चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सली’ ट्वीट पर बवाल, नक्सल पीड़ित बोले- हम दिमाग से भी नक्सवाद निकालेंगे

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चिदंबरम के बयान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते नक्सल पीड़ित, फोटो ANI

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ संबंधी बयान को लेकर बस्तर के नक्सल हिंसा पीड़ितों ने विरोध जताया है. ‘बस्तर शांति समिति’ के बैनर तले छत्तीसगढ़ के बस्तर और कांकेर से दिल्ली पहुंचे लोगों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चिदंबरम के बयान पर आपत्ति जताई. इस दौरान नक्सली हिंसा में अपने परिजनों को खोने और खुद घायल होने वाले लोगों ने अपनी आपबीती भी सुनायी.

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कांकेर के कामेश्वर कुमार सिन्हा ने कहा कि चिदंबरम के एक्स अकाउंट से यह बयान सामने आया कि वह ‘दिमागी नक्सलियों’ के साथ खड़े हैं और उन्हें उन पर गर्व है. उन्होंने कहा, “मुझे यह देखकर बहुत दुख हुआ. एक बार बस्तर आकर देखिए. यहां लोग बयानबाजी नहीं कर रहे हैं, बल्कि नक्सली हिंसा से प्रभावित लोगों और जवानों के साथ खड़े हैं.” कामेश्वर ने बताया कि नक्सलियों द्वारा किए गए आईईडी धमाके में उन्होंने अपने पिता को खो दिया. उन्होंने कहा कि देश की राजधानी दिल्ली से इस तरह के बयान आना नक्सल हिंसा के पीड़ितों के जख्मों को और गहरा करता है. इसी वजह से उन्होंने दिल्ली आकर चिदंबरम के बयान पर सवाल उठाने का फैसला किया.

पति को खो चुकीं आरती ने भी जताया विरोध

बस्तर के कांकेर की रहने वाली आरती ने कहा कि उनके पति सुरक्षा बल में एसटीएफ के जवान थे और सुकमा में नक्सलियों के घात लगाकर किए गए हमले में उनकी मौत हो गयी. उन्होंने कहा कि बस्तर में उनके जैसी कई महिलाएं हैं, जिन्होंने नक्सली हिंसा में अपने पति खोये हैं. आरती ने कहा, “हम सोशल मीडिया पर पी चिदंबरम के उस बयान का विरोध कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने ‘दिमागी नक्सलियों’ के समर्थन की बात कही है. आज बस्तर नक्सल-मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. हम नहीं चाहते कि जो कुछ पहले हुआ, वह दोबारा हो.”

‘बस्तर को फिर उसी नर्क में नहीं धकेलना चाहिए’

कांकेर निवासी तरुण कुमार ने कहा कि बस्तर करीब चार दशक तक नक्सली हिंसा की आग में जलता रहा. एक नक्सली हमले में उन्होंने अपना पैर खो दिया और उनकी रीढ़ की हड्डी भी टूट गयी. उन्होंने कहा कि बस्तर में शांति कायम करने के लिए हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई है. अब जब क्षेत्र विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है, तो उसे फिर हिंसा के दौर में नहीं धकेला जाना चाहिए. तरुण ने कहा, “क्या बस्तर को तरक्की नहीं करनी चाहिए? बिल्कुल करनी चाहिए. ऐसे बयानों से बस्तर फिर 40 साल पीछे चला जाएगा, जहां हिंसा और गोलीबारी होगी और जवान अपनी जान गंवाएंगे.” तरुण ने बताया कि उनके साथ 9 अक्टूबर 2022 को नक्सली हिंसा की घटना हुई थी और अब करीब चार साल होने को हैं. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग नक्सली हिंसा के शिकार हुए हैं. ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि राजनीतिक नेता पीड़ितों के साथ खड़े होंगे.

‘ऐसे बयान नहीं दिए जाने चाहिए’

नक्सलवाद से प्रभावित सियाराम ने भी चिदंबरम के बयान पर नाराजगी जतायी. उन्होंने कहा कि बस्तर अब शांति और विकास की ओर बढ़ रहा है, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ जैसे बयान पीड़ित लोगों को दुख पहुंचाते हैं. उन्होंने कहा, “उन्हें हमारे साथ खड़ा होना चाहिए था, लेकिन वे उनके समर्थन में बोल रहे हैं. हमें यह पसंद नहीं है। ऐसे बयान नहीं दिए जाने चाहिए.”

चिदंबरम ने ‘दिमागी नक्सल’ को बताया था नया राजनीतिक अपशब्द

दरअसल, पी चिदंबरम ने ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर सोशल मीडिया पर टिप्पणी की थी. उन्होंने इसे बीजेपी की ओर से पहले इस्तेमाल किए गए ‘अर्बन नक्सल’, ‘आंदोलनजीवी’ और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ जैसे शब्दों का नया रूप बताया था. चिदंबरम ने सवाल उठाया था कि ‘अर्बन नक्सल’, ‘आंदोलनजीवी’ और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ जैसे शब्द आखिर किसके लिए इस्तेमाल किए जाते थे. उन्होंने कहा था कि ये शब्द विपक्ष के सदस्यों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले अपशब्द थे और ‘दिमागी नक्सल’ भी उसी तरह का नया राजनीतिक अपशब्द है.


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अरबिंद कुमार मिश्रा

लेखक के बारे में

By अरबिंद कुमार मिश्रा

अरबिंद कुमार मिश्रा मुख्यधारा की पत्रकारिता में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वर्तमान में, वह प्रभात खबर डॉट कॉम (Prabhat Khabar) में सीनियर कंटेंट राइटर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. अरबिंद नेशनल, इंटरनेशनल और स्पोर्ट्स कैटेगरी में अपनी लेखनी के लिए जाने जाते हैं. गहरी रिसर्च पर आधारित स्पेशल स्टोरीज, रिपोर्टिंग और जटिल मुद्दों पर आसान भाषा में 'एक्सप्लेनर' लिखना उनकी मुख्य यूएसपी (USP) है.

झारखंड की समृद्ध संस्कृति और लोक परंपराओं में उनकी गहरी रुचि है. अपनी उत्कृष्ट और सरोकार से जुड़ी रिपोर्टिंग के लिए उन्हें संस्थान स्तर पर कई बार सम्मानित और पुरस्कृत भी किया जा चुका है.

करियर का सफरनामा

अरबिंद ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत देश की प्रतिष्ठित बहुभाषी न्यूज एजेंसी 'हिंदुस्थान समाचार' से बतौर रिपोर्टर की थी. इसके बाद उन्होंने प्रसार भारती के अंग दूरदर्शन और आकाशवाणी के साथ भी काम किया, जहां उन्होंने एंकरिंग, वॉइस-ओवर और रिपोर्टिंग के गुर सीखे. साल 2011 में वह 'प्रभात खबर डॉट कॉम' से जुड़े और तब से लगातार डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.

प्रमुख उपलब्धियां और ग्राउंड रिपोर्टिंग

खेल पत्रकारिता और जमीनी रिपोर्टिंग में अरबिंद का योगदान उल्लेखनीय रहा है. उनकी कुछ सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल हैं:

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शैक्षणिक योग्यता (Education & Credentials)

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बैचलर ऑफ जर्नलिज्म (BJMC): रांची विश्वविद्यालय से साल 2011 में पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल की.

एम.ए. (नागपुरी भाषा): रांची विश्वविद्यालय के 'जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग' से साल 2009 में नागपुरी भाषा में स्नातकोत्तर (MA) की डिग्री हासिल की.

लेखन शैली और विशेषज्ञता: एक्सप्लेनर, रिसर्च बेस्ड स्टोरीज, स्पोर्ट्स जर्नलिज्म, इंटरनेशनल अफेयर्स और झारखंड की लोक-संस्कृति.

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