टीम ''थप्पड़'' ने ''ब्रेकथ्रू'' की पिटिशन का किया समर्थन, महिला हिंसा के दृश्‍यों के लिए हो वैधानिक चेतावनी

By Prabhat Khabar Digital Desk
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- पिटीशन को सवा लाख से अधिक लोगों ने दिया अपना समर्थन

नयी दिल्ली : महिला अधिकारों की बात करने वाली संस्‍था ब्रेकथ्रू द्वारा फिल्मों में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा के लिए वैधानिक चेतावनी जारी करने की मांग को लेकर चलायी जा रही ऑनलाइन पिटीशन को अनुभव सिन्हा निर्देशित और तापसी पन्नू अभिनीत फिल्म थप्पड़ का भी समर्थन मिला है. इस पीटिशन को अभी तक सवा लाख से अधिक लोगों ने अपना समर्थन दिया है.

टीम थप्पड़ ने याचिका के समर्थन में एक वीडियो जारी करते हुए सेंसर बोर्ड से फिल्म में महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के दृश्यों के लिए डिस्क्लेमर देने की मांग की है. वीडियो में तापसी कहती नजर आ रही हैं कि फिल्मों में शराब, सिगरेट और पशु क्रुरता के लिए डिस्क्लेमर तो आता है, लेकिन थप्पड़ के लिए नहीं, शायद थप्पड़ इन सब के सामने छोटी सी बात है, अगर आप को लगता है कि थप्पड़ बड़ी बात है और एल्कोहल और सिगरेट के अलावा डोमेस्टिक वायलेंस का भी डिसक्लेमर आना चाहिए तो प्लीज पीटीशन साइन कीजिए. थप्पड़ बस इतनी सी बात नहीं है.

लोकप्रीय माध्यमों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की इस संस्कृति को बदलने के लिए ब्रेकथ्रू के लिए यह ऑनलाइन पिटीशन माहिका बनर्जी ने शुरू की है जिसमें सूचना और प्रसारण मंत्रालय और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से मांग की गयी है कि फिल्मों में शुरुआत में डिस्क्लेमर ‘महिलाओं के ख़िलाफ हिंसा कानूनी अपराध है’ अनिवार्य करने का अनुरोध किया है. यह याचिका Change.org के सहयोग से चलायी जा रही है.

याचिका के संदर्भ में ब्रेकथ्रू की अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सोहिनी भट्टाचार्य का कहना है कि 'मुझे खुशी है कि महिलाओं के साथ ऑन स्क्रीन होने वाली हिंसा के दृश्यों के लिए वैधानिक चेतावनी के लिए शुरू की गयी हमारी पिटीशन को टीम थप्पड़ का समर्थन मिला और उन्होंने इस महत्वपूर्ण मुद्दे को प्रभावी तरीके से उठाया है. हमें उम्मीद है कि आगे आने वाली फिल्मों में जल्दी इस तरह के डिस्ल्केमर हमें दिखेंगे.

उन्होंने कहा कि हमारा विश्वास है कि हम लोकप्रिय संस्कृति और समुदाय-आधारित कार्यों के माध्यम से महिलाओं के खिलाफ हिंसा का संस्कृति में परिवर्तन लाकर महिलाओं के खिलाफ हिंसा को सभी के लिए अस्वीकार बनाने में सफल होंगे, जिससे वो सम्मान, समानता और न्याय के साथ रह सकें.

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