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हिंदुत्व के बारे में 1995 के फैसले पर पुनर्विचार नहीं करेगा सुप्रीम कोर्ट

Updated at : 25 Oct 2016 9:47 PM (IST)
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हिंदुत्व के बारे में 1995 के फैसले पर पुनर्विचार नहीं करेगा सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने अपने उस प्रसिद्ध फैसले पर पुनर्विचार करने से आज इंकार कर दिया जिसमें कहा गया था कि हिंदुत्व एक ‘जीवनशैली’ है. शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया कि वह ‘महती चर्चा’ में नहीं पड़ेगी क्योंकि मुद्दे का पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा भेजे गए रेफरेंस में उल्लेख नहीं किया […]

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नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने अपने उस प्रसिद्ध फैसले पर पुनर्विचार करने से आज इंकार कर दिया जिसमें कहा गया था कि हिंदुत्व एक ‘जीवनशैली’ है. शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया कि वह ‘महती चर्चा’ में नहीं पड़ेगी क्योंकि मुद्दे का पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा भेजे गए रेफरेंस में उल्लेख नहीं किया गया.

प्रधान न्यायाधीश टी एस ठाकुर की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा, ‘‘हम महती चर्चा में नहीं जाएंगे कि ‘हिंदुत्व’ क्या है या इसका क्या मतलब है. हम 1995 के फैसले पर पुनर्विचार नहीं करेंगे और इस चरण में ‘हिंदुत्व’ या धर्म का भी परीक्षण नहीं करेंगे.” अदालत जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 (3) के दायरे का परीक्षण कर रही है जो चुनावी कदाचार जो ‘भ्रष्ट आचरण’ की श्रेणी में आता है, समेत अन्य बातों से जुड़ा हुआ है. अदालत को यह मामला पांच न्यायाधीशों की पीठ ने भेजा था.

प्रावधान में कहा गया है, ‘किसी उम्मीदवार या उसके एजेंट या उम्मीदवार की सहमति से किसी अन्य व्यक्ति या उसके चुनावी एजेंट द्वारा किसी व्यक्ति को उसके धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट करने या नहीं करने की अपील करना या धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल या राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल उस उम्मीदवार की चुनावी संभावनाओं को बढ़ाने या किसी अन्य उम्मीदवार की चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने के लिए करना भ्रष्ट आचरण के दायरे में आएगा.”

रेफरेंस पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा, ‘‘इस चरण में हम रेफरेंस में हमारे समक्ष उठाए गए मुद्दे तक खुद को सीमित रखेंगे. रेफरेंस में ‘हिंदुत्व’ शब्द का इस्तेमाल नहीं है.” पीठ ने कहा, ‘‘अगर कोई व्यक्ति दर्शाएगा कि ‘हिंदुत्व’ शब्द का उल्लेख है, तो हम उसे सुनेंगे। हम फिलहाल ‘हिंदुत्व’ मामले में नहीं जाएंगे.” पीठ में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए के गोयल, न्यायमूर्ति यू यू ललित, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव भी शामिल हैं.

यह टिप्पणी तब की गई जब किन्हीं ओ पी गुप्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता के के वेणुगोपाल ने कहा कि अगर पीठ हिंदुत्व और धर्म के आधार पर वोट मांगने के सवाल पर सुनवाई करने जा रही है, तो उनकी बात सुनी जानी चाहिए.

सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड ने इससे पहले मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की थी. उन्होंने एक आवेदन देकर कहा था कि धर्म और राजनीति को नहीं मिलाया जाना चाहिए और राजनीति से धर्म को अलग करने के लिए एक निर्देश पारित किया जाना चाहिए.

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