खुद पर ही हंस लेता हूं
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :27 Nov 2018 6:05 AM (IST)
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अंशुमाली रस्तोगी परिचय anshurstg@gmail.com मैंने दूसरों पर हंसना छोड़ दिया है. खुद पर ही हंस लेता हूं. खुद पर हंसना दूसरों पर हंसने से कहीं ज्यादा सुरक्षित है. अब यह वो समय नहीं कि दूसरों पर हंसा जाए. किसी का कुछ ठीक नहीं कि कब बुरा मान जाये. बुरा मानने का तो यों है कि […]
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अंशुमाली रस्तोगी
परिचय
anshurstg@gmail.com
मैंने दूसरों पर हंसना छोड़ दिया है. खुद पर ही हंस लेता हूं. खुद पर हंसना दूसरों पर हंसने से कहीं ज्यादा सुरक्षित है. अब यह वो समय नहीं कि दूसरों पर हंसा जाए. किसी का कुछ ठीक नहीं कि कब बुरा मान जाये. बुरा मानने का तो यों है कि हम जाम में फंसे होने से लेकर बिल्ली के छींकने तक का बुरा मान जाते हैं.
मुझे ऐसा लगता है कि इंसान की आधी से ज्यादा जिंदगी बुरा मानने में ही खप जाती है. कुछ लोग तो जन्म ही बुरा मानने के लिए लेते हैं. इसलिए, किसी को बुरा मनवाये बिना मैं खुद पर ही हंसता रहता हूं.
मेरे पास खुद पर हंसने की अनेक वजह हैं. मसलन- मैं खुद को दुनिया का महा-आलसी मानने के साथ बहुत बड़ा मूर्ख भी मानता हूं. लेखक अवश्य हूं, पर दिमाग से कतई पैदल हूं.
सपने तो बहुत देखता हूं, किंतु उन्हें पूरा करने का रिस्क कभी नहीं लेता. भीड़ में अंतिम लाइन में खड़ा रहकर, बटोरने वालों का तमाशा देखता हूं. किसी की खुशी में न जाकर उसके खर्च होने में जरूर जाता हूं. समझदार और समझदारों की संगत से उतना ही दूर रहता हूं, जितना चूहा बिल्ली से. कुछ सार्थक करने से कहीं बेहतर खाली बैठना समझता हूं. चोरों और दीमकों का दिल से सम्मान करता हूं.
ऐसी ही और भी कई वजहें हैं, जो मुझे खुद पर हंसते रहने के लिए मजबूर किये रहती हैं. यों भी, हंसना स्वास्थ्य और दिमाग के लिए रामबाण है. है न!
हमें हंसने का कारण हमेशा खुद को ही बनाना चाहिए. दूसरों पर हंसकर न हंसी को संतुष्टि मिलती है, न चेहरे को. वह दरअसल बनावटी हंसी होती है.
लेकिन हमें आनंद दूसरों पर हंसने में ही मिलता है. बुरा तब लगता है, जब दूसरे हम पर हंसते हैं. तब न वो हंसी बर्दाश्त होती है, न हंसने वाले.
चार्ली चैपलिन और जिम कैरी, मुझे ये दो बंदे ऐसे नजर आते हैं, जो फिल्मों में हमेशा खुद पर ही हंसे.
राजनीति में नेता कभी जनता पर नहीं हंसता. हमेशा खुद पर ही हंसता है. वोट मांगने से लेकर सांसद-विधायक बनने तक खुद को ही हंसी का पात्र बनाये रहता है. और, एक हम हैं, जो उसपर हंसकर अपना गुबार निकालते हैं. नेता किसी हंसी का कभी बुरा नहीं मानता. फर्क देख लीजिए, बुद्धिजीवियों से कहीं ज्यादा सुखी नेता लोग हैं.
बुरा मानने या मनवाने से कहीं अच्छा है, चुपचाप खुद पर हंस लो. चुपचाप इसलिए कह रहा हूं कि लोग अक्सर खुद पर हंसने की वजह भी खुद ही पर ले लेते हैं. मैं अपने पर हंसते वक्त इस बात का खास ख्याल रखता हूं कि मेरे इर्द-गिर्द कोई न हो. दुनिया का कोई भरोसा नहीं, पल में बुरा मान जाती है. वक्त निकालकर कभी आप भी अपने पर हंसकर देखियेगा, सच में बड़ा सुकून मिलेगा. इस बहाने कम से कम हंसने का मौका तो हाथ आयेगा.
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