जहां बुढ़ापा एक रोग है
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 28 Aug 2018 1:47 AM
अरविंद दास टिप्पणीकार arvindkdas@gmail.com साल 2011 में ‘अ सेपरेशन’ नाम से एक फिल्म आयी थी, जिसे ईरान के मशहूर निर्माता-निर्देशक असगर फरहादी ने बनाई थी. तेहरान के एक मध्यवर्गीय परिवार को केंद्र में रख कर इस फिल्म के बहाने अल्जाइमर बीमारी के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाया गया है. इस फिल्म को ऑस्कर पुस्कार से […]
अरविंद दास
टिप्पणीकार
arvindkdas@gmail.com
साल 2011 में ‘अ सेपरेशन’ नाम से एक फिल्म आयी थी, जिसे ईरान के मशहूर निर्माता-निर्देशक असगर फरहादी ने बनाई थी. तेहरान के एक मध्यवर्गीय परिवार को केंद्र में रख कर इस फिल्म के बहाने अल्जाइमर बीमारी के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाया गया है. इस फिल्म को ऑस्कर पुस्कार से भी नवाजा गया.
अल्जाइमर बीमारी में लोग पुरानी बातें भूल जाते हैं, सोचने-समझने की क्रिया में परेशानी आती है. यहां तक कि लोग सगे-संबंधी को भी भूल जाते हैं. अनेक तरह की मानसिक और शारीरिक अक्षमता आ जाती है.
इसी तरह पार्किंसंस रोग में भी बीमार व्यक्ति स्मृति लोप का शिकार होता है, मानसिक बीमारियां घेर लेती हैं और अंत में व्यक्ति ‘व्हील चेयर’ की शरण में चला जाता है. इन बीमारियों की रोक-थाम के लिए जो दवाएं अभी बाजार में हैं, वह अपर्याप्त है.
करीब दस वर्षों से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी अल्जाइमर रोग से बुरी तरह पीड़ित थे. इसी वजह से वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद उन्हें सार्वजनिक जीवन में नहीं देखा जाता था. इस बात का उल्लेख एनपी ने अपनी किताब ‘द अनटोल्ड वाजपेयी : पॉलिटिशियन एंड पैराडॉक्स’ में किया है. समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस भी वर्षों से अल्जाइमर से जूझ रहे हैं.
हिंदुस्तान में इन बीमारियों के प्रति लोगों में सूचना और संवेदना का अभाव है.
आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियों को वहन करना मध्यवर्गीय परिवारों के लिए आसान नहीं होता. हिंदी के चर्चित साहित्यकार स्वदेश दीपक जो ‘बायपोलर डिसआर्डर’ के मरीज थे, इसका उदारहण हैं. वे करीब दस वर्षों से लापता हैं. यदि आप स्वस्थ हैं, तो इस बात की कल्पना से ही सिहरन पैदा होती है कि एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब आपकी स्मृति आपका साथ ना दें. बढ़ती हुई उम्र में मस्तिष्क की कई कोशिकाओं के काम करने की गति धीमी हो जाती है.
एक आंकड़ा के मुताबिक भारत में करीब 40 लाख लोग भूलने की बीमारी (डिमेंशिया) से पीड़ित हैं और वर्ष 2035 तक यह संख्या दुगुनी हो जायेगी. भारत युवाओं का देश है. देश की जनसंख्या का 65 प्रतिशत 35 वर्ष से कम आयु के हैं, पर हमारी पीढ़ी जब बूढ़ी होगी, तो ये बीमारियां और बढ़ेंगी. पर क्या हम उसके लिए तैयार हैं?
पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के पास हर तरह की सुख-सुविधा थी, लेकिन देश के बहुसंख्यक लोगों के पास ऐसी सुविधाएं नहीं हैं. बिना किसी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के बुढ़ापा एक रोग बन कर सामने आता है. सरकार को चाहिए इन बीमारियों से पीड़ित बूढ़े-बेसहारों के देख-भाल की अलग से सुविधा का बंदोबस्त करे. साथ ही मेडिकल शोध पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, ताकि भविष्य में इन बीमारियों का इलाज संभव हो सके. मेरी समझ से पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी!
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