इतिहास एक प्याज

इतिहास के नये प्रगतिशील शोधार्थियों ने ठान लिया है कि न्यू इंडिया का इतिहास भी नया होना चाहिए, जहां बुलेट ट्रेन दहलीज पर खड़ी हो, भूखमरी मर चुकी हो, गरीबी देश छोड़ने को आतुर हो, संप्रदायवाद, जातिवाद व आतंकवाद की बोलती बंद हो. बेरोजगारी व भ्रष्टाचार ‘इतिहास’ बन चुके हों, तो लगता है देश में […]
इतिहास के नये प्रगतिशील शोधार्थियों ने ठान लिया है कि न्यू इंडिया का इतिहास भी नया होना चाहिए, जहां बुलेट ट्रेन दहलीज पर खड़ी हो, भूखमरी मर चुकी हो, गरीबी देश छोड़ने को आतुर हो, संप्रदायवाद, जातिवाद व आतंकवाद की बोलती बंद हो. बेरोजगारी व भ्रष्टाचार ‘इतिहास’ बन चुके हों, तो लगता है देश में कोई समस्या ही नहीं बची.
अब कुछ तो महत्वपूर्ण काम हाथ में लेना ही चाहिए, ताकि इतिहास गवाह रहे. बेचारे, शांत, कलात्मक व गैर-प्रतिक्रियाशील इतिहास को छेड़ते हुए ताजमहल व देश की सैकड़ों ऐतिहासिक इमारतों की ओवर हॉलिंग से ज्यादा दिलचस्प और क्या हो सकता है. इस बहाने औरों को भी प्रेरणा मिलेगी और लोग-बाग अपना पारिवारिक इतिहास भी खंगाल लेंगे. हो सकता है वहां भी कोई ‘खजाना’ उनकी राह देख रहा हो.
मैथ पढ़ना हमेशा की तरह अब भी टेढ़ा काम है और वर्तमान ‘धर्मयुग’ में गैरजरूरी भी लगता है, क्योंकि यह नौकरी नहीं दिलाता, खबर नहीं बनाता, धार्मिक कार्य करने की प्रेरणा नहीं देता. नया इतिहास रचने के लिए पुराने को कुरेदना ज्यादा जरूरी है. विशिष्ट, विराट, शक्तिशाली युग प्रवर्तक व्यक्तित्व जब भी इस धरा पर अवतरित हुए हैं, नया इतिहास रचा गया है, राज कवि व लेखकों ने उसे कलमबद्ध किया है. जब वक्त की गर्दन कब्जे में हो, संपन्नता राजनीति की गोद में बैठी हो, तो उद्वेलित मन कुछ अलग व नया महाऐतिहासिक रचने को करता ही है. इस बहाने अन्य कई समस्याएं स्वत: खत्म हो लेती हैं.
वर्तमान बदलना व बचाना बहुत मेहनत मांगता है. भविष्य बनाने के लिए विजन उगाना पड़ता है. पहले इतने समझदार लोग हमारे देश में पैदा नहीं हुए. और जो थे, वे नासमझ नॉन देशभक्त टाइप के लोग थे. इन्हें पता नहीं चलता था कि देश में क्या-क्या रचा जा रहा है, कहां-कहां कितना विकास किया जाना चाहिए. ऐसे ही नासमझ करोड़ों पर्यटक रहे, जो यहां आकर घूमते-फिरते रहे और हमारी चाट-पकौड़ी खाते रहे. उन्होंने भी नया इतिहास रचने की जरा भी प्रेरणा नहीं दी. लेकिन, अब नये बुद्धिमस्तों ने इतिहास बदलने को धर्म की कक्षा का नया पाठ बना दिया है.
गंगा की सफाई संपन्न होने लगी है, तो यह उम्दा ख्याल दिमाग में आया कि लगे हाथ क्यों न मुए इतिहास को भी क्लीन कर दें. वैसे भी, जबरदस्त, चमकदार, खुशबूदार सफाई का युग चल रहा है, तो इतिहास को गंदा नहीं छोड़ना चाहिए. देश के सारे ऐतिहासिक धब्बे धो डालने चाहिए. एक बार कठोर निर्णय लेकर इतिहास को दोबारा पूरी ‘ईमानदारी’ से रचना चाहिए. इतिहास एक प्याज है, जिसमें से आंसू निकालू गंध आती है. विकास के मौसम में इसमें से उनकी मनपसंद खुशबू आनी चाहिए.
संतोष उत्सुक
व्यंग्यकार
santoshutsuk@gmail.com
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