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अध्यादेश से महत्वपूर्ण कानूनों में संशोधन का मार्ग गैर लोकतांत्रिक : जयराम

Updated at : 10 May 2015 1:17 PM (IST)
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अध्यादेश से महत्वपूर्ण कानूनों में संशोधन का मार्ग गैर लोकतांत्रिक : जयराम

इंदौर: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने केंद्र सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण जैसे महत्वपूर्ण कानून में अध्यादेश के जरिये संशोधन करने को लोकतंत्र और राष्ट्र हित के खिलाफ बताया और सुझाव दिया कि सरकार को लोगों को विश्वास में लेकर इस मसले का हल निकालना चाहिये. अभ्यास मंडल […]

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इंदौर: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने केंद्र सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण जैसे महत्वपूर्ण कानून में अध्यादेश के जरिये संशोधन करने को लोकतंत्र और राष्ट्र हित के खिलाफ बताया और सुझाव दिया कि सरकार को लोगों को विश्वास में लेकर इस मसले का हल निकालना चाहिये.

अभ्यास मंडल की 56वीं ग्रीष्मकालीन व्याख्यानमाला में कल रात यहां भूमि अधिग्रहण और कानून विषय पर जयराम ने कहा, ‘केंद्र की राजग सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून 2013 जैसे महत्वपूर्ण कानून में अध्यादेश के जरिये जल्दबाजी में संशोधन किये गये हैं. सरकार का यह तानाशाही रवैया लोकतंत्र में चिंताजनक है. हम एक लोकतांत्रिक समाज हैं, इसलिये सरकार को इस मामले में लोगों से बातचीत कर उनकी आशंकाएं हटाकर उन्हें विश्वास में लेकर इसका हल निकालना चाहिये.
उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव करने के लिये अध्यादेश का रास्ता तत्कालीन यूपीए सरकार के पास भी था, लेकिन हमने उसे न अपनाते हुए तत्कालीन विपक्षी दल भाजपा के साथ विचार.विमर्श और सहमति के बाद संसद में इसे पारित कर कानून का रुप दिया.
जयराम ने कहा कि मई 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद इस नए कानून को बिना प्रयोग में लाए इसमें संशोधन की बात शुरु कर दी गयी और दो बार अध्यादेश के जरिये महत्वपूर्ण संशोधन कर जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण का दरवाजा खोल दिया गया.
उन्होंने कहा, ‘सत्ताधारी दल यदि यह समझता है कि बहुमत हमें कुछ भी करने का अधिकार देता है, तो यह सोच लोकतंत्र में चिंता की बात है. भूमि अधिग्रहण कानून में जो संशोधन किये गये हैं उसके नतीजे क्या होगें इस पर गंभीरता से विचार करना जरुरी है.
जयराम रमेश ने कहा कि संशोधन के जरिये निजी कंपनियों को भूमि अधिग्रहण के लिये किसानों की सहमति का प्रावधान हटाने से जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण का दरवाजा खोला गया है. इसके अलावा संशोधन से भूमि अधिग्रहण के सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन के प्रावधान को हटाया गया है. इसका दुष्परिणाम यह होगा कि सरकारें सार्वजनिक उपयोग के नाम पर भूमि अधिग्रहण कर अपनी पसंद की निजी कंपनी को जमीन दे सकती है और मांग से अधिक भूमि का भी अधिग्रहण हो सकता है.
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस कानून में संशोधन कर इसकी मूल भावना से छेड़छाड़ कर रही है. इसकी वजह से देश में हलचल मची है और लोग समझ गये हैं कि किसानों के साथ नाइंसाफी हो रही है. हमारे देश में लोगों के लिये जमीन सामाजिक सुरक्षा का एक संवेदनशील मामला है. उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी उद्योग को जमीन की जरुरत है तो वह खूले बाजार से खरीद सकता है.
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