तमाम आरोपों से जूझता विपक्ष

Updated at : 18 Jul 2017 6:09 AM (IST)
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तमाम आरोपों से जूझता विपक्ष

आकार पटेल कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया बिहार संकट को देखते हुए ऐसा लगता है कि भारत के विपक्षी दल एक बड़ी समस्या का सामना कर रहे हैं. फिलहाल, उनके सामने यह समस्या अभी रहेगी और यह 2019 के आम चुनाव में उन्हें नुकसान पहुंचायेगी. यहां समस्या विश्वसनीयता का है और कुछ ही देर में […]

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आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
बिहार संकट को देखते हुए ऐसा लगता है कि भारत के विपक्षी दल एक बड़ी समस्या का सामना कर रहे हैं. फिलहाल, उनके सामने यह समस्या अभी रहेगी और यह 2019 के आम चुनाव में उन्हें नुकसान पहुंचायेगी. यहां समस्या विश्वसनीयता का है और कुछ ही देर में आगे मैं इस मुद्दे पर आऊंगा.
बिहार का मामला सरल है- उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार का आरोप है. इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने प्रथम सूचना रिपार्ट (एफआइआर) दर्ज करायी है. तेजस्वी और उनके परिवार की कुछ संपति के बारे में सरकार ने खुलासा या रहस्योद्घाटन किया है. ये आरोप नुकसान पहुंचा रहे हैं, खासकर जिस पैमाने पर संपत्ति का खुलासा हुआ है. मीडिया में उपमुख्यमंत्री के पास लगभग कोई बचाव नहीं है. परिवार के मुखिया लालू प्रसाद यादव हैं, जो सबसे ज्यादा आक्रामक तेवर के साथ भाजपा के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाने की वकालत करते रहते हैं.
बिहार सरकार, लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के साथ गठबंधन में चल रही है. एक समय ये दोनों दल एक आम विचारधारा, जिसे लोहिया का समाजवाद (लोहिया भारतीय राजनीति के सबसे ज्यादा दिलचस्प व्यक्तियों में से एक थे, जिन्हें अब लगभग पूरी तरह भुला दिया गया है, के नाम पर) कहा जा सकता है, से जुड़े हुए थे. मूल रूप से सभी समाजवादी कांग्रेस के विरोधी थे.
हालांकि, भारतीय जनता पार्टी के उभार के बाद और खासकर बाबरी मसजिद के खिलाफ इसके सफल आंदोलन के बाद लोहियावादी राजनेता हिंदुत्व विरोधी हो गये और कांग्रेस के साथ भी गठबंधन को तैयार थे.
हालांकि, कुछ समाजवादियों ने अपना कांग्रेस विरोधी रुख बरकरार रखा, जैस जॉर्ज फर्नांडिस और कुछ हद तक नीतीश कुमार ने भी. लेकिन, अब लगभग सभी अपने मूल रुख भाजपा विरोध पर वापस आ चुके हैं.
इनके ऊपर अब पाखंड और विचारधारा काे त्यागने के आरोप लग रहे हैं. यह किस तरह का समाजवाद है, जहां एक ऐसे राज्य, जहां की बहुसंख्यक जनता गरीब है, के राजनेता और उनके परिवार अरबों की संपत्ति खड़ी कर लेते हैं? एक रिपोर्ट में यादव परिवार पर हजारों करोड़ रुपये या उससे अधिक की बेनामी संपत्ति के लेने-देने का उल्लेख है. मैं स्वीकार करता हूं कि ये आरोप हैं और इन्हें अभी अदालत में साबित करना होगा, लेकिन बचाव पक्ष के पास तथ्य नहीं हैं. यादव परिवार ने इस मसले पर कुछ बातें कही हैं, जैसे वे भाजपा से नहीं डरते और सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लड़ते रहेंगे.
दूसरा मसला कांग्रेस का है, जिस पर समाजवादियों ने वंशवाद को बढ़ावा देने का आराेप लगाया था और यह आरोप सही था. इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि नेहरू ने इंदिरा को अागे बढ़ाया और उसके बाद राजीव गांधी कांग्रेस प्रमुख बने थे और उसके बाद सोनिया. लेकिन, एक बार फिर वही सवाल है कि समाजवादियों से हम यह उम्मीद नहीं करते हैं कि वे खुद ही राजवंश तैयार करें. उत्तर प्रदेश के यादवों ने समाजवादी पार्टी पर पूरी तरह कब्जा जमाया हुआ है, जो केवल नाम की समाजवादी है. ऐसा बमुश्किल ही हुआ होगा, जब दूर के रिश्तेदार या चाचा के बेटे को लोकसभा या विधानसभा का टिकट नहीं दिया गया होगा और चुने जाने के बाद शायद ही उन्हें सरकार से बाहर रखा जाता है.
समाजवादियों का यह रिकॉर्ड तब है, जब वे कहते हैं कि वे भारत में विभाजनकारी और सांप्रदायिक राजनीति से लड़ रहे हैं. हां, यह सच है कि अल्पसंख्यकों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता मजबूत है और भारत को लेकर उनकी सोच समावेशी है. लेकिन, जो मुद्दे राजनीति में धर्म से संबंधित नहीं हैं, उसे लेकर उनकी कोई विश्वसनीयता नहीं है. उत्तर प्रदेश और बिहार के यादव नेताओं को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा और और उसके समर्थकों को जवाब देना बहुत मुश्किल होगा.
विश्वसनीयता की यह कमी उन्हें बुरी तरह नुकसान पहुंचा चुकी है. इस बात की बहुत कम संभावना है कि 2019 की बननेवाली सरकार का मुख्य मुद्दा सांप्रदायिकता होगा. इसका कारण यह है कि मवेशी वध जैसे मुद्दों पर होनेवाली हिंसा को भाजपा ने सामान्य बना दिया है. कुछ-कुछ दिनों पर मुसलिमों की होनेवाली हत्या को यह देश आसानी से हजम कर सकता है और उसे बड़े मुद्दे के तौर पर नहीं देखा जाता है. अगर ऐसा होता, तो हम इसकी प्रतिक्रिया अब तक देख चुके होते, लेकिन हम ऐसा नहीं देखते हैं. यह बेहद शर्मनाक, किंतु सत्य है. ऐसी बातों को मामूली माना जाता है.
प्रभावी बयान 2014 के चुनाव का ही दोहराव होगा. उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहेंगे कि आतंकवाद पर नरम रुख रखनेवाले और भारत को क्षति पहुंचाने की अनुमति देनेवाले भ्रष्ट नेताओं द्वारा इस देश को पीछे ले जाया जा रहा है, क्योंकि उन नेताओं की रुचि सिर्फ खुद को और अपने परिवार को समृद्ध बनाने में है.
यह एक सरल तर्क है और मुझे नहीं लगता कि यह सही है. हालांकि, यह विपक्ष के ऊपर है कि वह इसका बचाव और मुकाबला करे. जब तक उनकी प्रतिक्रिया सांप्रदायिकता के आरोपों तक सीमित रहेगी, तब तक ऐसा करना नाकाफी होगा. इसके लिए उन्हें एक केंद्रीय बयान की जरूरत होगी, जो बहुसंख्यक भारतीयों को यह विश्वास दिला सके कि उनकी सरकार भ्रष्ट नहीं होगी. यह भी कि वे व्यक्तिगत तौर पर संदेह से परे हैं, जैसे मनमोहन सिंह थे और नरेंद्र मोदी हैं.
बिहार, उत्तर प्रदेश और कई दूसरे राज्यों को देखते हुए यह मुश्किल लगता है कि वर्षों से आरोपित रहे उन्हीं लोगों के साथ ऐसा कैसे संभव हो सकता है. वर्ष 2019 में विपक्ष के सिर पर यह भार रहेगा. जब तक इसे स्वीकार नहीं किया जायेगा और पूरे दम-खम के साथ इसे बदलने के लिए कार्य नहीं किया जायेगा, तब तक सबकुछ पूर्ववत रहेगा, जैसा 2014 में था.
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