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निर्वाचन प्रणाली में सुधार ही व्यावहारिक उपाय : अश्विनी कुमार

Updated at : 14 Apr 2019 2:50 PM (IST)
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निर्वाचन प्रणाली में सुधार ही व्यावहारिक उपाय : अश्विनी कुमार

नयी दिल्ली : भारतीयों में लोकतंत्र के प्रति संतुष्टि का स्तर तमाम विकसित देशों से ज्यादा है. मगर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गठित सरकार चलाने वाले राजनेताओं के प्रति घटते विश्वास के मामले में भारत, रवांडा से भी पीछे हो गया है. चुनाव महज सत्ता में पहुंचने की तिकड़म बन जाने के मद्देनजर चुनाव प्रक्रिया में […]

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नयी दिल्ली : भारतीयों में लोकतंत्र के प्रति संतुष्टि का स्तर तमाम विकसित देशों से ज्यादा है. मगर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गठित सरकार चलाने वाले राजनेताओं के प्रति घटते विश्वास के मामले में भारत, रवांडा से भी पीछे हो गया है. चुनाव महज सत्ता में पहुंचने की तिकड़म बन जाने के मद्देनजर चुनाव प्रक्रिया में माकूल बदलाव के बारे में चल रही बहस पर पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने कहा कि वैकल्पिक निर्वाचन प्रणाली की बजाय मौजूदा व्यवस्था में सुधार ही व्यावहारिक उपाय है.

एक अध्ययन के मुताबिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था से 79 फीसदी भारतीय संतुष्ट हैं. ब्रिटेन में यह 52 प्रतिशत, अमेरिका में 46 प्रतिशत और स्पेन में 25 प्रतिशत है. वहीं, लोकतांत्रिक पद्धति से निर्वाचित सरकारें चलाने वाले राजनेताओं के प्रति विश्वास के मामले में भारत, रवांडा से नीचे 33वें पायदान पर पहुंच गया है. इसे व्यवस्था की खामी मानते हैं या नेताओं का दोष, इस सवाल के जवाब में अश्विनी कुमार ने कहा, एक बात साफ है कि आजादी के बाद लोकतंत्र में जिस तरह से राजनेताओं की गरिमा बननी चाहिए थी, वह नहीं बन सकी.

उन्होंने कहा कि इसके तमाम कारण हो सकते हैं, लेकिन मुख्य वजह राजनेताओं का आम जन के प्रति समर्पित होने की बजाय सत्ता के प्रति समर्पित होना है. व्यवस्था के संचालन की मौलिक जिम्मेदारी राजनेताओं की ही है. इसलिए इसमें खामियों के लिए प्रथम दृष्टया राजनेता ही दोषी हैं. व्यवस्था की खामी तब मानी जाती, जबकि राजनेताओं के समर्पित होने के बाद भी बेहतर परिणाम नहीं मिलते.

एक अन्य सवाल कि लोगों में लोकतंत्र के प्रति बढ़ता विश्वास और नेताओं के प्रति अविश्चास की बढ़ती खाई की क्या वजह है, श्री कुमार ने कहा कि बेशक, लोकतंत्र भारतीय जीवन पद्धति का मूल तत्व है. अगर व्यवस्था चलाने वाले नेताओं की बात करें, तो पिछले कुछ दशकों में नेताओं की विश्वसनीयता तेजी से गिरी है. इसकी वजह, नेताओं द्वारा जिस गति से चुनाव प्रक्रिया को दूषित किया गया, उस गति से चुनाव प्रक्रिया में सुधार नहीं हो पाना है. चुनाव में धनबल और बाहुबल से हुई शुरुआत अब धर्म-जाति के प्रपंच से आगे जाकर तकनीक (सोशल मीडिया आदि माध्यमों) का दुरुपयोग कर मतदाताओं को भ्रमित करने तक जा पहुंची है.

अश्विनी कुमार ने कहा कि इन बुराइयों को रोकने के लिए किये गये उपाय नाकाफी साबित होने के कारण विधायिका में अवांछित सदस्यों की संख्या बढ़ी है. नतीजतन, विधा यिका से चुनाव सुधार के उपयुक्त कानून बनाने की उम्मीद भी धूमिल हो रही है. पूर्व कानून मंत्री ने कहा कि निर्वाचन प्रणाली में धनबल और बाहुबल जनता की अपेक्षाओं के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है. इसका तात्कालिक प्रभाव जवाबदेही में कमी के रूप में दिखता है. परिणामस्वरूप विधायिका में लोगों के प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता जिस तरह से निखर कर आनी चाहिए, वह नहीं आ पाती है.

यह पूछे जाने पर कि आजादी के 70 साल बाद भी चुनाव प्रक्रिया की खामियों पर चर्चा हो रही है. क्या यह माना जाये कि देश को एक आदर्श और निर्विवाद चुनाव प्रक्रिया की जरूरत है? इस पर श्री कुमार ने कहा कि यह विडंबना ही है कि भारत के साथ आजाद हुए देश कहां से कहां पहुंच गये और हम 70 साल बाद भी अपनी सरकारों के निर्वाचन की उपयुक्त व्यवस्था को तलाश रहे हैं.

उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया में आयी खामियों के मद्देनजर विशेषज्ञों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुदृढ़ करने के लिए गहन मंथन कर समय-समय पर महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं. लेकिन, आम राय कायम नहीं हो पाने के कारण इन्हें अमल में नहीं लाया जा सका है. इस नाकामी के लिए विधायिका के सदस्यों में गुणवत्ता की कमी ही जिम्मेदार है. इस कमी को दूर करना अब नितांत जरूरी है, क्योंकि अगर लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठ गया, तो फिर कुछ नहीं बचेगा.

पूर्व कानून मंत्री कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और कनाडा की तर्ज पर वरीयता मत प्रणाली (रैंकिंग वोटिंग सिस्टम) चर्चा का विषय हो सकता है. आधिकारिक तौर पर यह विचार अब तक सामने नहीं आया है. उन्होंने कहा कि निर्वाचन पद्धति में सुधार और बदलाव को लेकर कई विचार चर्चा के दौर में हैं. लेकिन, मौजूदा प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की जगह रैंकिंग सिस्टम जैसी बिल्कुल नयी प्रणाली लागू करने का विचार आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है. यह विचारकों के बीच चर्चा का विषय जरूर हो सकता है, लेकिन यह लागू करने के लिए विचार के स्तर पर नहीं है.

उन्होंने कहा, बतौर पूर्व कानून मंत्री, मेरा मानना है कि देश के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को देखते हुए मौजूदा व्यवस्था में कारगर सुधारों को ईमानदारी से लागू करना ही व्यावहारिक होगा. चुनाव सुधार में चुनाव की वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में पूछे जाने पर श्री कुमार ने कहा कि वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में अभी मैने चिंतन नहीं किया है. यह सही है कि चुनाव की मौजूदा व्यवस्था की व्याख्या और इसके परिणाम पर विचार करना जरूरी है, क्योंकि वर्तमान तरीके से हम अपने लोकतंत्र को सशक्त नहीं कर पाये हैं.

उन्होंने कहा कि नये विकल्प की बात ढांचागत बुनियादी बदलाव से जुड़ी है और इसके प्रति मुझे स्वयं को अभी आश्वस्त करना है कि क्या सर्वश्रेष्ठ विकल्प हो सकता है. इस सबके बीच अच्छी बात यह है कि देश में चुनाव सुधार पर गंभीर चर्चा शुरू हो गयी है. मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं. इसीलिए हम सुधार की ओर बढ़ रहे हैं. यह रचनात्मक कदम है.

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