बैंकिंग में सुधार की दरकार

Updated at : 21 Jun 2018 6:45 AM (IST)
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बैंकिंग में सुधार की दरकार

II अरविंद मोहन II अर्थशास्त्री mohanarvind@hotmail.com मौजूदा दौर में बैंकिंग सेक्टर से जुड़े दो-तीन मुद्दे हैं, जिनको अलग-अलग तरीके से देखा जाना चाहिए. पहला यह कि अगर गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) का स्तर देखें, तो बीते दिनों सकल एनपीए 17 फीसदी के पास पहुंच चुका था. यह स्थिति लगातार बिगड़ती ही जा रही है. इस सदी […]

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II अरविंद मोहन II
अर्थशास्त्री
mohanarvind@hotmail.com
मौजूदा दौर में बैंकिंग सेक्टर से जुड़े दो-तीन मुद्दे हैं, जिनको अलग-अलग तरीके से देखा जाना चाहिए. पहला यह कि अगर गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) का स्तर देखें, तो बीते दिनों सकल एनपीए 17 फीसदी के पास पहुंच चुका था. यह स्थिति लगातार बिगड़ती ही जा रही है.
इस सदी की शुरुआत से ही देखें, तो एनपीए का स्तर बढ़ना शुरू हो गया था. इस समस्या के तात्कालिक हल के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाये गये, जो सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों के एनपीए के स्तर को एक उचित स्तर पर लाने में कामयाब रहे. इससे बहुत से बैंकों का एनपीए लेवल तीन से साढ़े तीन प्रतिशत पर आ गया. वहां से स्थितियां फिर से बिगड़नी शुरू हो गयीं. आज स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि एनपीए का स्तर 17 प्रतिशत के करीब जा पहुंचा है.
यह बड़ी भयावह स्थिति है. जब हम एनपीए के आंकड़ों को देखते हैं, तो बैंकिंग सेक्टर की स्थितियां बद से बदतर होती नजर आती हैं. दूसरा सच यह भी है कि इस तरीके से लगातार बढ़ता एनपीए अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है. लेन-देन प्रक्रिया के लिए यह चुनौतीपूर्ण स्थिति है.
गौर करनेवाली बात है कि दुराग्रही बकायेदारों (विलफुल डिफॉल्टर) की तदाद बढ़ रही है, जिनसे बिल्कुल अलग तरीके से निपटना होगा. किसी भी संस्थागत बैंकिंग सिस्टम में कुछ अवांछित बकायेदारों का होना स्वाभाविक है.
लेकिन, उसका प्रतिशत कुल देनदारी का कभी भी 17 प्रतिशत नहीं पहुंचता है. इस स्तर पर एनपीए के पहुंचने का मतलब है कि बैंकिंग सिस्टम गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है. हमारा जो निगरानी और व्यवस्था तंत्र है, चाहे वह विभिन्न बैंकों के उच्च प्रबंधन का हो या भारतीय रिजर्व बैंक स्तर पर या फिर वित्त मंत्रालय के स्तर का हो, कहीं न कहीं गंभीर चुनौती जरूर है.
हमें बैंकिंग सिस्टम को जिस तरीके से मैनेज करना चाहिए, उसे कर पाने में असफल साबित हो रहे हैं. जब 2008-09 में वैश्विक मंदी आयी, तो उस समय आरबीआई ने हमारे देश के बैंकिंग सिस्टम को इतने अच्छे तरीके से मैनेज किया कि उसकी चर्चा दुनियाभर में हुई. आखिर ऐसा क्या हो गया कि 2010 से लेकर 2018 के बीच एक गंभीर समझौते वाली स्थिति आ खड़ी हुई. यह एक गंभीर रूप से विचार किया जानेवाला प्रश्न है. यह एक ऐसा नीतिगत मामला है, जहां तत्काल सुधार की जरूरत है.
तीसरा सच है कि बैंकिंग इंडस्ट्री कोई मामूली इंडस्ट्री नहीं है़ आज की दुनिया को हम क्रेडिट इंडस्ट्री कहते हैं और कहा जाता है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में क्रेडिट रक्त धमनियों के रूप में काम करता है. शरीर में रक्त प्रवाह की भांति आधुनिक अर्थव्यवस्था में क्रेडिट फ्लो करता है. उससे ही अर्थव्यवस्था चलती है, यहां उसी के साथ समझौता होता दिख रहा है. यहां ध्यान रखना होगा कि 2008-09 में वैश्विक मंदी की शुरुआत बैंकिंग सिस्टम में उत्पन्न समस्याओं की वजह से ही हुई थी.
क्या कुछ वैसा ही बुलबुला यहां भी तैयार नहीं हो रहा है? यहां शीघ्र ध्यान देने की जरूरत है, हम पहले ही काफी देर कर चुके हैं. आज सात लाख करोड़ से अधिक एनपीए का मतलब है कि स्थितियां पहले से ही विकराल स्तर पर पहुंच चुकी हैं.
जिस तरीके से आज हम दुनियाभर में वित्तीय चुनौतियों से निपट रहे हैं, वैसी स्थिति में इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) जैसे प्रावधानों को सख्त तरीके से लागू करने की जरूरत है. आज समस्या नियम कायदों की नहीं, बल्कि उसको प्रभावी तरीके से लागू करने की है.
देश के अंदर और बाहर के हालात को देखें, तो समय-समय पर तमाम संस्थाएं एनपीए से जूझती रही हैं. ऐसे बहुत से बैंक हैं, जिनमें बड़ी-बड़ी चुनौतियां आयीं, जिनसे आम तौर पर दो तरीकों से निपटा गया, वन टाइम की सेटलमेंट की पॉलिसी और दूसरा हाइविंग ऑफ. ज्यादातर बैंक वन टाइम सेटेलमेंट को इस्तेमाल करते रहे हैं. इसके लिए भी सभी बैंकों के अपने अलग-अलग तौर-तरीके हैं.
अगर अर्थव्यवस्था पर पड़नेवाले प्रभाव को देखें, तो तमाम राज्यों में कोशिश की जा रही है कि किसानों और इंडस्ट्रीज के ऋण को माफ किया जाये, यह भी एक प्रकार से बैंकिंग सिस्टम के साथ समझौते वाली स्थिति है. यह स्थिति बैंकिंग इंडस्ट्री और अर्थव्यवस्था के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है.
अगर आप बैंक को विकास का एक अहम और प्रासंगिक हिस्सा बनाकर रखना चाहते हैं, तो राइट ऑफ जैसे फैसलों से बचना पड़ेगा. राइट ऑफ की स्थिति क्यों आयी, इसके लिए जवाबदेही तय करनी पड़ेगी. अगर राइट ऑफ करने की दिशा में स्टेट पॉलिसी जा रही है, तो यह कहीं न कहीं आपके राजकोषीय घाटे में स्पष्ट तौर पर दिखेगी.
अगर इन हालातों को नियंत्रित नहीं किया गया, तो राजकोषीय घाटे का स्तर भी बढ़ेगा. इससे रोजगार सृजन और अर्थव्यवस्था की गति भी प्रभावित होगी. यह स्थिति अव्यवस्थित प्रबंध की देन है. वैश्विक मंदी के बाद माना गया है कि हिंदुस्तान के घरेलू मानक बहुत ही मजबूत हैं, यही वजह थी दुनियाभर की मंदी के बावजूद हमारी अर्थव्यवस्था पर उसका ज्यादा असर नहीं पड़ा.
आज वह स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है. निकट चुनौतियों से बचने के लिए समीक्षा करते हुए कुछ बड़े कदम उठाने होंगे. हम जिन महत्वपूर्ण नियमों को लागू कर चुके हैं, उनको प्रभावी बनाना होगा.
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