ईवीएम पर वार और मोदी से तकरार: ये हैं एमसीडी में ''केजरी'' के हार के पांच कारण

नयी दिल्ली : दो साल पहले अरविंद केजरीवाल की जिस आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में ऐतिहासिक और अभूतपूर्व जीत दर्ज की थी उसी पार्टी को अब लगातार मुंह की खानी पड़ रही है. कांग्रेस और भाजपा का सूपड़ा साफ करने वाली केजरीवाल की पार्टी में आखिर 2 साल में ऐसा क्या हो गया कि […]
नयी दिल्ली : दो साल पहले अरविंद केजरीवाल की जिस आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में ऐतिहासिक और अभूतपूर्व जीत दर्ज की थी उसी पार्टी को अब लगातार मुंह की खानी पड़ रही है. कांग्रेस और भाजपा का सूपड़ा साफ करने वाली केजरीवाल की पार्टी में आखिर 2 साल में ऐसा क्या हो गया कि खुद उसका ही सफाया हो गया. हाल में पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को जनता ने नकार दिया था. अब पार्टी के गढ़ माने जा रहे दिल्ली में एमसीडी चुनाव में आप की शिकस्त को अरविंद केजरीवाल के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.
जानकारों की माने तो एमसीडी चुनावों में मोटे तौर पर आम आदमी पार्टी की हार के पांच प्रमुख कारण हैं…
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1. मोदी का विरोध करना
दिल्ली के अंदर साल 2013 से ही आम लोगों की भावना साफ नजर आ रही थी ‘दिल्ली में केजरीवाल, देश में मोदी’ यानी दिल्ली के लोगों के मन में था कि मुख्यमंत्री केजरीवाल हों, और प्रधानमंत्री का पद मोदी संभालें. ये भावना सच हुई और 2014 में मोदी प्रधानमंत्री बनें और 2015 में केजरीवाल ने प्रचंड बहुमत से मुख्यमंत्री का पद संभाला. सीएम का पद संभालने के बाद से लेकर पंजाब में चुनाव हारने तक के दो साल में केजरीवाल ने मोदी पर एक के बाद एक हमले किये. हमले राजनीतिक के अलावा निजी भी होते चले गये जिसके कारण दिल्ली के लोगों के मन में अरविंद केजरीवाल की छवि मोदी विरोधी की बन गयी जो दिल्ली के लोगों को पसंद नहीं आयी.
2. उपराज्यपाल से पंगा
आम आदमी पार्टी के दिल्ली की सत्ता में लौटने के 3 महीने बाद से ही मई 2015 से जो उपराज्यपाल और केंद्र सरकार के साथ केजरीवाल सरकार की तनातनी और लड़ाई शुरू हुई उसने अरविंद केजरीवाल की छवि लड़ाकू की हो गयी थी. आये दिन केंद्र सरकार और उपराज्यपाल पर हमले करना और बात बात पर दोषारोपण करना आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़ जनता को ले गया.
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3. पंजाब चुनाव शिकस्त
पंजाब चुनाव में पार्टी जहां अपनी जीत पक्की मान रही थी वहां वो मुख्य विपक्षी दल से आगे नही बढ़ सकी. यही नहीं वोट शेयर के मामले में आप पार्टी तीसरे नंबर पर रही. इस नतीजे ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया. शायद यही कारण रहा कि नगर निगम चुनाव के लिए वे अपनी पूरी ताकत नहीं लगा सके.
4. ईवीएम पर वार
अरविंद केजरीवाल ने ईवीएम पर तो सवाल उठाया ही साथ ही चुनाव आयोग पर भी भाजपा के लिए काम करने का आरोप लगाया. इससे भी पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा और जनता का समर्थन पार्टी को नहीं मिला. जनता के बीच यह संदेश गया कि जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीट जीती तब तो अरविंद केजरीवाल ने कुछ नहीं कहा लेकिन जब वो पंजाब हारे और यूपी में भाजपा ने 403 में से ऐतिहासिक 325 सीट जीती तब ईवीएम से छेड़छाड़ पर ठीकरा फोड़ दिया.
5. पैसों की कमी और कमज़ोर रणनीति
आम आदमी पार्टी इन चुनावों में पैसों की तंगी से जूझती रही है. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शहर में होर्डिंग के मामले में भाजपा आगे रही, दूसरे नंबर पर कांग्रेस और सबसे कम होर्डिंग आम आदमी पार्टी के नजर आए. रेडियो पर हमेशा से जमकर प्रचार करने वाले आप ने रेडियो पर प्रचार के आखिरी दिन जाकर एक विज्ञापन दिया. पार्टी प्रचार कार्य में कमज़ोर रहा.
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