फास्ट ट्रैक कोर्ट : कितनी तेज है न्याय की रफ्तार

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जंतर मंतर में 37 दिन तक चला छात्र आंदोलन शिक्षा मंत्री धर्मेंद प्रधान के इस्तीफे के साथ समाप्त हो गया. लेकिन, आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद मोदी की ओर से 23 जुलाई को जारी वीडियो संदेश में नीट पेपर लीक मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने के वादे के चलते न्याय की यह त्वरित व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में है. इस बार इन दिनों में बात फास्ट ट्रैक कोर्ट के बारे में...
विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील
फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से अपनी आवश्यकताओं और संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार, संबंधित उच्च न्यायालयों के परामर्श से की जाती है. 14वें वित्त आयोग ने वर्ष 2015-2020 की अवधि के दौरान 1800 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की सिफारिश की थी. उद्देश्य था विशिष्ट श्रेणियों के मामलों का तेजी से निपटारा करना, जिनमें जघन्य अपराध, महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों, गंभीर बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों से संबंधित और 5 साल से अधिक समय से लंबित संपत्ति संबंधी मामले शामिल हैं. इसके अलावा, बलात्कार और पॉक्सो अधिनियम, 2012 के तहत लंबित मामलों के समय पर निपटारे के लिए अक्टूबर 2019 में 'विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट', जिनमें विशेष पॉक्सो अदालतें भी शामिल हैं, की स्थापना के लिए केंद्र प्रायोजित योजना शुरू की गयी. वर्तमान में 775 विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट और लगभग 862 नियमित फास्ट ट्रैक कोर्ट कार्यरत हैं.
कितने कारगर हैं ये त्वरित कोर्ट
केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय की ओर से लोकसभा में दी गयी जानकारी के अनुसार, सामान्य अदालतों की तुलना में इन विशेष अदालतों में मुकदमों के निपटारे की रफ्तार तीन गुना से अधिक है. नियमित अदालतों में जहां औसतन प्रति कोर्ट हर महीने 3.26 मामलों का निपटारा होता है, वहीं फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में यह औसत 9.51 मामले प्रति कोर्ट प्रतिमाह है. लेकिन, किसी भी मामले में नया कानून बना देना और फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित कर देना ही काफी नहीं. इसे पूरी तरह कारगर बनाने के लिए जांच प्रक्रिया, डिजिटल साक्ष्यों का संरक्षण और सरकारी विभागों की जवाबदेही का पारदर्शी होना जरूरी है.
- 2006 के रेलवे पेपर लीक मामले में 2012 से 2026 के बीच कोर्ट में 142 से अधिक बार सुनवाई हुई. लेकिन मामले कानूनी पेंच में उलझे रहे.
- 2015-2016 के कई बड़े भर्ती घोटालों, जैसे यूपीपीएससी या व्यापम के कुछ मामलों में सबूतों के अभाव में क्लोजर रिपोर्ट फाइल की गयी, जिससे कई मामलों में आरोपियों को क्लीन चिट मिल गयी या ट्रायल अभी भी जारी है.
जमीनी चुनौतियां और रुकावटें
दोषियों को जल्द सजा मिल सके और लोगों का भरोसा बहाल हो सके, इसके लिए विशेष/फास्ट-ट्रैक अदालतें बनायी गयीं. लेकिन, जब तक पर्याप्त जज, समर्पित जांच एजेंसियां और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं होगा, तब तक मामलों का निपटारा तेजी से होना मुश्किल है. केवल मामलों को तेजी से निपटाने की होड़ में न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. पॉक्सो एक्ट, एनडीपीएस (ड्रग्स) एक्ट और अन्य गंभीर अपराधों के लिए पहले भी फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाये गये थे, लेकिन व्यावहारिक रूप से वे पूरी तरह सफल साबित नहीं हो सके.
जजों की कमी और केसों का अंबार
नये आपराधिक कानूनों में भी 3 साल के भीतर न्याय देने का प्रावधान किया गया है. लेकिन, जमीनी सच्चाई यह है कि न्यायाधीशों की कमी के चलते निचली और जिला अदालतों में ही सबसे ज्यादा मामले पेंडिंग हैं. संसद में 23 जुलाई, 2026 को पेश किये गये आंकड़ों के अनुसार, फास्ट ट्रैक कोर्ट्स ने पिछले 3 वर्षों (2023, 2024 और 2025) के दौरान 40,26,982 मामलों का निपटारा किया है. विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट्स ने पिछले 3 वर्षों के दौरान 2,28,414 मामलों में फैसले सुनाये.
अप्रैल, 2026 तक 775 फास्ट-ट्रैक विशेष अदालतों-जिनमें पॉक्सो अधिनियम के तहत मामलों से निपटने के लिए स्थापित 398 विशेष अदालतें शामिल हैं, में 2,49,000 से अधिक मामले लंबित हैं- राज्यसभा में दी गयी जानकारी के अनुसार इस वर्ष 17 जुलाई तक भारत के जिला न्यायालयों में स्वीकृत न्यायिक पदों में से लगभग एक-चौथाई यानी 7310 पद रिक्त हैं. देश के जिला न्यायपालिका में न्यायाधीशों की कुल स्वीकृत संख्या 30,868 है, जबकि कुल कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या 23,558 है.
केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल के अनुसार बिहार में 2032 स्वीकृत पदों संख्या के मुकाबले 1658 न्यायाधीश हैं और 374 पद रिक्त हैं. वहीं, झारखंड में 710 पदों की स्वीकृत संख्या के मुकाबले 498 न्यायाधीश हैं और 212 पद रिक्त हैं.
पेपर लीक मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट
दिल्ली हाइकोर्ट ने पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए राउज एवेन्यू कोर्ट कॉम्प्लेक्स में इस मामले का पहला विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित कर दिया है. लेकिन, इस मामले में न्याय प्रणाली में तेजी के साथ परीक्षा प्रणाली में पूर्ण पारदर्शिता और तकनीकी सुधारों की दरकार है.
शुरुआत से अब तक
2000
केंद्र सरकार ने 11वें वित्त आयोग की सिफारिशों पर साल 2000 में पहली बार देश में लंबित पड़े लाखों मामलों के त्वरित निपटारे के लिए 1734 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने का प्रस्ताव रखा.
2001
देश के विभिन्न राज्यों में 1 अप्रैल, 2001 से फास्ट ट्रैक कोर्ट ने आधिकारिक तौर पर काम करना शुरू किया.
2005
11वें वित्त आयोग का कार्यकाल समाप्त होने के बाद योजना की सफलता को देखते हुए केंद्र सरकार ने इसे 31 मार्च, 2011 तक के लिए बढ़ा दिया.
2011
केंद्र सरकार की ओर से संचालित फास्ट ट्रैक कोर्ट योजना 31 मार्च, 2011 को समाप्त हो गयी. केंद्र ने इसके लिए वित्तीय सहायता देना बंद कर दिया. लेकिन, केंद्र की फंडिंग बंद होने के बाद कई राज्यों ने अपने संसाधनों से इन अदालतों को जारी रखा, जबकि कुछ राज्यों में इन्हें बंद करना पड़ा.
2012
निर्भया केस के बाद देश भर में महिलाओं की सुरक्षा और त्वरित न्याय की मांग के साथ ही विशेष अदालतों की मांग ने भी जोर पकड़ा. जस्टिस वर्मा समिति ने महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों की सुनवाई जल्द से जल्द पूरी करने के लिए विशेष रूप से फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने की सिफारिश की.
2013
14वें वित्त आयोग ने राज्यों को सलाह दी कि वे गंभीर अपराधों और महिलाओं. बच्चों व वरिष्ठ नागरिकों के मुकदमों की जल्द सुनवाई के लिए कम से कम 1800 फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करें.
2015
वित्त आयोग ने राज्यों को राजस्व का अधिक हिस्सा देना शुरू किया, जिससे राज्यों को अपने स्तर पर फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के लिए फंड जुटाने के निर्देश दिये गये.
2019
अक्तूबर 2019 में केंद्र सरकार ने दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज लंबित मामलों का तुरंत निपटारा करने के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत की. इसमें देशभर में 1023 विशेष अदालतें, जिनमें 389 पॉक्सो विशेष अदालते भी शामिल है. स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया.
2021
केंद्र ने शेष फास्ट ट्रैक कोर्ट योजना को मार्च 2023 तक जारी रखने की मंजूरी दी.
2023
केंद्र सरकार ने फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय योजना को 31 मार्च, 2026 तक विस्तार दिया, जिसके लिए 1952.23 करोड़ रुपये, जिसमें निर्भया फंड का हिस्सा भी शामिल है, का बजट आवंटित किया गया.
2026
इस योजना को दो बार विस्तारित किया जा चुका है. अंतिम विस्तार 31 मार्च. 2026 तक वैध था. अब इसे अस्थायी रूप से 30 सितंबर, 2026 तक बढ़ा दिया गया है.
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लेखक के बारे में
By आलोक पाठक
आलोक पाठक वर्ष 2019 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अपने पत्रकारिता सफर के दौरान वे खबर मंत्र, गांडीव और नक्षत्र न्यूज़ जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं। वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। हिंदी भाषा और लेखन के प्रति उनका विशेष लगाव है। उन्हें भू-राजनीति (Geopolitics) और राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विषयों पर लिखना पसंद है। निजी जीवन में कहानियां और कविताएं लिखना तथा कालजयी साहित्य का अध्ययन उनकी प्रमुख रुचियों में शामिल है। उनका प्रयास तथ्यों पर आधारित, सरल और प्रभावी लेखन के माध्यम से पाठकों तक सार्थक जानकारी पहुंचाना है।
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