मनमोहन से उलट मोदी का अंदाज

।। आकार पटेल ।। वरिष्ठ पत्रकार रेडिफ डॉट कॉम वेबसाइट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार की शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय में समाहित कर रहे हैं- ‘विभिन्न विभागों के सचिवों को कहा गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से भेजी गयीं फाइलों का निपटारा अविलंब किया […]
।। आकार पटेल ।।
वरिष्ठ पत्रकार
रेडिफ डॉट कॉम वेबसाइट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार की शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय में समाहित कर रहे हैं- ‘विभिन्न विभागों के सचिवों को कहा गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से भेजी गयीं फाइलों का निपटारा अविलंब किया जाये, और सचिवों को उन्हें संबद्ध मंत्रियों के ध्यानार्थ लाने की आवश्यकता नहीं है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तौर-तरीका अपने पूर्ववर्ती डॉ मनमोहन सिंह से बिल्कुल विपरीत है. डॉ सिंह को निर्णय लेने में ढीले और ढुलमुल, या यदि आप उनके समर्थक थे तो भी कम-से-कम अत्यधिक सावधानी से काम करनेवाले, प्रधानमंत्री के रूप में देखा जाता था. यह भी माना जाता था कि वे कमजोर और अस्पष्ट थे.
जैसा कि मैंने पहले कहा, नरेंद्र मोदी उनसे एकदम अलग हैं- दृढ़, संतुलित, शीघ्र निर्णय लेनेवाले, मजबूत और निश्चयी. उनके कार्यभार संभालने से संबंधित खबरें उनके अंदाज के बारे में इस धारणा की पुष्टि करती हैं. इसके कुछ पहलुओं पर विचार करें. पहला, नौकरशाही के साथ उनके व्यवहार का तरीका. तीन जून को उन्होंने सभी विभागों के सचिवों के साथ बैठक कर मौजूदा कामकाज का जायजा लिया. एक खबर के मुताबिक, ‘उच्च पदस्थ नौकरशाहों को अपनी प्रस्तुति को संक्षिप्त रखने को कहा गया है और उन्हें जारी परिपत्र के अनुसार हर सचिव को दस बिंदुओं की प्रस्तुति के लिए दस मिनट दिये जायेंगे.’
अपने एक साक्षात्कार में मोदी ने कहा है कि वे फाइलें नहीं पढ़ते हैं. ‘अकादमिक अध्ययन’ के द्वारा शासन करना उनका तरीका नहीं है. मसलों को समझने के लिए वे पढ़ने की जगह सुनना पसंद करेंगे. जिनसे उनको सुनना है, वे नौकरशाह होते हैं, जिनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे फाइलों को ठीक से पढ़ कर उनकी मुख्य बातों से मोदी को मौखिक रूप से अवगत करायेंगे. प्रक्रिया के इस सरलीकरण के बाद मोदी मामलों को समझते हैं और तुरंत अपना निर्णय या अपनी टिप्पणी देते हैं. जटिल और विविध मसलों को बिंदुवार बना कर दिये जानेवाले पॉवर प्वाइंट प्रस्तुतियों को प्रधानमंत्री द्वारा पसंद किया जाना उनके अंदाज के अनुरूप ही है.
कुछ दिन पहले मैं एक टेलीविजन कार्यक्रम में था, जिसमें इस बात पर चर्चा हो रही थी. मैंने वहां तीन बातें कहीं- पहला यह कि लंबे दस्तावेजों को पढ़ने की अपनी अनिच्छा या अयोग्यता के कारण प्रधानमंत्री सूचनाओं के लिए दूसरों लोगों पर निर्भर हैं. और दूसरा यह कि निर्णय लेने में ऐसी जल्दबाजी आवश्यक रूप से कोई अच्छी बात नहीं है. कार्यक्रम में शामिल एक सेवानिवृत्त नौकरशाह इस बात का बुरा मान गयीं. उन्होंने कहा कि मोदी का तरीका नया नहीं है और ‘कोई प्रधानमंत्री फाइलें नहीं पढ़ता’. लेकिन मोदी और मनमोहन के अंदाज की तुलना करते हुए दोनों के कामकाज के तरीके को एक ही रूप में देखना मेरे लिए मुश्किल है. इसके कारण ऊपर मैंने गिनाया है कि वे मसलों को विस्तार में देखने के आदी थे और तथ्यों के मामले में पारंगत थे. उनके साक्षात्कार जटिलता पर उनकी पकड़ को परिलक्षित करते हैं. वे निर्णय लेने में ढीले थे या ऐसा माना जाता है, क्योंकि जब कोई विस्तृत विवरण और तथ्यों में डूब जाता है, तो सरल और शीघ्र निर्णय ले पाना मुश्किल हो जाता है.
‘द हिंदू’ अखबार में विश्लेषक प्रवीण स्वामी ने ऐसा एक उदाहरण दिया है. मुंबई में लश्कर-ए-तय्यबा के हमले के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बदले की कारवाई के विकल्पों पर विचार किया. उन्हें सेना ने जानकारी दी कि आतंकी शिविरों पर हवाई हमले संभव हैं, पर ‘स्पष्ट संयोजक और लक्ष्यों की समुचित जानकारी उपलब्ध नहीं हैं’. सेनाध्यक्ष ने भी डॉ मनमोहन सिंह को बताया कि ‘वे यह वादा नहीं कर सकते हैं कि विशेष बलों के हमले कारगर होंगे. कोई यह गारंटी भी नहीं दे सकता है कि मिसाइल हमले युद्ध की शक्ल न ले लें या परस्पर परमाणु हमलों में न बदल जायें, और यह भी कोई गारंटी नहीं दे सकता है कि युद्ध पाकिस्तानी सेना को अपना रवैया बदलने पर मजबूर कर सके’. डॉ मनमोहन सिंह ने इस संबंध में कुछ नहीं किया और यह आसानी से समझा जा सकता है कि ऐसा क्यों हुआ. इस मामले में अनिर्णय या ढुलमुलपन कोई बुरी बात नहीं थी.
मोदी के अंदाज का एक पहलू नियंत्रण करने की उनकी इच्छा है. इस सप्ताह रेडिफ डॉट कॉम वेबसाइट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार की शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कार्यालय में समाहित कर रहे हैं- ‘विभिन्न विभागों के सचिवों को कहा गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से भेजी गयीं फाइलों का निपटारा अविलंब किया जाये, और सचिवों को उन्हें संबद्ध मंत्रियों के ध्यानार्थ लाने की आवश्यकता नहीं है.’
रिपोर्ट के अनुसार, ‘यह निर्देश महत्वपूर्ण निर्णयों के मामले में मंत्रियों को बेमानी बना देगा. प्रधानमंत्री कार्यालय के संयुक्त सचिव विशेष विषयों और मंत्रलयों के प्रभारी होंगे और प्रधानमंत्री के निर्देश पर निर्णय लेंगे.’ विभिन्न विभागों में प्रमुख सचिवों से अपेक्षा है कि वे इन निर्णयों को बिना किसी देरी के मंजूरी दे देंगे.’
इस परिस्थिति पर विचार के लिए हमारे पास एक सकारात्मक तरीका है और वह है जवाबदेही. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी छाती ठोकते हैं और कहते हैं कि वे हर काम कर रहे हैं, तो वे किसी और पर जवाबदेही नहीं थोप रहे होते हैं, जैसा कि माना जाता है कि डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल में होता रहता था. मोदी की इस कार्य-शैली के नकारात्मक पक्ष भी हैं, जिन पर हम आज विचार नहीं करेंगे.
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