कानून के कवच में 'वंदे मातरम्'
भारतीय संसद के सत्र की शुरुआत राष्ट्र गान 'जन गण मन' की धुन के साथ होती है और सत्र का अनिश्चित काल के लिए समापन राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम्' की धुन के साथ किया जाता है. वैधानिक स्तर पर भी राष्ट्र गीत को राष्ट्रगान के बराबरी का मुकाम मिल गया है. देश की संसद में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कर राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम्' को कानून के दायरे में शामिल कर लिया गया. जानें, क्या हैं वंदे मातरम् विधेयक के प्रावधान और इसके बारे में राजनीतिक विश्लेषक सुब्रत मुखर्जी की राय ..
राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026, जिसे 'वंदे मातरम विधेयक' भी कहा जा रहा है, मौजूदा मानसून सत्र में पारित हो गया. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जायेगा. इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य भारत के राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को वही कानूनी संरक्षण और दर्जा देना है, जो अब तक राष्ट्रगान 'जन गण मन' को प्राप्त था. डेढ़ सौ साल पहले मूल रूप से संस्कृत और बांग्ला भाषा में लिखा गया यह गीत बीते नवंबर से भारतीय राजनीति के केंद्र में बना हुआ है और अब संशोधन विधेयक के पारित होने के बाद से एक बार फिर चर्चा में है.
संशोधित विधेयक में प्रावधान
यह विधेयक 'राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971' की धारा 3 में संशोधन करता है. इस नये संशोधन के जरिये राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के अपमान पर भी सजा का प्रावधान किया गया है. सजा का प्रावधान : यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन को रोकता है या इसके सामूहिक गायन में कोई बाधा/व्यवधान उत्पन्न करता है, तो उसे 3 साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है. दोबारा यही अपराध करने पर कम से कम 1 वर्ष की अनिवार्य जेल की सजा का प्रावधान है.
व्यावहारिक चुनौतियां
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में विभिन्न धार्मिक आस्थाओं के लोग रहते हैं, इसलिए इसमें मौलिक अधिकार बनाम अनिवार्यता के लिहाज से कुछ व्यावहारिक व वैधानिक चुनौतियां भी पेश आ सकती हैं. यदि किसी व्यक्ति पर गाना गाने का दबाव बनाया जाता है या न गाने को अपराध मान लिया जाता है, तो यह मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19 और 25) के उल्लंघन का मुद्दा बन सकता है. सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला 'बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य' (1986) यह स्पष्ट करता है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक आस्था के कारण राष्ट्रगान नहीं गाता, लेकिन सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है, तो उसे बाध्य नहीं किया जा सकता, बहुत संभव है कि यही सिद्धांत राष्ट्रीय गीत पर भी लागू हो. प्रोटोकॉल का पालन कैसे कराया जायेगा और स्कूलों, सरकारी कार्यक्रमों या सार्वजनिक सभाओं में इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इसे लेकर अभी चीजें स्पष्ट नहीं हैं. पारित किये गये संशोधन विधेयक में 'जानबूझकर किया गया अपमान' शब्द का इस्तेमाल किया गया है. लेकिन 'अपमान' क्या है और क्या केवल राष्ट्रीय गीत न गाना या शांत रहना अपमान माना जायेगा, इसकी कोई ठोस और स्पष्ट परिभाषा होनी चाहिए.
जब शुरू हुई वंदे मातरम् गाने की परंपरा
राजनीतिक विश्लेषक सुब्रत मुखर्जी बताते हैं राजनीतिक मंच पर वंदे मातरम् गीत गाने की परंपरा 19वीं सदी में शुरू हुई. वर्ष 1896 में कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार वंदे मातरम् गाया गया और इस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने यह गीत गाया था. यहां से एक परंपरा शुरू हुई और आगे बढ़ी. वंदे मातरम् को लेकर पहली बार विवाद हुआ 1936-37 में, जब राज्यों में सरकारें बनीं. प्रांतीय चुनावों के बाद कृषक प्रजा पार्टी ने बंगाल में सरकार बनाई, कांग्रेस विपक्ष में थी. वर्ष 1938 में जब सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष थे, कृषक प्रजा पार्टी के एके फजलुल हक और बंगाल के कुछ अन्य मुस्लिम एलीट ने वंदे मातरम् गाने को लेकर आपत्ति दर्ज कराई. उनका कहना था कि इस गीत में मां दुर्गा की स्तुति है. इस आपत्ति के बाद सुभाष चंद्र बोस ने एक समिति बनायी और इस बारे में रवींद्रनाथ टैगोर को एक पत्र लिखा. टैगोर की तरफ से जवाब आया कि यह गीत एक काल्पनिक उपन्यास 'आनंदमठ' के लिए लिखा गया, उसके लिए यह उपयुक्त है. लेकिन, राष्ट्र के गीत के तौर पर इसे गाने को लेकर जो आपत्तियां हैं, उन्हें ध्यान में रखते हुए पूरे गीत की बजाय शुरू के दो पैराग्राफ गाना उचित होगा. इस पर सभी की सहमति बन गयी.
संविधान सभा में मिला राष्ट्र गीत का दर्जा
सुब्रत मुखर्जी कहते हैं आजादी के बाद जब 'जन-गण-मन' देश का राष्ट्रगान बना, नेशनल असेंबली में भारत की संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी, 1950 को यह घोषणा की कि 'वंदे मातरम्' गीत ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक भूमिका निभायी है. इसलिए इस गीत को राष्ट्रगान के समान सम्मान और बराबर का दर्जा दिया जायेगा. तभी से वंदे मातरम् को भारत का राष्ट्र गीत मानने की परंपरा बरकरार है. हर देश का एक इतिहास और परंपरा होती है. भारत के स्वाधीनता संग्राम का अपना एक इतिहास रहा है और इसके आधार पर जन-गण-मन और वंदे मातरम् दोनों देश के लिए अहम हैं, लेकिन यह भी मानना चाहिए कि 1937-38 में जो एक सहमति बनायी गयी थी कि इसके शुरुआती दो पैराग्राफ ही हम इसमें रखेंगे, इससे हटना नहीं चाहिए. लेकिन, संशोधन विधेयक में यह स्पष्ट नहीं है कि वंदे मातरम् के शुरुआती दो पैरा इसके दायरे में आयेंगे या पूरा गीत. देश में अनेकता में एकता का जो मूल सिद्धांत है, उसके अनुसार चलना चाहिए. सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान सबसे ऊपर होना चाहिए. देश भर में वंदे मातरम् गीत के प्रति लोगों में हमेशा से एक श्रद्धा और सम्मान की भावना थी, है और रहेगी, इसके लिए कोई कानून हो या न हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.
राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 बनाम 2026 संशोधन
मूल अधिनियम, 1971 - 23 दिसंबर, 1971 को लागू हुआ, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय ध्वज, संविधान व राष्ट्रगान को वैधानिक संरक्षण देना था. - राष्ट्रगान के गायन को जानबूझकर रोकने या इसकी सभा में व्यवधान डालने पर अधिकतम 3 वर्ष की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया. - राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2014 से 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार, 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971' के तहत दर्ज 90 प्रतिशत से अधिक मामले लंबित हैं और दोषसिद्धि दर 16 प्रतिशत से कम है.
2026 संशोधन विधेयक -राष्ट्रगान के साथ-साथ राष्ट्र गीत वंदे मातरम को भी समान वैधानिक संरक्षण दिया गया है. - 'वंदे मातरम्' के गायन को रोकने या गायन से जुड़ी सभा में बाधा पहुंचाने पर धारा 3 के तहत 3 साल की जेल व जुर्माना दोनों का प्रावधान होगा.
वंदे मातरम् के डेढ़ सौ साल
रचना का काल: बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् गीत 1870 के दशक में लिखा था.
आनंदमठ में प्रकाशन : साल 1882 में इसे बंकिमचंद्र ने अपने संन्यासी विद्रोह पर केंद्रित प्रसिद्ध बांग्ला उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया.
पहला राजनीतिक मंच : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1896 के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार मंच से गाया.
स्वतंत्रता संग्राम का नारा : वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान यह गीत रातों-रात एक जन आंदोलन बन गया और ब्रिटिश सरकार ने घबराकर इस पर प्रतिबंध लगा दिया.
वैश्विक पहचान : महान दार्शनिक व क्रांतिकारी श्री अरबिंदो ने 1909 में इस गीत का अंग्रेजी में काव्यात्मक अनुवाद किया और इसके संदेश को वैश्विक स्तर पर पहुंचाया.
राष्ट्र गीत का दर्जा : संविधान सभा के अंतिम दिन 24 जनवरी, 1950 को अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि 'वंदे मातरम' को भारत के राष्ट्रगान 'जन गण मन' के बराबर का सम्मान और राष्ट्र गीत का दर्जा दिया जायेगा.
कानूनी संरक्षण : जुलाई 2026 के अंत में संसद में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' से जुड़ा राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया गया.
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By Preeti Singh Parihar
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