बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार

Updated at : 16 Jun 2017 6:17 AM (IST)
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बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार

भले ही हम बड़े-बूढ़ों के सम्मान की अपनी सांस्कृतिक समझदारी पर इतरायें, पर सच यह है कि असली जीवन में इसका आचरण हम कम ही करते हैं. परिवारों में संपत्ति या अन्य विवादों की वजह से बुजुर्गों के साथ खराब व्यवहार करने की खबरें अब हमें नहीं चौंकाती हैं. हालत इस हद तक बिगड़ चुकी […]

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भले ही हम बड़े-बूढ़ों के सम्मान की अपनी सांस्कृतिक समझदारी पर इतरायें, पर सच यह है कि असली जीवन में इसका आचरण हम कम ही करते हैं. परिवारों में संपत्ति या अन्य विवादों की वजह से बुजुर्गों के साथ खराब व्यवहार करने की खबरें अब हमें नहीं चौंकाती हैं. हालत इस हद तक बिगड़ चुकी है कि समाज में भी उन्हें दुर्व्यवहारों का सामना करना पड़ रहा है.

उम्रदराज लोगों की देखभाल करनेवाली संस्था हेल्पएज इंडिया के ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, 44 फीसदी बुजुर्गों ने सार्वजनिक स्थानों पर अपने साथ हुए बुरे व्यवहार की बात कही, जबकि 53 फीसदी का मानना है कि भारतीय समाज बूढ़ों के साथ भेदभाव करता है. करीब 64 फीसदी का कहना है कि बुजुर्गों को अपमानित कर बच निकलना आसान है. बड़े दुर्भाग्य की बात है कि बेंगलुरु जैसे आधुनिक और समृद्ध शहर में 70 फीसदी बुजुर्गों ने रोजमर्रा के जीवन में खराब व्यवहार का सामना किया है. हैदराबाद, भुवनेश्वर और चेन्नई का हाल भी कोई बेहतर नहीं हैं. दिल्ली में यह आंकड़ा 23 फीसदी है.

इस सर्वेक्षण में 4,615 बुजुर्गों से बात की गयी, जिनमें 2,377 पुरुष और 2,238 महिलाएं शामिल थे. इसी तरह का एक सर्वेक्षण विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से लांसेट ग्लोबल हेल्थ ने किया है. इस सर्वेक्षण में 28 देशों में 52 अध्ययन किये गये और पाया गया कि 60 साल से अधिक उम्र के 16 फीसदी बुजुर्गों को मानसिक, आर्थिक एवं शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है. इस अध्ययन में भारत का आंकड़ा 20.8 फीसदी का है.

पहले के सर्वेक्षणों की तुलना के आधार पर दोनों ही रिपोर्टों में कहा गया है कि बुजुर्गों से दुर्व्यवहार की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. यह भी चिंता की बात है कि सामाजिक और सरकारी स्तर पर इस गंभीर संवेदनशील समस्या पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया है. पिछले साल मई में स्वास्थ्य मंत्रालय ने विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तैयार एक संबंधित योजना को अपनाया है.

इस संदर्भ में हुई प्रगति का आकलन अभी बाकी है. देश और समाज के रूप में हम अपनी शैक्षणिक समझ और आर्थिक क्षमता को निरंतर बढ़ा रहे हैं, लेकिन यह भी सोचा जाना चाहिए कि क्या उसी गति से हमारी संवेदनाएं भी मजबूत हो रही हैं. बुजुर्गों की मुश्किलों के साथ अपराध, भ्रष्टाचार और हिंसा को भी जोड़ दें, तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि हमें बड़ी गंभीरता से आत्ममंथन करने की जरूरत है. हमारा वर्तमान इन बुजुर्गों की मेहनत और लगन की नींव पर ही खड़ा हुआ है. ऐसे में उनसे सम्मानपूर्ण व्यवहार करना मानवीय नैतिकता है, जो हमारे सामाजिक मूल्यों में प्राथमिकता से शामिल होना चाहिए.

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