लिए पढ़ दिया था- मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे, तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे.
मेरी फैंटेसी हदों को पार कर रही थी. मैं अपने जेहन में कोई एडवेंचर पाले नहीं थी, पर मैं इस खूबसूरती को अपने ही नजरिये से देख रही थी. मैं जानना चाहती थी कि क्या वाकई वह दूर खड़ा ताकतवर हिमालय तन्हा है? क्या रात को सितारों की महफिल में चांद भी अपनी तन्हाई का किस्सा लिये आता है? उफ्फ, ये कैसी कैफियत थी!
मैं उस मुकाम पर जा पहुंची, जहां मैं और हिमालय एकदम करीब थे. अगर वह कुछ कहे तो यकीनन मैं सुन पाती, पर वह खामोश था. उसकी खामोशी में एक तन्हाई थी, ऐसा लगा कोई उसे जहां छोड़ गया था, वह आज भी वहीं जमा है, जाने किसकी राह देख रहा था? आनेवाले तो लाखों आये, पर वह जिसका मुंतजिर है? क्या जानेवाले ने इसे पलटकर नहीं देखा?
रूई के फाहे वह किसके लिए राहों पर बिछा देता है? वह कौन है जिसका तसव्वुर और ख्याल लिये वह यूं ही करोड़ों साल से जस का तस जमा हुआ है? क्या इसने उस इंतजार से समझौता कर लिया है और हद से गुजरे दर्द को अपनी दवा बना लिया है? या वह भी गालिब को याद करते हुए कहता है- बे-खुदी बे-सबब नहीं गालिब, कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है.खैर, मैं वापस दिल्ली लौट आयी, पर दोबारा उसके इंतजार और तन्हाई को बांटने जरूर जाऊंगी.
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