शांति की जरूरी पहल

Updated at : 25 Oct 2017 5:58 AM (IST)
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शांति की जरूरी पहल

कश्मीर मसले से जुड़े सभी पक्षों से बात करने का केंद्र सरकार का फैसला भले देर से हुआ हो, लेकिन अपनी मंशा में एकदम दुरुस्त है. बातचीत की जिम्मेदारी खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को दी गयी है. यह फैसला सरकार के रुख में बदलाव का संकेत है. यह इसका भी सूचक है […]

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कश्मीर मसले से जुड़े सभी पक्षों से बात करने का केंद्र सरकार का फैसला भले देर से हुआ हो, लेकिन अपनी मंशा में एकदम दुरुस्त है. बातचीत की जिम्मेदारी खुफिया ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को दी गयी है. यह फैसला सरकार के रुख में बदलाव का संकेत है.

यह इसका भी सूचक है कि सरकार शासन पर कश्मीरियों के भरोसे की बहाली को लेकर गंभीर है और वहां व्याप्त अशांति को मात्र सख्ती से ठीक करने या फिर विकास के जरिये लोगों को मुख्यधारा में शामिल करने तक सीमित कर नहीं देख रही है. कश्मीर समस्या का एक पहलू राजनीतिक भी है. एक अच्छी बात यह भी है कि अभी कश्मीर का माहौल बातचीत के अनुकूल है. वहां फिलहाल माहौल अपेक्षाकृत शांत हैं. क्रुद्ध युवाओं का झुंड सड़कों पर नहीं है.

अलगाववादी नेताओं ने हाल-फिलहाल कोई पाकिस्तान-परस्त बयान नहीं दिया है. सीमा-पार से होनेवाली घुसपैठ और पाकिस्तान-प्रेरित आतंकियों से मुठभेड़ की खबरें जरूर आयी हैं, लेकिन माहौल इतना अशांत नहीं है कि रोजमर्रा का कामकाज ठप हो जाये. बहुत संभव है, वक्ती तौर पर माहौल शांत नजर आ रहा हो, या फिर, यह भी मुमकिन है कि बढ़ी हुई निगरानी और सख्ती के कारण भारतीय सुरक्षा बलों को सचमुच कामयाबी हासिल हुई हो और अलगाववादी तत्वों के हौसले पस्त पड़ गये हों, जैसा कि केंद्र सरकार का बीते दिनों दावा रहा है.

कश्मीर से जुड़े पिछले अनुभव यही बताते हैं कि उसके हालात को लेकर कोई बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती है, परंतु शांति का मौजूदा माहौल बातचीत की सरकारी पहल में निश्चित ही मददगार साबित होगा क्योंकि कटुता के माहौल में बातचीत हो, तो भी ज्यादा आशंका विवाद के बने रहने की होती है और समुचित संवाद स्थापित नहीं हो पाता है.

यह भी उम्मीद की जा सकती है कि बातचीत पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए की जायेगी. पूर्ववर्ती एनडीए और यूपीए सरकारों के दौर में भी कश्मीर के मसले पर बातचीत के लिए समितियां बनी थीं. तब कश्मीरी अवाम की विश्वास बहाली के लिए राजनीतिक कोशिशें भी की गयी थीं और संवाद को अहम माना गया था. पर, यह अफसोस की बात है कि उन समितियों की सिफारिशों पर ठीक से अमल न हो सका.

ऐसे में यह आशा की जानी चाहिए कि संवाद कायम करने की मौजूदा पहल रंग लायेगी और इसका कोई ठोस नतीजा निकलेगा. कश्मीर समस्या लंबे समय से राजनीति और सुरक्षा के स्तर पर चुनौती बनी हुई है. इस लिहाज से तुरंत समाधान की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए और धैर्य के साथ कश्मीरी जनता के साथ बातचीत की जानी चाहिए.

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