सफाई की मिसाल

Updated at : 15 Jun 2017 6:32 AM (IST)
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सफाई की मिसाल

शफक महजबीन स्वतंत्र टिप्पणीकार इस्लामी कैलेंडर में रमजान बहुत ही खैर-ओ-बरकत वाला महीना है. इस पूरे महीने लोग नेकी के काम में लगे रहते हैं, क्योंकि इस महीने एक नेकी का बदला सत्तर गुना मिलता है. रोजे रखने से बहुत से एख्लाकी और जिस्मानी फायदे होते हैं. अल्लाह की इबादत के साथ एक-दूसरे की मदद […]

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शफक महजबीन

स्वतंत्र टिप्पणीकार

इस्लामी कैलेंडर में रमजान बहुत ही खैर-ओ-बरकत वाला महीना है. इस पूरे महीने लोग नेकी के काम में लगे रहते हैं, क्योंकि इस महीने एक नेकी का बदला सत्तर गुना मिलता है.

रोजे रखने से बहुत से एख्लाकी और जिस्मानी फायदे होते हैं. अल्लाह की इबादत के साथ एक-दूसरे की मदद का जज्बा इस महीने कुछ ज्यादा ही होता है और इसीलिए इसमें लोग एक-दूसरे की मदद को हर मुमकिन सामने आते हैं. रमजान की अहमियत सिर्फ इबादतों तक नहीं है, बल्कि यह समाजी हकूक तक फैला हुआ है.

हमारे प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत की जो अलख जगायी है, उससे स्वच्छता को लेकर लोग जागरूक हो रहे हैं और अपने गांव-नगर को साफ रखने की लगातार कोशिश कर रहे हैं. ऐसी ही एक कोशिश ने उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के गांव मुबारकपुर कला को एक मिसाल बना दिया है.

मुबारकपुर कला एक मुस्लिम बहुल गांव है, जिसकी आबादी साढ़े तीन हजार से ज्यादा है, पर शौचालय सिर्फ 146 घरों में ही मौजूद है. लेकिन, अब वह गांव पूरी तरह से खुले में शौच-मुक्त है, क्योंकि गांव वालों ने चंदा इकट्ठा करके, साथ ही मजदूरी भी करके एक सार्वजनिक शौचालय बनवा दिया है. इस मामले में मुबारकपुर गांव उत्तर प्रदेश का पहला गांव बन गया है.

मुबारकपुर की ग्राम प्रधान किश्वर जहां ने अपने गांव में सार्वजनिक शौचालय के लिए प्रशासनिक तौर पर मदद लेने की कोशिश तो की, लेकिन गांव के जागरूक लोगों ने कहा कि रमजान के महीने में हम किसी से मदद नहीं लेंगे, बल्कि हम सब मिल कर चंदा इकट्ठा करेंगे और एक सार्वजनिक शौचालय बना कर पूरे गांव की मदद करेंगे, ताकि औरतों को बाहर न जाना पड़े.

इस पहल का साथ पूरे गांव ने दिया और बिना किसी सरकारी मदद के ही आपसी चंदों से इकट्ठा हुए साढ़े सत्रह लाख रुपये में सार्वजनिक शौचालय बन कर तैयार हो गया. अब मुबारकपुर गांव का कोई भी बूढ़ा-बच्चा, मर्द-औरत शौच के लिए खुले में नहीं जाता.

इस्लाम में आता है कि पाकीजगी आधा ईमान है. बस इसी बात को साबित करने के लिए मुबारकपुर के मुसलमानों ने सोचा कि क्यों न इस रमजान के दौरान यह काम करके इस बाबरकत महीने का एहतराम किया जाये और सवाब कमाया जाये.

दीन-धर्म के लिए तो अक्सर हम चंदा देते आये हैं, लेकिन अगर एक चंदा ऐसा भी हो जो गांव को खुले में शौच-मुक्त करने के काम आये, तो यह सचमुच में एक नायाब मिसाल ही होगी. भले ही कोई गांव अपने चंदे से शौचालय न बनवा पाये, लेकिन अगर सभी गांवों के लोग मुबारकपुर के लोगों की तरह सोच रखें, तो प्रशासनिक एवं सरकारी मदद से हर गांव में सार्वजनिक शौचलाय बन सकता है. इसके लिए जरूरी है कि गांव के लोगों में जागरूकता आये और वे साफ-सफाई को पाकीजगी के साथ जोड़ कर चलें.

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