Places of Worship Act: आज सुप्रीम कोर्ट में होगी प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट पर सुनवाई, जानिए क्यों दी जा रही है एक्ट को चुनौती

Published by : Pritish Sahay Updated At : 12 Dec 2024 7:59 AM

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Places of Worship Act

Places of Worship Act: सुप्रीम कोर्ट में आज यानी 12 दिसंबर को बड़ी सुनवाई है. गुरुवार को 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट पर सुनवाई होगी. विभिन्न याचिकाओं में 1991 के इस कानून को अन्यायपूर्ण बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है.

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Places of Worship Act: प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 (Places of Worship Act) अधिनियम को लेकर आज (12 दिसंबर) को सुप्रीम कोर्ट में बड़ी सुनवाई है. इस एक्ट की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ सुनवाई करेगी. याचिकाओं में 1991 के इस कानून को अन्यायपूर्ण बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है. इन याचिकाओं के जरिये हिंदू पक्ष ने प्राचीन मस्जिदों के सर्वेक्षण की मांग को लेकर याचिकाएं दायर की गई हैं. याचिकाओं में दावा किया गया है कि कई पुरानी मस्जिदें मंदिरों को तोड़कर बनाई गई हैं.

क्या है प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट

1991 का प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के मुताबिक देश में किसी भी धार्मिक स्थल की जो स्थिति 15 अगस्त 1947 को जैसे थी वो वैसी ही रहेगी. उसे बदला नहीं जा जाएगा. अब इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया गया है. इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाएं में कहा गया है कि यह कानून अधिकार मांगने से वंचित करने वाला है.

प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के मुख्य प्रावधान

प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के मुख्य प्रावधान में कहा गया है कि किसी धार्मिक स्थल को पूरी तरह या आंशिक रूप से किसी दूसरे संप्रदाय की धार्मिक स्थल नहीं बदला जा सकता है. हालांकि प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थलों को इस एक्ट से बाहर रखा गया है.

CPI(M) ने किया सुप्रीम कोर्ट का रुख

प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट को लेकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. CPI(M) ने सुप्रीम कोर्ट में इस एक्ट बने रहने की गुहार लगाई है. CPI(M)ने कहा है कि धर्मनिरपेक्ष ढांचे को बनाए रखने के लिए यह एक्ट बहुत जरूरी है. वहीं, सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय, बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी समेत कई लोगों की याचिकाएं सालों से लंबित हैं. वहीं इस एक्ट का जमीयत उलेमा ए हिंद समेत कई और संगठनों ने समर्थन किया है.

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By Pritish Sahay

प्रीतीश सहाय, इन्हें इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया इंडस्ट्री में 12 वर्षों से अधिक का अनुभव है. ये वर्तमान में प्रभात खबर डॉट कॉम के साथ डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं. मीडिया जगत में अपने अनुभव के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण विषयों पर काम किया है और डिजिटल पत्रकारिता की बदलती दुनिया के साथ खुद को लगातार अपडेट रखा है. इनकी शिक्षा-दीक्षा झारखंड की राजधानी रांची में हुई है. संत जेवियर कॉलेज से ग्रेजुएट होने के बाद रांची यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की. इसके बाद लगातार मीडिया संस्थान से जुड़े रहे हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत जी न्यूज से की थी. इसके बाद आजाद न्यूज, ईटीवी बिहार-झारखंड और न्यूज 11 में काम किया. साल 2018 से प्रभात खबर के साथ जुड़कर काम कर रहे हैं. प्रीतीश सहाय की रुचि मुख्य रूप से राजनीतिक खबरों, नेशनल और इंटरनेशनल इश्यू, स्पेस, साइंस और मौसम जैसे विषयों में रही है. समसामयिक घटनाओं को समझकर उसे सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की इनकी हमेशा कोशिश रहती है. वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़े मुद्दों पर लगातार लेखन करते रहे हैं. इसके साथ ही विज्ञान और अंतरिक्ष से जुड़े विषयों पर भी लिखते हैं. डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में काम करते हुए उन्होंने कंटेंट प्लानिंग, न्यूज प्रोडक्शन, ट्रेंडिंग टॉपिक्स जैसे कई क्षेत्रों में काम किया है. तेजी से बदलते डिजिटल दौर में खबरों को सटीक, विश्वसनीय और आकर्षक तरीके से प्रस्तुत करना पत्रकारों के लिए चुनौती भी है और पेशा भी, इनकी कोशिश इन दोनों में तालमेल बनाते हुए बेहतर और सही आलेख प्रस्तुत करना है. वे सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जरूरतों को समझते हुए कंटेंट तैयार करते हैं, जिससे पाठकों तक खबरें प्रभावी ढंग से पहुंच सकें. इंटरनेशनल विषयों में रुचि होने कारण देशों के आपसी संबंध, वार अफेयर जैसे मुद्दों पर लिखना पसंद है. इनकी लेखन शैली तथ्यों पर आधारित होने के साथ-साथ पाठकों को विषय की गहराई तक ले जाने का प्रयास करती है. वे हमेशा ऐसी खबरों और विषयों को प्राथमिकता देते हैं जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लिहाज से महत्वपूर्ण हों. रूस यूक्रेन युद्ध, मिडिल ईस्ट संकट जैसे विषयों से लेकर देश की राजनीतिक हालात और चुनाव के दौरान अलग-अलग तरह से खबरों को पेश करते आए हैं.

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