सिख कैदियों से दूर रहेंगे सज्जन कुमार, कड़ी सुरक्षा में पहुंचे मंडोली जेल

नयी दिल्ली : दिल्ली की मंडोली जेल भेजे गये कांग्रेस के पूर्व नेता सज्जन कुमार के वार्ड से एहतियात के तौर पर सिख कैदियों को दूर रखा जायेगा. यहां की कड़कड़डूमा अदालत में सोमवार को आत्मसमर्पण करने के बाद कुमार को मंडोली जेल ले जाया गया. 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले […]
नयी दिल्ली : दिल्ली की मंडोली जेल भेजे गये कांग्रेस के पूर्व नेता सज्जन कुमार के वार्ड से एहतियात के तौर पर सिख कैदियों को दूर रखा जायेगा. यहां की कड़कड़डूमा अदालत में सोमवार को आत्मसमर्पण करने के बाद कुमार को मंडोली जेल ले जाया गया.
1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में कुमार को जीवनपर्यंत कारावास की सजा सुनायी गयी है. सूत्रों ने बताया कि कुमार को जेल नंबर 14 में रखा जायेगा. दिल्ली के सरकारी अस्पताल में चिकित्सकीय परीक्षण के बाद पुलिस उसे लेकर जेल लेकर पहुंची. उन्होंने बताया कि जेल चिकित्सक ने भी कुमार की चिकित्सकीय जांच की. अदालत के निर्देश के बाद उसे कैदियों को ले जाने के लिए इस्तेमाल की जानेवाली एक अलग बस में जेल परिसर लाया गया. बस की सुरक्षा में दो वाहन चल रहे थे. सूत्रों ने बताया कि अभी यह फैसला नहीं किया गया है कि कांग्रेस के पूर्व नेता को कहां रखा जायेगा, हालांकि जेल संख्या 14 में सुरक्षा बढ़ा दी गयी है और जेल कर्मियों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि जेल में सजा काट रहे दो-तीन सिख कैदियों को एहतियातन कुमार से दूर रखा जाये.
कुमार (73) ने मेट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट अदिति गर्ग के समक्ष आत्मसमर्पण किया जिन्होंने निर्देश दिया कि उसे उत्तर-पूर्वी दिल्ली की मंडोली जेल में रखा जाये. दिल्ली उच्च न्यायालय ने सज्जन कुमार के आत्मसमर्पण करने के लिए 31 दिसंबर की अंतिम समयसीमा तय की थी. अदालत ने 21 दिसंबर को आत्मसमर्पण के लिए समयसीमा एक महीने के लिए बढ़ाने के अनुरोधवाली सज्जन कुमार की अर्जी खारिज कर दी थी.
उच्च न्यायालय ने 17 दिसंबर को कुमार को दोषी ठहराते हुए ‘जीवनपर्यंत कारावास’ की सजा सुनायी थी. सज्जन कुमार ने अपनी दोषसिद्धि के बाद कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था. कुमार को दक्षिण पश्चिमी दिल्ली की पालम कॉलोनी के राज नगर पार्ट-1 क्षेत्र में एक-दो नवंबर 1984 को पांच सिखों की हत्या और राजनगर पार्ट-दो में एक गुरुद्वारा जलाने के मामले में दोषी ठहराते हुए सजा सुनायी गयी थी. ये दंगे 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने के बाद भड़के थे.
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