मौन की परिणति
Updated at : 02 Oct 2017 6:39 AM (IST)
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बीते शुक्रवार को जब पूरा देश नवमी मना रहा था, आर्थिक राजधानी मुंबई से फुटओवर ब्रिज पर मची भगदड़ में 23 लोगों की मौत की खबर आयी. एल्फिंस्टन रोड और परेल उपनगरीय रेलवे स्टेशनों को यह फुटओवर ब्रिज जोड़ता है. 1911 में बना यह पुल तब का है जब यहां मिल थे. कामगार थे. पर […]
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बीते शुक्रवार को जब पूरा देश नवमी मना रहा था, आर्थिक राजधानी मुंबई से फुटओवर ब्रिज पर मची भगदड़ में 23 लोगों की मौत की खबर आयी. एल्फिंस्टन रोड और परेल उपनगरीय रेलवे स्टेशनों को यह फुटओवर ब्रिज जोड़ता है. 1911 में बना यह पुल तब का है जब यहां मिल थे.
कामगार थे. पर हालत आज जैसी नहीं थी. आज इस इलाके की सूरत बदल चुकी है. बड़े काॅरपोरेट दफ्तर खुल चुके हैं. यह क्षेत्र कारोबारी केंद्र बन चुका है. सुबह-शाम लाखों लोग एल्फिंस्टन फुटओवर ब्रिज का इस्तेमाल करते हैं. 106 साल के दरम्यान यहां बदला बहुत कुछ, लेकिन पुल जस का तस रहा. यात्रियों के दबाव को देखते हुए समय-समय पर रेलवे ऑथोरिटी को लोगों ने आगाह किया था.
आम लोग बताते रहे कि अत्यंत पुराने हो चुके पुल का जीवन समाप्त हो चुका है. पुल की वस्तुस्थिति बताती तसवीर रेलवे के संबंधित अधिकारियों को ट्वीट किये गये. यहां तक कि शिवसेना के सांसद अरविंद सावंत ने भी तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु और स्थानीय रेलवे अधिकारियों को बजाप्ता पत्र लिखकर बताया था कि यह पुल जानलेवा साबित हो सकता है. लेकिन रेलवे मौन रहा. बीते शुक्रवार को वह आशंका सच बनकर सामने आयी. लोग अपने कामकाज के लिए घर से निकले थे.
एल्फिंस्टन ओवरब्रिज को पार कर वह अपने गंतव्य की ओर जाना चाह रहे थे. इसी बीच पहले से हो रही बूंदाबादी तेज हो गयी. लोकल ट्रेनें आती जाती रहीं. भीड़ बढ़ती जा रही थी. अचानक शॉट सर्किट की अफवाह उड़ी. लोग बेकाबू हो गये. भगदड़ की वजह से नौ महिलाओं सहित 23 लोगों की मौत हो गयी और 30 से ज्यादा घायल हो गये. प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हादसे के पहले यात्रियों को आगाह करती कोई उद्घोषणा भी रेलवे की ओर से नहीं की जा रही थी और न ही वहां सुरक्षाकर्मी ही मौजूद थे. अब पश्चिमी रेलवे ने कहा है कि परेल और एल्फिंस्टन स्टेशनों को जोड़ने के लिए पुराने पुल के समानांतर एक और पुल बनाया जायेगा. इसके लिए टेंडर हो चुका है. कहा जा रहा है कि एल्फिंस्टन पुल को भी चौड़ा करने का प्रस्ताव पास हो चुका था.
पर उस दिशा में कुछ नहीं किया गया. यह मुंबई की हालत है. देश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में बुनियादी जरूरतों के प्रति कैसा रवैया अपनाया जाता होगा, यह कहने की जरूरत नहीं. यह हादसा बता रहा है कि किस तरह हमारे प्राधिकार अपने दायित्वों के प्रति लापरवाही की हद तक मौन साधे रहे हैं. यह मौन नहीं होता, तो ये मौतें भी न होतीं.
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