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बोले दलाई लामा- महात्मा गांधी चाहते थे जिन्ना बने भारत के पीएम, लेकिन नेहरु ने...

Updated at : 09 Aug 2018 8:55 AM (IST)
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बोले दलाई लामा- महात्मा गांधी चाहते थे जिन्ना बने भारत के पीएम, लेकिन नेहरु ने...

पणजी : आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने जवाहर लाल नेहरू को आत्मकेंद्रित व्यक्ति बताया है. बुधवार को गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी मोहम्मद अली जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने इसके लिए मना कर दिया था. यदि गांधीजी की यह इच्छा पूरी […]

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पणजी : आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने जवाहर लाल नेहरू को आत्मकेंद्रित व्यक्ति बताया है. बुधवार को गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी मोहम्मद अली जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने इसके लिए मना कर दिया था. यदि गांधीजी की यह इच्छा पूरी हो जाती तो भारत का विभाजन ही नहीं होता. आगे उन्होंने कहा कि पंडित नेहरू काफी अनुभवी और बुद्धिमान थे लेकिन उनसे कुछ गलतियां भी हुईं.

दलाई ने यह भी कहा कि सामंती की बजाय लोकतांत्रिक व्यवस्था ज्यादा अच्छी होती है. सामंती व्यवस्था में फैसला लेने का हक केवल कुछ लोगों के हाथ में होता है जो समाज के लिए ठीक नहीं होता है. उन्होंने कहा कि चीन की तिब्बत में दखलंदाजी की समस्या 1956 से चली आ रही थी. जब मुझे ऐसा लगने लगा कि अब हालात सामान्य नहीं रह पाएंगे तो 17 मार्च 1959 की रात मैं तिब्बत से अपने समर्थकों के साथ वहां से चल पड़ा. मेरे दिमाग में यही था कि अगली सुबह देख भी पाऊंगा या नहीं. अब तो परिस्थितियां और भी खराब हो चुकी है. चीनी अधिकारियों का रवैया बहुत ही खराब होता जा रहा है.

जब उनसे पूछा गया कि उनके जिंदगी का सबसे बड़ा डर क्या था, दलाई लामा ने कहा कि तिब्बत छोड़कर भारत आते वक्त वे चीनी मिलिट्री बेस के पास से गुजरे थे. जब वे नदी पार कर रहे थे तो चीनी सैनिकों की निगाह उनपर थी. उस दौरान हम लोग पूरी तरह शांत थे लेकिन घोड़ों की टापों की आवाज को तो नहीं रोका जा सकता था. उस वक्त हम सहम गये थे. दूसरे दिन सवेरा होते ही हम पहाड़ से उतर रहे थे. हमें रोकने के लिए दो तरफ से चीनी सैनिक पहुंच चुके थे जो काफी खतरनाक था.

दलाई ने कहा कि 16 साल की उम्र में मैंने आजादी खो दी. 24 साल की उम्र में मैंने अपना देश खोया. 17 साल तक हमने कई उतार-चढ़ाव देखे लेकिन मकसद के लिए अड़े रहे. चीन की ताकत की बात करें तो उसकी सेना को उसकी ताकत कहा जाता है. हम कह सकते हैं कि वहां बंदूक का शासन है. हमारी ताकत सच में प्रेरित है. बंदूक की नोंक पर कुछ फैसले तो किये जा सकते हैं लेकिन लंबे वक्त में सच ज्यादा ताकतवर साबित होता है.

आगे उन्होंने कहा कि तिब्बती कभी भी चीनियों को अपना दुश्मन नहीं मानते बल्कि उनका सम्मान करते हैं और उन्हें भाई-बहन ही मानते हैं.

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