दावोस के बहाने विषमता का सच

Updated at : 24 Jan 2018 6:26 AM (IST)
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दावोस के बहाने विषमता का सच

कुमार प्रशांत गांधीवादी विचारक ऐसा कभी-कभार ही होता है कि सच खुद सामने अाकर झूठ का पर्दाफाश कर देता है! ऐसा ही हुअा था, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक अोबामा अपने पद से विदा हो रहे थे. उन्होंने जाते-जाते कहा कि दुनिया की कुल संपत्ति का 50 प्रतिशत केवल 60 लोगों की मुट्ठी में है. […]

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कुमार प्रशांत

गांधीवादी विचारक

ऐसा कभी-कभार ही होता है कि सच खुद सामने अाकर झूठ का पर्दाफाश कर देता है! ऐसा ही हुअा था, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक अोबामा अपने पद से विदा हो रहे थे. उन्होंने जाते-जाते कहा कि दुनिया की कुल संपत्ति का 50 प्रतिशत केवल 60 लोगों की मुट्ठी में है. अौर प्रकारांतर से यह भी कबूल कर लिया कि यह सच इतना टेढ़ा है कि इसे सीधा करना दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपति के भी बस की बात नहीं है.

अब जब दुनिया के सारे धन्नासेठ-सत्ताधीश दावोस में जमा हैं अौर हमारे प्रधानमंत्री उन्हें भारत के विकास की सच्ची कहानी सुना रहे हैं, तब एक भयानक सच किसी दूसरे रास्ते हमारे सामने अा गया है.

‘सबका साथ, सबका विकास’- यह जो माहौल देशभर में बनाया जाता रहा है, अौर जिसे साकार करने के लिए कई उपक्रम जोर-शोर से घोषित होते रहे हैं, इनका लब्बोलुअाब यह है कि हमारे देश की 73 प्रतिशत संपदा देश के केवल 1 प्रतिशत लोगों के हाथों में सिमट गयी है. इन 1 प्रतिशत लोगों की संपत्ति पिछले एक साल में 21 लाख करोड़ बढ़ी है. ये अांकड़े किसी रेटिंग एजेंसी के नहीं है, जो किसी दबाव-प्रभाव से बढ़ाये या घटाये जा सकते हैं. ये अांकड़े दावोस में ही जारी हुए हैं अौर यह अध्ययन एक गैर-सरकारी संस्थान ने किया है.

पिछले साल अॉक्सफेम ने यह अध्ययन जारी किया था कि भारत के 1 फीसदी लोगों की संपत्ति में 58 फीसदी का इजाफा हुअा है. दावोस में ही पिछली बार कहा गया था कि विश्व शांति को सबसे बड़ा खतरा अगर किसी से है, तो वह बढ़ती हुई विषमता से है. कहने का अर्थ यह था कि अमीरी-गरीबी के बीच की खाई को पाटने की बात तो अब राष्ट्राध्यक्षों के एजेंडे में ही नहीं है, लेकिन यह खाई चौड़ी न हो, यह सावधानी रखना धन्नासेठों और सत्ताधीशों के लिए जरूरी है, क्योंकि यह अाग बहुत कुछ लील जायेगी. वर्ल्ड बैंक ने कभी कहा था कि उसका अार्थिक अध्ययन बताता है कि 2030 तक दुनिया से गरीबी खत्म हो जायेगी. अब वर्ल्ड बैंक खुद ही खत्म हो रहा है.

अब फिर दावोस है.

पिछली बार यहां चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का जलवा था. वे चीन का वह चमकीला चेहरा दुनिया को बेच रहे थे, जिसे चीन के ही अधिकांश लोग नहीं जानते-पहचानते. तब शी के पीछे एक अाभामंडल था कि वे दुनिया के सबसे बड़े िनर्यातक देश के प्रमुख थे. इस बार यही काम हमारे प्रधानमंत्री कर रहे हैं. उनके साथ देश के काॅरपोरेटों की बड़ी मंडली गयी है, सरकारी अांकड़ों के विशेषज्ञ भी अपना ‘पहाड़’ लेकर वहां गये हैं.

सब मिलकर वहां भारत को चमकायेंगे. हमारे प्रधानमंत्री के साथ ही यह सच्चाई भी वहां गयी है कि उनके साथ दावोस पहुंचे इन्हीं काॅरपोरेटों की अाय में, 2017 में 20.9 लाख करोड़ रुपयों की बढ़ोतरी हुई है. यानी 2017-18 का भारत सरकार का कुल बजट जितना था, उस बराबर की कमाई इन काॅरपोरेटों ने 2017 में की. अाज भारत में 101 अरबपति हैं, जिनमें से 17 तो 2017 में ही पैदा हुए हैं. अर्थशास्त्री टॉमस पिकेटी का अध्ययन बताता है कि भारत की सबसे गरीब जमात के सबसे पीछे के 50 प्रतिशत लोगों की अाय में पिछले वर्ष में 0 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि इसी अवधि में अरबपतियों की संख्या 13 प्रतिशत बढ़ी है.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ताजा रपट हमारी कुछ दूसरी तस्वीरें लेकर अाया है. हम दुनिया की विकास सूचकांक में 62वें स्थान पर हैं, मतलब चीन (26) अौर पाकिस्तान (47) से पीछे. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम अध्ययन में यह देखता है कि देश के सामान्य जन के रहन-सहन का स्तर क्या है, पौष्टिक खाद्य की उपलब्धता कैसी है, पर्यावरण के संरक्षण की स्थिति क्या है अौर देश पर वह विदेशी कर्ज कितना है, जिसका भावी पीढ़ियों पर बोझ पड़ेगा.

यह अध्ययन बताता है कि अार्थिक रूप से कौन देश कितना सशक्त है. इसका जवाब यह नहीं है कि हमने जनधन योजना में कितने बैंक खाते खोले, बल्कि यह है कि उन खातों में अाज क्या जमा है अौर जो जमा है, वह कहां से अाया है. यह जाने बिना विकास और कमाई के अांकड़ों का कोई अर्थ नहीं.

दावोस में हमारा चेहरा चाहे जितना चमकाया जाये, उस चेहरे के पीछे की यह सच्चाई छिपायी नहीं जा सकेगी कि हमारी जेब लगातार खाली होती जा रही है, सरकारी खर्चे पर कोई प्रभावी रोक संभव नहीं हो पा रही है, बैंकिंग व्यवस्था की अराजकता संभाली नहीं जा पा रही है, रोजगारविहीन विकास की घुटन फैल रही है, खेती-किसानी की कमर टूट चुकी है, अौद्योगिक उत्पादन भी गिर रहा है अौर खपत भी.

किसी भी अर्थव्यवस्था की मध्यम कड़ी ही उसे संभालकर रखती है अौर ऊपर-नीचे के थपेड़ों से बचाती है. यह मध्यम कड़ी अाज जैसी बेहाल कभी नहीं थी. जीएसटी में जितनी बार, जितने बदलाव किये जा रहे हैं, वे बता रहे हैं कि इसे लागू करने से पहले जितना अध्ययन व व्यवस्था जरूरी थी, वह नहीं की गयी. अधपका फल या अधपकी फसल किसी के काम नहीं अाती है; खेत को जरूर कमजोर कर जाती है.

यह सब लिखते हुए कोई खुशी नहीं है मुझे. क्योंकि मामला इस प्रधानमंत्री या उस प्रधानमंत्री का नहीं है. इस या उस सरकार की भी बात नहीं है. बात देश की है, जो किसी भी सरकार के बाद भी रहेगा, किसी भी प्रधानमंत्री के बाद भी चलेगा. वह कमजोर हो, घायल हो, खोखला हो, तो तकलीफ कितनी दारूण होती है, यह हम सभी जानते हैं.

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