राजनीति में ठगी या ठगी की राजनीति
Updated at : 22 Jun 2015 12:08 PM (IST)
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– हरिवंश – आज की राजनीति के लिए ‘इररिसपांसिबिल’ (गैरजिम्मेदार) होना प्राथमिक योग्यता है. सबसे जरूरी. कुछ भी कह दो, बक दो, बयान दे दो, बोल दो. न जीभ पर लगाम, न क्या कह रहे हैं, इसकी समझ? फिर इसकी कीमत चुकाता है, मुल्क. ऐसे ही गैरजिम्मेदार लोग देश को इस हाल में पहुंचा चुके […]
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– हरिवंश –
आज की राजनीति के लिए ‘इररिसपांसिबिल’ (गैरजिम्मेदार) होना प्राथमिक योग्यता है. सबसे जरूरी. कुछ भी कह दो, बक दो, बयान दे दो, बोल दो. न जीभ पर लगाम, न क्या कह रहे हैं, इसकी समझ? फिर इसकी कीमत चुकाता है, मुल्क. ऐसे ही गैरजिम्मेदार लोग देश को इस हाल में पहुंचा चुके हैं.
उत्तर प्रदेश कभी राजनीति में नये प्रतिमानों को गढ़ने का राज्य था. देश की अगुआई करनेवाला. पंडित जवाहरलाल नेहरू, आचार्य नरेंद्र देव, डॉ राममनोहर लोहिया, गोविंदवल्लभ पंत, लालबहादुर शास्त्री वगैरह की पीढ़ी को छोड़ दें, तब भी अनेक लोग थे. चंद्रभान गुप्त कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे थे. मुख्यमंत्री भी. खादी की गंजी और हाफ पैंट पहने जीवन गुजारनेवाले. जो भी चंदा इक्का किया. पाई-रत्ती का हिसाब दिया. चौधरी चरण सिंह थे.
अपनी मान्यताओं और मूल्यों के प्रति ढ़ृढ़. उत्तर प्रदेश में वह संविद सरकार के अगुआ थे. मुख्यमंत्री. केंद्र में इंदिरा जी प्रधानमंत्री थीं. इंदिरा जी का बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आने का कार्यक्रम बना. कुछ छात्र संगठनों ने विरोध किया. चरण सिंह ने कहा कि (हालांकि वह विपक्ष में थे) वह हमारे देश की प्रधानमंत्री हैं. मुख्यमंत्री के रूप में प्रधानमंत्री की अगुआई तथा स्वागत मुझे करना है. कहीं भी प्रधानमंत्री का विरोध या अपमान नहीं करेंगे, न होने देंगे. बनारस में गोली चली. पूरा उत्तर प्रदेश सुलग गया. छात्र आंदोलन से. पर चरण सिंह नहीं डिगे. उत्तर प्रदेश के ही एक मुख्यमंत्री टी एन सिंह थे. लालबहादुर शास्त्री के सहपाठी और मित्र. मुख्यमंत्री के रूप में उपचुनाव लड़े. कहा, खुद वोट मांगने के लिए नहीं जायेंगे. न ही प्रचार करेंगे. वह लखनऊ से डिगे नहीं.
चुनाव हार गये. तब कांग्रेस में मूल्यों वाले राजनेता जीवित थे. सिद्धांत और आदर्शवाले नेता. चंद्रशेखर कभी किसी गांव में वोट मांगने नहीं गये. सार्वजनिक मीटिंग करते. देश, दुनिया और क्षेत्र के सामूहिक विकास की बात करते. एक भी वैसी बात नहीं करते, जो न कर सकें. झूठ बोल कर, छल करके, स्वप्न दिखा कर वोट नहीं मांगते. तब कथनी और करनी के एका व्याकरण से राजनीति चलती थी. इसी राज्य से किदवई साहब केंद्र में मंत्री थे. आजीवन. स्वतंत्रता सेनानी भी. जब वह नहीं रहे, तो परिवार गांव लौटा. अपने फू स और खपरैल के घर में. ऐसे ईमानदार नेताओं का प्रदेश रहा है, उत्तर प्रदेश.
आज उत्तर प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं. राजनीतिक दलों और नेताओं ने क्या-क्या घोषणाएं की हैं? जान लीजिए. इससे स्पष्ट होगा कि राजनीति में ठगी हो रही है. या राजनीति ठगों के हाथों में चली गयी है. हम क्या बोल रहे हैं? क्या जनता से वादा कर रहे हैं? और क्या कर रहे हैं? इन बातों का आपस में कोई संबंध नहीं है. क्या एक गैरजिम्मेदार ढंग से बात करनेवाला व्यक्ति, जिम्मेवार नेता बन सकता है? वह राज्य या देश का भविष्य संवार सकता है?
उत्तर प्रदेश के नेताओं ने क्या वायदे किये हैं. सिर्फ मुख्य घोषणाओं पर ही गौर करें.
1. कमजोर वर्ग के सभी लोगों को मुफ्त घर.
2. कृषि ॠणों की माफी.
3. मुसलिम लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा.
4. सिंचाई के लिए मुफ्त बिजली और पानी.
5. हर परिवार के लिए एक गाय.
6. समाजवादी पार्टी और बहुजन समानवादी पार्टी ने कक्षा दसवीं और बारहवीं के सभी विद्यार्थियों को लैपटाप और टेबलेट पीसी देने का वचन दिया है. ऐसे अनेक वायदे हैं.
अब उत्तर प्रदेश की माली हालत (आर्थिक स्थिति) जान लीजिए. वर्ष 2011-12 का बजट आधार मानें (वित्तमंत्री लालजी वर्मा द्वारा प्रस्तुत), तो उत्तर प्रदेश में राजकोषीय घाटा है, 18,959,04 करोड़. यह राज्य की जीडीपी का तीन फीसदी है. राज्य पर कुल दो लाख करोड़ का कर्ज है. राज्य में राजस्व आमद इतनी भी नहीं है कि राजस्व खर्चें पूरा हो सकें. हर काम के लिए कर्ज लेना पड़ता है. यहां तक की समय से तनख्वाह देने के लिए भी कर्ज लेना पड़ता है.
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, देश का सबसे बड़ा बोर्ड है. यह हर साल दसवीं (मैट्रिक) के 36.82 लाख बच्चों की परीक्षा लेता है. बारहवीं (इंटर) के 26.36 लाख विद्यार्थियों की. अगर गुजरे वर्ष का यह आंकड़ा सही मान लिया जाये, तो 70 फीसदी (लगभग 25 लाख) छात्र दसवीं तथा 80 फीसदी (लगभग 21 लाख) बच्चे बारहवीं पास करेंगे.
भारत सरकार के मानव संसाधन विभाग मंत्रालय ने जो सबसे सस्ता टेबलेट पीसी (आकाश) चुना है, उसकी कीमत है 2500 रुपये. इस तरह दसवीं पास करने वाले हर छात्र को टेबलेट देने के लिए प्रतिवर्ष 625 करोड़ रुपये चाहिए. लैपटाप की न्यूनतम कीमत 15000 रुपये है.
21 लाख बारहवीं पास छात्रों को लैपटाप देने के लिए 3150 करोड़ रुपये चाहिए. इस तरह सरकार को लैपटाप और टेबलेट पीसी देने में 3775 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे. हर साल. पांच वर्षों तक. राज्य माध्यमिक शिक्षा का बजट 6886 करोड़ रुपये है. इसका 60 फीसदी (लगभग 4107 करोड़ रुपये) हिस्सा कर्मचारी-अध्यापकों के वेतन में जाता है. बचा लगभग 2739 करोड़ रुपये. इस पैसे का इस्तेमाल स्कूल भवन बनाने या अन्य विकास कार्यों के लिए होता है. अब सवाल होता है कि टेबलेट पीसी और लैपटाप देने के पैसे आयेगें कहां से?
मुलायम सिंह से पूछा गया, तो वह बोले. उसी तरह, जैसे मायावती जी ने पार्कों और मूर्तियों के निर्माण के लिए धन जुटाया. मायावती ने दलित नेताओं की मूर्तियां और पार्क बनाने में 3000 करोड़ खर्च किये. लेकिन यह एक बार खर्च था. एकमुश्त. हर साल होनेवाला खर्च नहीं. 2011-12 के बजट में उत्तर प्रदेश सरकार ने इन पार्कों वगैरह की देखभाल के लिए 122 करोड़ का प्रावधान किया है. इस तरह समाजवादी पार्टी के इस एक चुनावी वायदे से हर वर्ष राज्य पर 3000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. एक तो राज्य खुद ही कंगाल है. ऊपर से दो लाख करोड़ का कर्ज. जबरदस्त वित्तीय घाटा अलग है. उसके बावजूद यह आश्वासन.
इतना ही नहीं समाजवादी पार्टी ने किसानों को कहा है कि 50 हजार तक का ॠण माफ. बीजेपी का वादा है कि हर किसान को एक लाख तक का ॠण माफ. बीजेपी और आगे बढ़ गयी. एक फीसदी सूद की दर पर वह किसानों को ॠण देने का वचन दे चुकी है. बीजेपी ने छोटे और हाशिए के किसानों के लिए मुफ्त बिजली का वादा किया है.
समाजवादी पार्टी ने कहा है, सरकारी नलकूपों से मुफ्त सिंचाई होगी. ॠण माफी को लेकर कितने हजार करोड़ की जरूरत पड़ेगी, उसका अनुमान लगाना कठिन है. मुफ्त बिजली पर लगभग 20000 करोड़ का खर्च आयेगा. बीजेपी ने कहा है कि हर एक को एक गाय (बीपीएल से नीचे रहनेवाले एक करोड़ लोगों के लिए). इस पर भी 10000 करोड़ का खर्च आयेगा. एक मोटे अनुमान के अनुसार बीजेपी, समाजवादी पाटी के वादों की कीमत का अनुमान लगायें, तो यह लगभग 50000 करोड़ होगा.
क्या ये वायदे संभव हैं? आज बंगाल इस हाल में पहुंच गया है कि उसे वेतन के लिए केंद्र से गुहार लगानी पड़ी. क्या सिर्फ सत्ता पाने के लिए किसी भी तरह का झूठ बोला जा सकता है? लोगों को ठगा जा सकता है? देश, समाज या राज्य से खेला जा सकता है? क्या ये राजनेता जानते हैं कि इनकी ऐसी हरकतों से राज्य या देश की अर्थव्यवस्था पर क्या फर्क पड़ेगा? कहां से ये पैसा लायेंगे?
अपने असंभव वायदे जब ये पूरे नहीं कर पायेंगे, तो लोगों को छलेंगे कि केंद्र मदद नहीं कर रहा है. क्या राजनीति में जिम्मेदारी का एहसास रह गया है? राजनीति सबसे गंभीर चीज है. इसी के हाथ में देश, समाज या राज्य का भविष्य है. हर व्यक्ति की तकदीर इसी राजनीति के हाथ में है. इसलिए राजनीति अपनी जिम्मेदारी न समझे, तो आप क्या अर्थ लगायेंगे?
नेताओं को किसी कीमत पर सत्ता चाहिए. सिर्फ अपना घर-परिवार भरने के लिए. अगर राज्य लगातार कर्ज में डूबे या आर्थिक बदहाली आ जाये, तो समाज कैसे खुशहाल होगा? राजनेताओं के आश्वासन (ठगने की कला), देशतोड़क प्रयास है. हर मतदाता को सावधान रहना चाहिए. नेता शायद यह मानते हैं कि जनता भी लोभी हो गयी है. और पुरानी मान्यता है कि लोभियों के गांव में ठग उपवास नहीं रखते. क्या इस भ्रम को तोड़ने के लिए जनता जागेगी?
इस लेख को पूरा करने में द पायनियर में 15.02.12 को छपे लेख ‘देअर इज नो मनी टू कीप प्रामिसेस मेड टू यूपी वोटर्स’: विश्वजीत बनर्जी से काफी मदद मिली.
दिनांक : 26.02.2012
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