मंदिर से लोगों को दूर क्यों रखना

Updated at : 26 Sep 2017 6:30 AM (IST)
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मंदिर से लोगों को दूर क्यों रखना

आकार पटेल कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया बीते सप्ताह जगन्नाथ मंदिर दर्शन के लिए मैं यात्रा पर था. मैं इन जगहों पर इसलिए जाता हूं, क्योंकि यहां के इतिहास और वास्तुकला मुझे आकर्षक लगते हैं. और मैंने यह जाना है कि सांस्कृतिक तौर पर भारत एक नहीं है, जैसा वह बाहर से दिखता है. ओडिशा […]

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आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
बीते सप्ताह जगन्नाथ मंदिर दर्शन के लिए मैं यात्रा पर था. मैं इन जगहों पर इसलिए जाता हूं, क्योंकि यहां के इतिहास और वास्तुकला मुझे आकर्षक लगते हैं. और मैंने यह जाना है कि सांस्कृतिक तौर पर भारत एक नहीं है, जैसा वह बाहर से दिखता है. ओडिशा में बच्चे का नाम दु:शासन रखना आम बात है, जिसे महाभारत में खलनायक माना गया है, गुजरात या भारत के किसी और राज्य में बेहद आश्चर्यजनक ही माना जायेगा.
इस यात्रा में मेरे साथ मेरी सास के परिवार, जो कि बंगाली ब्राम्हण हैं, के लोग भी हैं और वे मेरी तुलना में पूजा में अधिक रुचि रखते हैं. व्यक्तिगत रूप से मुझे भगवान से कोई समस्या नहीं है, लेकिन मुझे पहले से ही काफी कुछ मिला हुआ है, तो ऐसे में भगवान से और मांगना शर्मनाक है.
जगन्नाथ मंदिर के बाहर अनेक भाषाओं में एक बोर्ड पर लिखा है, केवल हिंदू को ही अंदर आने की अनुमति है. मुझे समझ नहीं आता है कि इसके पीछे कौन सा तर्क है. चर्च में इस तरह के नियम नहीं हैं, यहां तक कि सर्वाधिक प्रसिद्ध वैटिकन, जिसे मैंने देखा है और जिसकी कलाकृतियों को पूरे गौरव के साथ प्रदर्शित किया गया है, में भी ऐसा नियम नहीं है.
सऊदी अरब गैर-मुस्लिमों को मक्का में जाने की इजाजत नहीं देता है, हालांकि हमसे कहा गया कि गुरु नानक ने एक बार इस तीर्थस्थल की यात्रा की थी. कुछ वर्ष पहले अपने स्थानीय दोस्त के साथ मैं लाहौर स्थित गुरु अर्जन के गुरुद्वारा गया था और वहां बाहर एक बोर्ड लगा था, जो मुसलमानों के गुरुद्वारे में प्रवेश के लिए मना करता था, संभवत: सरकार ने यह बोर्ड लगाया था.
हमने इसे नजरअंदाज कर दिया. जब सिख प्रभारी ने हमसे पूछा कि हम कौन हैं, तो मेरे साथी ने सच बता दिया था. मेरे स्थानीय दोस्त ने अपने बच्चे का नाम अर्जुन रखा था और जब सिखों को यह पता चला, तो उन्होंने हमसे जोर देकर कहा कि हम बच्चे को उनके साथ खेलने के लिए छोड़ जायें और हम सबने गुरुद्वारा देखा.
भारत में मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा सभी के लिए खुले होते हैं और मैं हिंदुआें को उनके स्थानीय मस्जिद में जाने को प्रोत्साहित करूंगा. उनका स्वागत होगा और वे आनंद से भर जायेंगे, भले ही वे इस्लाम में रुचि रखते हों या नहीं. जिन लोगों ने हिंदू धर्म में जन्म नहीं लिया है, लेकिन वे इसे जानने को उत्सुक हैं, मंदिर जाना चाहते हैं, उन्हें बाहर क्यों रखा जाये?
ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि हिंदू ग्रंथ ऐसा कहते हैं, क्योंकि अगर सच में ऐसा होता, तो जिन मंदिरों में यह नियम अभी लागू नहीं है, वहां भी ऐसा ही होता. प्रमुख मंदिराें में विदेशी पर्यटकों और गैर-हिंदुओं को बाहर करने का चलन बढ़ रहा है. मैंने मदुरै स्थित मीनाक्षी मंदिर के गर्भ गृह और नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर भी इसी तरह का बोर्ड लगा देखा.
जन्म से ईसाई महान गायक येशुदास गुरुवयूर मंदिर में गाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें अनुमति देने से बार-बार मना किया जाता रहा है.पद्मनाभस्वामी मंदिर में प्रवेश की अनुमति यह शपथ पत्र देने के बाद मिली कि वे हिंदू रीति-रिवाजों में विश्वास करते हैं.इसके पीछे संभवत: यह तर्क दिया जा सकता है कि हिंदू धर्म परिवर्तन नहीं करते हैं, इसलिए जो समुदाय ऐसा करते हैं, उन्हें बाहर रखने के वे अधिकारी हैं.
लेकिन इसे साबित करना मुश्किल है. दरअसल, मंदिरों ने हमेशा ही लोगों, खासकर अन्य हिंदुओं का निष्कासन किया है. वर्ष 1930 में गांधी ने इस बात के लिए उपवास किया था, क्योंकि स्वामीनारायण मंदिर (जिसका संचालन मेरे समुदाय के लोग करते हैं) नीची जाति के लोगों को मंदिर में प्रवेश देना नहीं चाहता था.
असल बात तो यह है कि स्वामीनारायण संप्रदाय ने नीची जाति के लोगों को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देने के बजाय अदालत में खुद को अल्पसंख्यक, गैर-हिंदू समुदाय साबित करने का प्रयास किया था. तो क्या मंदिर में लोगों को प्रवेश की अनुमति न देने के पीछे जाति की पवित्रता को ही मुख्य कारण माना जाये? मेरी समझ से ऐसा नहीं है.
जगन्नाथ मंदिर के पंडों ने इंदिरा गांधी के प्रवेश पर रोक लगायी थी, जबकि वे जन्मजात हिंदू थीं और उनका दाह-संस्कार भी हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ था. यह हैरान करनेवाला है. रूढ़िवादी हिंदुवाद पूरी तरह वर्ण व्यवस्था पर आधारित है, हमारा संविधान, इसकी अनुमति नहीं देता है. तो वे कौन हैं, जिन्हें पंडे प्रवेश की अनुमति देने का प्रयास कर रहे हैं?
यह बात तब सामने आयी, जब एक अमेरिकन व्यक्ति ने, जिसने उड़िया महिला से शादी की थी, रथ यात्रा में शामिल होने की कोशिश की और उसे पंडों ने पीट दिया. उसकी पत्नी शिल्पी बोराल ने इस पर कहा था, ‘यह अन्याय है.
जब भगवान जगन्नाथ को समूचे ब्रह्मांड का देवता माना जाता है, तब भला मेरे पति को इसमें शामिल होने की आज्ञा कैसे नहीं मिल सकती है?’ शिल्पी की बात में दम है और मेरी इच्छा है कि पुरी मंदिर और दूसरे मंदिर स्पष्ट तौर पर यह बतायें कि अाखिर रथ यात्रा या पूजा में शामिल होने से लोगों को दूर क्यों रखा जा रहा है.
हम अंतिम आरती के समय मंदिर गये और उस समय वहांकेवल कुछ लोग उपस्थित थे. मूर्ति को देखने के बाद मैंने पीछे मुड़कर भीड़ की तरफ देखा और ऐसा करना हमेशा ही आनंददायक होता है. दूसरे धर्म में आस्था रखनेवालों की तुलना में भारतीय भक्ति में ज्यादा दिखावा करते हैं.
इसका एक कारण यह हो सकता है कि हमारी प्रार्थना सामूहिक (जैसे चर्च, मस्जिद या गुरुद्वारे में होती है) न होकर, व्यक्तिगत होती है. हम इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि मूर्ति यानी भगवान का ध्यान सिर्फ हम पर ही रहे और इसलिए हम उनके सामने विशेष हाव-भाव प्रदर्शित करते हैं.
जगन्नाथ मंदिर दर्शन के लिए जो लोग वहां आये थे, उनमें से ज्यादातर बेहद गरीब थे, वे सच्ची भक्ति, भावना और आस्था का प्रदर्शन कर रहे थे और मैं उन्हें देखने के लिए मुड़ा था. मेरी इच्छा है कि उस पल का अनुभव करने के लिए ज्यादा लोगों को हमें अनुमति देनी चाहिए. हिंदू भक्ति के उत्साह व परमानंद और इसका अनुभव करने की खुशी, दोनों के लिए.
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