सूर्य पूजन का पर्व

Updated at : 26 Oct 2017 7:32 AM (IST)
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सूर्य पूजन का पर्व

कविता विकास टिप्पणीकार अगर सृष्टि में ऐसा बदलाव हो जाये कि सूर्य ही न उगे, तो क्या जीवन संभव है? नहीं. तात्पर्य है कि जीवन के सतत प्रवाह के लिए सूर्य का उगना अवश्यंभावी है. सूर्य यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश का एकाकार होना. सूर्य है तो फसलें हैं, मेघ हैं, नदियां हैं. पक्षियों का […]

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कविता विकास

टिप्पणीकार

अगर सृष्टि में ऐसा बदलाव हो जाये कि सूर्य ही न उगे, तो क्या जीवन संभव है? नहीं. तात्पर्य है कि जीवन के सतत प्रवाह के लिए सूर्य का उगना अवश्यंभावी है. सूर्य यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश का एकाकार होना. सूर्य है तो फसलें हैं, मेघ हैं, नदियां हैं. पक्षियों का कलरव इस बात का प्रतीक है कि सूर्य की ऊर्जा उनमें जान फूंकती है. इसी दिवास्पति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए छठ पर्व मनाया जाता है.

छठ के समय घर के आस-पास कोई गंदगी नहीं होनी चाहिए. नदी, पोखर आदि की विशेष सफाई होती है, क्योंकि इस पर्व में पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है. यहां तक कि जिस गेहूं से ठेकुआ जैसे मुख्य प्रसाद बनते हैं, उसे भी धोने के बाद किसी की निगरानी में सुखाया जाता है, ताकि कोई चिड़िया उस पर न बैठ जाये. इस पर्व में शरद ऋतु में मिलनेवाले सभी फल और सब्जियों को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है. व्रती ढाई दिन का उपवास रखते हैं. छठ के पहले दिन अधोगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तब तालाबों-नदियों की शोभा देखते बनती है.

ढलते सूर्य की मद्धिम रोशनी और व्रतियों का जल में खड़े होकर सूर्य देव की उपासना करना, क्या अद्भुत दृश्य होता है!

जिन घरों में यह पर्व नहीं होता है, उनकी भी उत्कट इच्छा होती है कि एक बार व्रती की भीगी साड़ी को ही छू लें, तो शायद उनके प्रताप से हमारे भी कष्ट दूर हो जायें.

यूं तो सूर्य की पूजा के अन्य विधान भी हैं. पर, छठ पूजा के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं. राजा प्रियंवद को संतान प्राप्ति का वरदान मिलना या राजा कर्ण का सूर्य पर अगाध आस्था के परिणामस्वरूप अधिक शक्ति की प्राप्ति होना आदि अनेक किंवदंतियां हैं, जो इस पर्व की मान्यता को बढ़ा देती हैं.

ढलता सूरज इस बात का प्रतीक है कि जीवन की अवस्था सदा एक सी नहीं रहती. इसलिए शाम वाली अर्घ्य के बाद दूसरे दिन उर्ध्वगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. अनेक असाध्य रोगों का निवारक, हमारे पंचतत्व युक्त शरीर का पालनकर्ता सूर्य के प्रति हमारी कृतज्ञता इस पूजा के माध्यम से प्रकट होती है.

व्रतियों की कामना होती है कि उसके परिवार में सूर्य का तेज बना रहे, धन-धान्य की कमी न हो और जीवन के प्रति हमारी अटूट आस्था हमें नीरोग और कर्मठ बनाने में मदद करे. नदियों के बहने का, फसलों के पकने का और मेघों के बनने का एकमात्र आधार सूर्य है. सूर्य अनादि काल से आकाश में उगता आया है. सृष्टि के उद्गम और विनाश का मूल भी सूरज है. वह गति का प्रणेता है और हमारी सांसों के चलने का पर्याय है. इसलिए सूर्य पूजन को किसी विशेष धर्म या संप्रदाय से जोड़कर नहीं देखना चाहिए. यह प्रकृति की पूजा है.

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