हिंदुत्व की सामासिकता

By Prabhat Khabar Digital Desk
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शशि थरूर वर्तमान में सांसद हैं. वह भारत सरकार के राज्यमंत्री रह चुके हैं. इन पदों से अलग वह एक विद्वान के रूप में भी दुनियाभर में मशहूर हैं.

उनके खाते में 'द ग्रेट इंडियन नॉवेल' और 'इंडिया : फ्रॉम मिडनाइट टू द मिलेनियम' जैसी बहुचर्चित किताबें हैं. हाल ही में उनकी एक और चर्चित किताब 'व्हॉइ आई एम ए हिंदू' आयी है, जिसका हिंदी अनुवाद 'मैं हिंदू क्यों हूं' को वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

शशि थरूर इस किताब की भूमिका में ही कहते हैं कि वह आज के माहौल में सक्रिय हिंदुत्व से जूझते राजनीतिक के नजरिये या निराशा की भावना से नहीं, बल्कि धर्म के भीतर खड़े एक हिंदू के रूप में अपने विचार प्रकट कर रहे हैं.

वह कहते हैं, ‘मैं उन्हें उन्हीं की तरह एक हिंदू के रूप में चुनौती देना चाहता हूं’, लेकिन उनके सामने समस्या यह आ खड़ी होती है कि हिंदू धर्म भी परस्पर विरोधी अवधारणाओं से निर्मित है. वह कहते हैं, हिंदू दर्शन इस बात का साक्षी है कि युगों से निष्ठावानों के बीच तर्कपूर्ण वाद-विवाद चलता रहा है. इसे वह हिंदू धर्म के उदात्त स्वरूप और बौद्धिक लचीलेपन का नतीजा मानते हैं.

उनका यह भी मानना है कि भारत जैसे बहु-धार्मिकता वाले देश में 'सेक्युलरिज्म' एक बेमेल नाम है. हमें इसके बजाय 'बहुलतावाद' की बात करनी चाहिए. भारत के बहुलतावाद की जड़ें हिंदुओं द्वारा भिन्नता की स्वीकृति में ढूंढ़ी जा सकती हैं, जो आज भारतीय समाज के अधिकांश हिस्से के लिए निष्ठा का प्रश्न बन चुकी हैं.

आज हमारे समाज और राजनीति में सही धर्म नहीं है. धर्म के नाम पर संगठित भीड़-तंत्र, अस्मिता और वर्चस्ववादी दुराग्रहों का शोर खड़ा हो गया है. ऐसे में थरूर पूछते हैं कि वास्तव में धर्म क्या है? उन्होंने धर्म को एक सामान्य जन की दृष्टि से उसकी महान शिक्षाओं और परंपराओं के आलोक में देखा है, जो उन्हें जीवन के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाने में समर्थ बनाता है.

यह नहीं माना जा सकता कि इससे स्वाधीन भारत में एक मार्गदर्शक हिंदू ग्रंथ की बहुत बड़ी कमी पूरी हो गयी है, लेकिन इतना जरूर है कि वर्तमान में सक्रिय हिंदुत्व की वजह से जो सामाजिक और सांस्कृतिक उहापोह की स्थिति है, उसमें यह किताब उस कुहासे को हटाती हुई सही रास्ता तैयार करती है. यह कहने की जरूरत नहीं कि हम इसी रास्ते बहुसांस्कृतिक संपन्नता की ओर बढ़ सकते हैं और इसी के जरिये अपनी सामासिक संस्कृति को बचाये रख सकते हैं.

- मनोज मोहन

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