शैक्षणिक क्रांति के प्रणेता फुले

Updated at : 11 Apr 2018 5:47 AM (IST)
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शैक्षणिक क्रांति के प्रणेता फुले

शफक महजबीन टिप्पणीकार महान क्रांतिकारी, विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक एवं भारत में सामाजिक शैक्षणिक क्रांति के प्रणेता महात्मा ज्योतिबा फुले की आज 191वीं जयंती है. ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को महाराष्ट्र के माली परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम गोविंद राव और माता का नाम चिमनाबाई था. फुले जी का […]

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शफक महजबीन

टिप्पणीकार

महान क्रांतिकारी, विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक एवं भारत में सामाजिक शैक्षणिक क्रांति के प्रणेता महात्मा ज्योतिबा फुले की आज 191वीं जयंती है. ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को महाराष्ट्र के माली परिवार में हुआ था.

उनके पिता का नाम गोविंद राव और माता का नाम चिमनाबाई था. फुले जी का जन्म उस दौर में हुआ था, जब शिक्षा सिर्फ उच्च वर्गों के लिए ही थी. लेकिन फुले ने इस परंपरा को तोड़ा और जिंदगीभर छोटी जातियों और दलितों के उत्थान और महिलाओं की शिक्षा के लिए काम करते रहे.

भारतरत्न डाॅ भीमराव आंबेडकर ने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए कहा था, ‘मैं किसी समुदाय की प्रगति को, महिलाओं ने जो प्रगति हासिल की है, उससे मापता हूं.’ इस कथन में फुले जी के विचारों की छाप मिलती है.

स्वतंत्रता एवं समानता का विचार रखनेवाले फुले ने दलितों के उत्थान, महिला शिक्षा और स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार दिये जाने को लेकर बेहतरीन काम किया. वे मानते थे कि सभी मानव एक समान हैं और उन्हें जाति-धर्म के नाम पर वर्गों में नहीं बांटा जाना चाहिए.

फुले जी का योगदान स्त्री शिक्षा की तरफ काफी महत्वपूर्ण रहा है. उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले ने भी इस प्रयास में उनका बखूबी साथ दिया.

वह खुद भी एक विदुषी महिला थीं और सभी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध थीं. शादी से पहले वह बिल्कुल भी पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन शादी के बाद उन्होंने पढ़ाई की और अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए एक विद्यालय की स्थापना की. इस तरह सावित्री बाई फुले भारत की पहली शिक्षिका बन गयीं.

हालांकि, उस समय महिलाओं को शिक्षा की तरफ प्रेरित करना इतना आसान भी नहीं था, क्योंकि देश में विद्या की देवी सरस्वतीजी को माने जाने के बावजूद स्त्रियों को पढ़ने-लिखने से वंचित रखा जाता था. स्त्रियां तमाम सामाजिक कुरीतियों के जाल में फंसी हुई थीं. ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई को इस नेक काम को अंजाम देने में बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन वे हर कठिनाई से लड़ते रहे.

ज्योतिबा जी ने इंसान की बराबरी के लिए और लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से कई किताबें भी लिखीं और धर्म के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाये जाने का पुरजोर विरोध किया. उन्होंने मानव में भेदभाव के विरुद्ध और स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए छोटे-बड़े कई आंदोलन भी चलाये.

लेकिन, इतने प्रयासों के बाद भी आज देश में करीब 67 प्रतिशत स्त्रियां ही साक्षर हैं. यह हमारे लिए दुख की बात है और हमें चिंतन करना चाहिए कि फुले के प्रयासों को सफल बनाने में हमसे कहां चूक हो रही है, और इनके योगदानों से हम क्यों फायदा नहीं उठा पाये हैं.

फुले जैसे महात्माओं के विचारों को हमें जीवन में उतारने की जरूरत है और उन लोगों को भी समझाने की जरूरत है, जो लोग शिक्षा से स्त्रियों को वंचित रखने की वकालत करते हुए उन्हें सिर्फ घर के काम करने को कहते हैं. तभी संभव है कि हम एक समृद्ध और बराबरी वाले समाज का निर्माण कर सकेंगे.

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