रोजगार की भाषा बने हिंदी

Updated at : 22 Sep 2017 9:35 AM (IST)
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रोजगार की भाषा बने हिंदी

आमतौर पर हिंदी दिवस पर दो बातें दिखाई देती हैं- एक, मातृभाषा के रूप में हिंदी का गौरवगान. हम हिंदी की महिमा का बखान मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि यह जरूरी नहीं कि हिंदी हर किसी की मातृभाषा ही हो. इससे अन्य भाषाओं के मातृभाषा के स्वरूप को समझने में हमसे चूक हुई […]

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आमतौर पर हिंदी दिवस पर दो बातें दिखाई देती हैं- एक, मातृभाषा के रूप में हिंदी का गौरवगान. हम हिंदी की महिमा का बखान मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि यह जरूरी नहीं कि हिंदी हर किसी की मातृभाषा ही हो. इससे अन्य भाषाओं के मातृभाषा के स्वरूप को समझने में हमसे चूक हुई है. दूसरा, अंग्रेजी भाषा का विरोध. इन्हीं दो रूपों में हम हिंदी के भविष्य को सुरक्षित कर लेने का दावा करते हैं.

लेकिन, यह किसी भी भाषा के विकास का सैद्धांतिक तरीका नहीं है. इससे यह संकेत मिलता है कि हमारे पास हिंदी के विकास की स्पष्ट रूपरेखा नहीं है.

हिंदी को स्वाधीनता आंदोलन से जोड़कर राष्ट्रीय फलक देने का प्रयास महात्मा गांधी ने किया था. गांधीजी के प्रयास से ही हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए देशभर में प्रचारिणी सभाओं का गठन हुआ. ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ ने इस दिशा में काफी प्रयास किया. इस तरह हम देखते हैं कि एक प्रांत की खड़ी ‘बोली’ हिंदी ‘भाषा’ बनी. लेकिन, आजादी के बाद हुए भाषा विवाद की राजनीति से हिंदी का राष्ट्रीय स्वरूप उभर नहीं पाया. 14 सितंबर, 1949 को संसद ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकृत तो किया, लेकिन यही स्वीकृति जनमानस में नहीं बन पायी. इसके साथ ही पंद्रह साल तक अंग्रेजी के सहारे आगे चलने की शर्त ने इसके विकास की संभावनाओं को भी बाधित कर दिया.
आजादी के बाद हिंदी के विकास की धारा बदली. राजभाषा विभाग की जटिलताओं से हिंदी आम जनता से दूर होती गयी. कहा जाता है कि हिंदी के जिस उपन्यास ‘चंद्रकांता’ को पढ़ने के लिए लोगों ने हिंदी सीखी, उसके साहित्य की भाषा से भी राजभाषा विभाग दूर होता गया. हिंदी की शब्दावली बढ़ाने के लिए अनुवाद के जरिये जटिल से जटिल पारिभाषिक शब्द गढ़े जाने लगे. अहिंदी भाषा के सहज ग्राह्य शब्दों को उसी रूप में स्वीकृत करने के बजाय उसके अनुवाद ने कृत्रिमता को बढ़ावा दिया. परिणामस्वरूप, आम जन की हिंदी और कार्यालय की हिंदी का भेद बढ़ता गया.
अहिंदी क्षेत्रों में हिंदी के प्रसार की बात तो कही जाती रही, लेकिन इसके लिए निर्मित ‘त्रिभाषा सूत्र’ को खुद हिंदी पट्टी में ही लागू नहीं किया गया. केरल को छोड़ कर हमें इसका दूसरा सफल उदहारण दिखायी नहीं देता है. इस तरह हिंदी के साथ जो कृत्रिम बर्ताव हुआ, उसका हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा. स्कूल कॉलेजों में हिंदी में पाठ्यक्रम की सामग्रियों के अभाव एवं प्रतियोगिता परीक्षाओं में हिंदी को महत्व न देने की वजह से विद्यार्थी प्रभावित हुए. आइआइटी और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी में दक्ष न होने की वजह से बाहर होनेवाले विद्यार्थियों की संख्या चालीस प्रतिशत तक है. दुर्भाग्य कि इस मुद्दे को लेकर संवैधानिक प्रावधान होने के बावजूद उसका अनुपालन नहीं हो रहा है.
अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश देते हुए कहा गया है कि हिंदी भाषा का प्रसार और विकास इस तरह से हो कि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके. भारत की सामासिक संस्कृति भारत की विविधता की अभिव्यक्ति है. हिंदी इसका वहन तभी कर सकेगी, जब वह अपना द्वार खुला रखेगी. इसके लिए उसे एक ओर केवल संस्कृत की निर्भरता को छोड़ना होगा, वहीं दूसरी ओर भारतीय एवं भारतीयेतर भाषाओं से मेल बढ़ाना होगा. विभिन्न अनुशासनों के ज्ञान के साथ हिंदी को सहज रूप में जुड़ना होगा.
हाल के दिनों में जिस तरह से हिंदी को भी सांप्रदायिक रंग देने के संकेत मिल रहे हैं, वह हिंदी भाषा और हिंदी समाज दोनों के लिए घातक है. कुछ दिन पहले ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि कक्षा एक से बारहवीं तक के एनसीइआरटी की किताबों से उर्दू, फारसी और अंग्रेजी के शब्द हटाये जाने चाहिए. इस न्यास के प्रमुख दीनानाथ बत्रा ने पाठ्य-पुस्तकों से इतिहास को भी बदलने की बात कही है. अगर ऐसा हुआ, तो हिंदी कभी समृद्ध नहीं हो पायेगी. इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि जो संस्कृत बदलते हुए परिवेश के साथ ‘सरवाइव’ नहीं कर सकी, उसी संस्कृत की शब्दावलियों के अकेले बूते कैसे हिंदी आज के बाजार युग में टिक पायेगी? हमें इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी आम जनता की भाषा है. इसके बीज अमीर खुसरो की भाषा में हैं.

इसे जनता ने अपने श्रम के साथ विकसित किया है. यह तब तक जीवंत बनी रहेगी, जब तक यह आम जन से जुड़ी रहेगी. यदि जनसमाज आज सूचना क्रांति और वैश्विक दुनिया से जुड़ रहा है, तो इस दौर में हमें हिंदी में रचनात्मक बदलाव को भी स्वीकार करना चाहिए. नये ज्ञान-विज्ञान की तकनीकों एवं रोजगार से जुड़े बिना किसी भी भाषा का विकास एवं विस्तार संभव नहीं है. हम हिंदी वाले जो ‘पितृपक्ष’ में हिंदी पखवाड़ा मनाते हैं, उन्हें खास तौर पर तार्किकता के साथ उक्त सभी बिंदुओं पर विचार करना चाहिए.

डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
anujlugun@cub.ac.in
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