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कर्नाटक में पीछे छूटते असली मुद्दे

Updated at : 23 Apr 2018 5:17 AM (IST)
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कर्नाटक में पीछे छूटते असली मुद्दे

II आशुतोष चतुर्वेदी II प्रधान संपादक, प्रभात खबर ashutosh.chaturvedi @prabhatkhabar.in राजनीति किस स्तर तक जा सकती है, उसकी मिसाल है कर्नाटक का विधानसभा चुनाव. कर्नाटक चुनाव देश की दो राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है. पार्टियों के तरकश में जितने भी तीर हैं, वे उन्हें चलाने में परहेज […]

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II आशुतोष चतुर्वेदी II
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi
@prabhatkhabar.in
राजनीति किस स्तर तक जा सकती है, उसकी मिसाल है कर्नाटक का विधानसभा चुनाव. कर्नाटक चुनाव देश की दो राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है. पार्टियों के तरकश में जितने भी तीर हैं, वे उन्हें चलाने में परहेज नहीं कर रही हैं.
दोनों पार्टियों के नेता मठों-मंदिरों में जा जाकर मत्था टेक रहे हैं. परिवारवाद चरम पर है. पूर्व मुख्यमंत्रियों के आठ बेटे चुनाव मैदान में हैं.
समुदायों को आरक्षण का वादा किया जा रहा है और अलग झंडे जैसे अति राष्ट्रवाद के मुद्दे उछाले जा रहे हैं. दुखद यह है कि इस चुनावी दौड़ में असली मुद्दे गौण हैं. यह देश का दुर्भाग्य है कि अब चुनाव जमीनी मुद्दों पर नहीं लड़े जाते, बल्कि भावनात्मक मुद्दों को उछाला जाता है.
चुनाव जीतने की कोशिश के तहत एक और गैर जिम्मेराना तरीका निकाला गया कि राज्य का अपना झंडा और प्रतीक चिह्न होना चाहिए. यह प्रस्ताव राज्य सरकार ने लाया. इससे पहले, 2012 में भी ऐसी सुगबुगाहट हुई थी, लेकिन उस समय राज्य विधानसभा ने यह मांग सिरे से खारिज कर दी थी. दरअसल, कर्नाटक में अभी कांग्रेस सरकार है और भाजपा यहां सत्ता में लौटने की कोशिश में है. कर्नाटक की 224 सीटों पर 12 मई को मतदान होना है. भाजपा, कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) के बीच मुख्य मुकाबला है.
इस बार कर्नाटक चुनावों में एक नयी बात देखने को मिल रही है. मठ राजनीति के प्रमुख केंद्र बन गये हैं. कर्नाटक में 600-700 मठ हैं. हमेशा से कर्नाटक में लोगों पर मठों का खासा प्रभाव रहा है और उनका थोड़ा बहुत राजनीतिक इस्तेमाल होता आया है. लेकिन जैसी इस बार मठों को अपने पक्ष में करने की होड़ लगी है, वैसे पहले कभी नहीं दिखी. कांग्रेस ने गुजरात की तरह ही यहां भी सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर जाने का फैसला किया है. कर्नाटक में अलग-अलग समुदायों के अपने मठ हैं.
जैसे लिंगायत समुदाय के लगभग 400 मठ हैं, जबकि वोकालिंगा समुदाय से जुड़े करीब 150 मठ हैं. कुरबा समुदाय से जुड़े लगभग 80 मठ हैं. इन समुदायों का कर्नाटक की राजनीति में खासा प्रभाव है. मतदाताओं पर मठों के प्रभाव को देखते हुए हर राजनीतिक दल का नेता मठों का आशीर्वाद पाने के लिए मंदिर-मठों की तरफ दौड़ लगा रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो हद कर दी है. भाजपा नेता भी पीछे नहीं हैं. वे भी मठों में मत्था टेक रहे हैं. नतीजा यह हुआ है कि अब मठ के महंतों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग गयी है. प्राचीन उडुपी के अष्ठ मठों के एक महंत ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन भर दिया है. मठों के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है.
शीरूर मठ के महंत श्री लक्ष्मीवर तीर्थ स्वामी को भाजपा का टिकट नहीं मिला, तो वह निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतर गये हैं. भाजपा ने लिंगायत समुदाय के बीएस येदियुरप्पा को सीएम पद का उम्मीदवार बनाया है. इसके जवाब में कांग्रेस लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा देने की घोषणा कर दी है.
राज्य में आबादी के लिहाज से लिंगायत समुदाय लगभग 17 फीसदी है और कुल 224 विधानसभा सीटों में से 100 सीटों पर असर रखता है. यह समुदाय पारंपरगत रूप से भाजपा के साथ है. कांग्रेस इसमें सेंध लगाना चाहती है.
कर्नाटक जैसे परिवारवाद का ऐसा उदाहरण आपको देखने को नहीं मिलेगा. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन विधानसभा चुनावों में पूर्व मुख्यमंत्रियों के आठ बेटे चुनाव मैदान में हैं. कर्नाटक के कांग्रेस के मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र वरुणा सीट से उम्मीदवार हैं. दूसरी ओर भाजपा के सीएम उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा के बेटे बीवाई विजयेंद्र को सिद्धारमैया के बेटे के खिलाफ चुनाव लड़ाने की तैयारी है.
पूर्व प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके एचडी देवगौड़ा के दो बेटे जनता दल (सेक्युलर) के नेता एचडी कुमारस्वामी और एचडी रवन्ना चुनाव मैदान में हैं. पूर्व मुख्यमंत्री एस बंगारप्पा के बेटे कुमार और मधु एक दूसरे के खिलाफ ही सोराबा विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में हैं. बंगरप्पा के बेटों के बीच राजनीतिक विरासत हासिल करने की जंग छिड़ी हुई है. 1967 से 1994 तक इस सीट का प्रतिनिधित्व उनके पिता ने किया था.
एस बंगरप्पा 1990 से 1992 के बीच कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे थे. कुमार बंगरप्पा और मधु बंगरप्पा, दोनों का फिल्मी करियर रहा है. दोनों ने कन्नड़ और तेलुगू फिल्मों में अभिनय किया है और अब चुनावी मैदान में एक दूसरे के सामने हैं. एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री जेएच पटेल के बेटे महिमा पटेल, पूर्व मुख्यमंत्री धर्म सिंह के बेटे अजय सिंह और एसआर बोम्मई के बेटे बी बोम्मई भी चुनावी मैदान में हैं.
वहां एक नया शिगूफा छोड़ा गया है, जो देश की एकता के तानेबाने के लिए खतरनाक है. कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने केंद्र सरकार से अपना अलग झंडा अपनाने के लिए अनुमति मांगी है. क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर अलग झंडे की मांग को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है.
झंडा संहिता हमें राज्य के लिए अलग झंडे की इजाजत नहीं देती. लेकिन झंडे के बहाने एक विवाद खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. राज्य सरकार इसको हवा दे रही है. लेकिन वह यह नहीं समझ रही है कि ऐसे आंदोलन जब फैल जाते हैं, तो उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होता है.
कुछ समय पहले हिंदी भाषा को भी निशाना बनाया गया. सार्वजनिक स्थलों पर लगे हिंदी बोर्डों को नुकसान पहुंचाया गया. बेंगलुरु मेट्रो स्टेशनों पर लगे हिंदी के बोर्डों पर कालिख पोती गयी, जबकि ये नाम त्रिभाषा फार्मूले के तहत तीन भाषाओं में नाम लिखे गये थे. कर्नाटक में हिंदी भाषी बड़ी संख्या में हैं.
आइटी क्षेत्र में बिहार-झारखंड के युवा वहां बड़ी संख्या में काम करते हैं. क्षेत्रीयता के ऐसे मुद्दे उन्हें भी प्रभावित कर सकते हैं. महाराष्ट्र को लेकर हिंदी भाषियों का अनुभव बहुत खराब रहा है. क्षेत्रीयता के नाम पर शिव सेना वहां हिंदी भाषियों को निशाना बनाती रही है.
तमिलनाडु में भी अति क्षेत्रीयता से देश वर्षों जूझा है. वहां हिंदी भाषा को लेकर आज भी तिरस्कार का भाव है. सबसे चिंता की बात यह है कि इसे और कोई नहीं, राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया हवा दे रहे हैं. कहा जा रहा है कि इसका सियासत से कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन, हम सब जानते हैं कि इसका सिर्फ सियासत से ही लेना-देना है.
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